Monday, July 23, 2018

अतीत के झरोखों से

पिछले चार सालों में आपको कई ऐसे महाधुरंधर मिले हैं जो रामायण, महाभारत और अन्य पौराणिक कथाओं की उलाहनें देकर आपको बतातें है कि हमारा अतीत कितना स्वर्णिम था ।
एचआरडी के सदस्य रहे दीनानाथ बत्रा जी ने इस बात का जिक्र किया कि अनुवांशिकता भारत की देन है और इसे जस्टिफाई करने के लिए घी के डिब्बे मे उत्पन्न हुए सौ कौरवों की कहानी सुनाते हैं । प्रधानमंत्री श्री दामोदर दास नरेन्द्र मोदी जी कहते हैं कि मेडिकल हिस्ट्री में पहली सर्जरी भगवान गणेश की हुई थी । इसी क्रम मे त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देव कहते हैं कि इंटरनेट प्राचीन भारत की देन हैं । समझ नही आता ऐसे लोग कहाँ से आते हैं ।
साइंस और टेक्नोलाॅजी की बहस में आप गणेश की सर्जरी, पुष्पक विमान, संजय का टीवी, प्राचीन न्यूक्लियर एक्सप्लोज़न (ब्रह्मास्त्र) और इंटरनेट की तमाम मनोरंजक घटनाएँ पहले ही सुन चुके हैं । गाँव में चाय बेचने वाले, सब्जी का ठेला लगाने वाले, परचून वाला बनिया और हाईस्कूल फेल लंपटई करने वाले आजकल के लड़के इस विषय पर पीएचडी वाला ग्यान झाड़ सकते हैं । कई बार झूठ इतना प्रचारित किया जाता है कि वो सच लगने लगता है । इसका सबसे कर्रा सुबूत है ये पौराणिक कथाएँ । दरअसल हमारा अतीत रामायण महाभारत जैसे कोरे काल्पनिक कथाओ से कहीं बढ़कर स्वर्णिम रहा है ।
इतिहास के नाम पर खूब स्वांग रचा गया है और रामायण (रामचरित मानस) महाभारत को सबसे प्रमाणिक मान लिया गया है । मदारी डमरू बजा रहा है आप नाचिए ।
नाच लिए हो तो आपका वास्तविक इतिहास भी बतातें चलें जहाँ गर्व करने को इन कहानियों से कहीं ज्यादा मैटेरियल है ।

स्टील की खोज

आज पूरी दुनिया का इंफ्रास्ट्रक्चर स्टील पर टिका है लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये स्टील कहाँ से आया ? तो गर्व कीजिए इस पर कि स्टील की खोज भारत ने की और इस्पात के मामले में भारत ने पूरी दुनिया मे अपना लोहा मनवाया । भारत में बनी तलवारें सबसे बेहतरीन तलवारें मानी जाती थी और इसकी काफी डिमांड भी थी । दिल्ली के मेहरौली मे स्थित दुनिया का इकलौता ऐसा लौह स्तंभ है जिसमे कभी जंग नही लगा और ऐसा अजूबा भारत के लोहारो ने ही किया ।



इंडियन एल्केमिस्ट

न ! न ! ये पाओलो कोइल्हो की किताब 'द एल्केमिस्ट' का भारतीय रूपांतरण नही बल्कि भारतीय रसायनविद्या के बारे में है ।
प्राचीन भारतीय रंगरेजों ने ऐसे रंगो का विकास किया जो डेढ़ हजार साल में भी जैसे के तैसे बने हुए हैं । अजंता की गुफाओं की चित्रकारी में इस्तेमाल हुए रंग सबसे उच्च कोटि के रहे हैं । ताज्जुब होता है इतने सालो बाद भी उनकी रंगत जरा भी फीकी नही हुई है । रंगो के मामले में प्राचीन रसायनशास्त्रियों ने बहुत नायाब एक्सपेरिमेंट किए और उन्होने ही नील का अविष्कार भी किया ।



मैटरियलिज़्म फिलासफी (भौतिकवादी दर्शन)

भौतिकवादी फिलासफी सुनकर आपके मन में मार्क्स बाबा और उनके सहयोगी चचा एंगेल्स याद आते होंगे लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि मार्क्स बाबा से चौबीस सौ साल पहले छठी शताब्दी ईसा पूर्व भारत में आचार्य चार्वाक ने भौतिकवाद का दर्शन 'लोकायत' मे लिख दिया था । उनका मत था कि 'मनुष्य अपनी इंद्रियो से जिसका अनुभव नही कर सकता उसका वास्तविकता में कोई अस्तित्व ही नही है' ।
आचार्य चार्वाक को अगर 'फादर ऑफ एथिएज्म़' कहा जाए तो कोई गलत नही होगा ।

लैंग्विस्टिक (भाषा विज्ञान )

यूरोप के कुछ हिस्सो को छोड़कर जब पूरी दुनिया में सिर्फ मार काट हो रही थी भारत में कई शोध हो रहे थे । ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में संस्कृत के उच्चारण की शुद्धता और व्याकरण के लिए पहला ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' लिखा गया जिसे पाणिनी ने लिखा ।

मैथमैटिक्स

एनशिएन्ट इंडिया में हड़प्पा मोहनजोदड़ो सिविलाइजेशन में जिस तरह से व्यवस्थित शहरो का निमार्ण किया गया है निश्चित तौर पर उन्हे ज्यामेट्री, मेजेरमेंट का अच्छा ज्ञान था वैदिक पीरियड में इसी ज्ञान का फायदा लिया गया । ईसा पूर्व पाँचवी शताब्दी के आसपास 'शुल्वसूत्र' में इसकी झलक देखी जा सकती है । दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में गणित का वास्तविक विकास प्रारंभ हुआ । इसी दौरान आपस्तम्ब ने व्यवहारिक ज्यामिति की रचना की जिसमे न्यूनकोण, अधिककोण और समकोण का वर्णन किया गया है । आचार्य आर्यभट्ट ने गणित को और भी समृद्ध किया उन्होने त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने का नियम निकाला जिसके फलस्वरूप ट्रेग्नोमेंट्री का जन्म हुआ ।
गणित में प्राचीन भारतीयो ने तीन महत्वपूर्ण योगदान दिए ।

1-अंकन पद्धति
2-दाशमिक पद्धति
3-शून्य का प्रयोग ।

जीरो का यूज़ और अलजेबरा यूरोपियन्स ने अरेबियन्स से सीखा और अरेबियन्स ने इंडियन्स से सीखा । ताज्जुब की बात है कि अरब में जीरो का पहला प्रयोग नौवीं शताब्दी में दिखाई देता है जबकि इंडियन्स इसका प्रयोग दूसरी शताब्दी से करते आ रहे हैं । वेस्टर्न कंट्रीज़ मे इंडियन न्यूमेरल्स को अरेबिक न्यूमेरल्स कहते हैं जबकि अरेबियन्स इसे 'हिन्दसा' कहते हैं । दाशमिक पद्धति का प्रयोग भी सर्वप्रथम भारत में ही हुआ आचार्य आर्यभट्ट इससे भली भाति परिचित थे । भारत से निकल कर ये पद्धति चाइना, अरब और यूरोप में खूब फैला ।
आधुनिक युग में महान गणितज्ञ रामानुजम ने भी भारत का नाम विश्व पटल पर रौशन किया । 2015  मे उनके जीवन पर आधारित बायोपिक बनी जिसका नाम था 'द मैन हू न्यू इनफिनिटी' ।


खगोल विद्या

खगोल विद्या के क्षेत्र में आर्यभट्ट और वाराहमिहिर दो धाकड़ गुरू हुए । जिन्होने भारतीय खगोल शास्त्र में चार चाँद लगाए । अपनी पुस्तक 'आर्यभटीय' में आचार्य आर्यभट्ट ने चन्द्रगहण और सूर्यग्रहण के कारण का वर्णन दिया । उन्होने अनुमान के आधार पर पृथ्वी की परिधि का मान निकाला जो आज भी एकदम एक्यूरेट माना जाता है । इन्ही के नाम पर भारत का पहला उपग्रह 'आर्यभट्ट' लांच किया गया । छठी शताब्दी ईस्वी में गुरू वाराहमिहिर ने अपनी किताब 'वृहतसंहिता' मे जिक्र किया कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है और चन्द्रमा पृथ्वी का ।

मेडिकल साइंस

मेडिकल साइंस में भारत बाकी दुनिया से काफी आगे था । ईस्वी के सैकड़ो साल पहले अथर्ववेद में दवाओ का जिक्र है । प्राचीन काल मे भारतीय एनाटमी की स्टडी करते थे और दवाओ पर रिसर्च भी । सम्राट कनिष्क के वक्त यानी दूसरी शताब्दी ईस्वी मे मेडिकल साइंस में दो धुरंधर पैदा हुए । चरक और सुश्रुत ।
'सुश्रुतसंहिता' में सुश्रुत ने मोतियाबिंद, पथरी सहित कई सर्जरी का वर्णन किया है । उन्होने सर्जरी के लिए 121 एक्यूपमेंट्स का भी जिक्र किया । सुश्रुत सर्जरी करने वाले दुनिया के पहले वैद्य थे । इसलिए उन्हे 'फादर ऑफ सर्जरी' भी कहा जाता है ।
दूसरे महावैद्य चरक ने अपनी 'चरक संहिता' में कई तरह की बिमारियो का विस्तृत वर्णन किया जैसे कि फीवर, लैप्रोसी, एपीलिप्सी और ट्यूबरक्लोसिस । इस किताब में उन्होने कई तरह के जड़ी-बूटियों का वर्णन किया है जिससे दवा बनाई जाती थी । चरससंहिता और सुश्रुतसंहिता ने भारतीय मेडिकल साइंस को एक नई ऊँचाई दी ।



 पाॅलिटिक्स

यूँ तो अट्ठारहवी शताब्दी में फ्रांस मे हुए विद्रोह ने गणतंत्र की भावना को जन्म दिया लेकिन भारत में गणतंत्र का पहला लिखित साक्ष्य चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में मिलता है । इसीलिए वैशाली को दुनिया का पहला गणतंत्र राज्य माना गया है । प्रशासन के नजरिए से देंखे तो हम पाते हैं कि प्राचीन भारत में कहीं बेहतर प्रशासन था । 'अर्थशास्त्र' में आचार्य चाणक्य ने प्रशासन के नजरिए से कठिन परिस्थितो में भी सुगमता से राज्य चलाने के तौर तरीके सुझाएँ हैं । अशोक जैसा महान सम्राट भी इसी धरती पर पैदा हुआ जिसने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर पूरा साम्राज्य खड़ा ही न किया बल्कि सुगमता से राज भी किया ।

 इंडियन आर्ट

कला के नजरिए से देखे तो भारत बहुत ही समृद्ध था । हमारा राष्ट्रीय चिन्ह लगभग तेइस सौ साल पुराना है । अशोक स्तम्भ की चमकदार पाॅलिश ही बताती है कि हमारे स्कल्पटर कितने इंटेलिजेंट थे । उत्तरी काले पाॅलिशदार मृदभांड की चमक देखकर आज के इतिहासकार ताज्जुब करते हैं कि उस जमाने में कैसे इनपर इतना चमकदार पाॅलिश किया गया होगा । इंडियन आर्ट की बात करें तो अंजता, एलोरा, खजुराहो, बादामी जैसे बहुत से उदहारण है जिन्होने साबित किया है कि प्राचीन भारत में मिस्र के अलावा अन्य कोई हमारे सामने न था । अंजता मे इस्तेमाल हुए रंग और स्ट्रोक्स रैनेसां के पहले और कहीं नही दिखाई दिए ।





 एजुकेशन

नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय भारत के गौरव रहे हैं । यहाँ न केवल भारत से बल्कि तिब्बत चीन और वर्तमान अफगानिस्तान से लोग पढ़ने आते थे । प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ आचार्य कौटिल्य तक्षशिला से ताल्लुक रखते थे । नालंदा का महाविहार हास्टल फेसेल्टी का सबसे प्राचीनतम उदहारण है । आक्रांताओ के हमले का शिकार हुआ नालंदा के बारे मे कहा जाता है कि जब उसे तहस-नहस करके उसके लाइब्रेरी में आग लगा दी गयी तो पूरे छः महीने तक किताबे सुलगती रही । इतना बड़ा कलेक्शन था नालंदा में किताबो का । गुप्त पीरियड में कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतलम, मेघदूतम्, मालविकाग्निमित्रम जैसी कालजयी रचना की । अभिज्ञानशाकुंतलम का विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओ में ट्रांसलेशन हो चुका है ।


तो आज आपने जाना कि भारत में गर्व करने को रामायण महाभारत और पौराणिक कथाओ के इतर और क्या-क्या हैं । बेहतर यही होगा कि आप अफवाहों पर ध्यान न दें और अपना वास्तविक अतीत खोजें ताकि हम अपना भविष्य खूबसूरत बना सकें न कि कल्पनालोक मे टहर्रा मारते रहें ।