Monday, September 11, 2017

Revolutionary leader of chile



हिंदुस्तान में एक बहुत प्रचलित कहावत है कि जब पाप का घड़ा भर जाता है तो वो फूट जाता है ।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूएसए ने नाटो संगठन और सीआईए संस्था की स्थापना उसने दुनिया भर में दबदबा कायम करने और उसे बरकरार रखने के लिए किया । शांति के नाम पर शक्ति संतुलन पर अधिक ध्यान केन्द्रित करते हुए उसने लगभग हर छोटे बड़े महत्वपूण देशों के आंतरिक मामलों में दख़लअंदाजी की । सोवियत के विघटन के बाद एक ध्रुवीय दुनिया होने का यूएसए ने भरपूर फायदा उठाया । यूएसए का प्रभाव इस कदर काबिज हो गया कि यूएसए को अमेरिका नाम से ही आज पूरी दुनिया में जाना जाता है जबकि अमेरिका दो महाद्वीपों के नाम हैं ।
यूएसए की संस्था सीआईए ने लगभग सभी गैर यूएसए समर्थित लैटिन अमेरिका के देशों में अपने एजेंट लगाए, पूंजीवादी और अमेरिका विरोधी देशों में अपने पिट्ठूओं को बैठानें में पूरी ताकत लगाई चाहे वो क्यूबा हो, बोलिविया हो या चिले हो ।
अमेरिका महाद्वीप के बाहर भी यूएसए ने भयंकर तबाही मचाई जो किसी से छिपा नही है । लेकिन जब 9/11 की बात आती है तो तात्कालिक राष्ट्रपति जार्ज बुश इसे अमेरिका की सबसे विनाशकारी तबाही बताते हैं ।
ये बताते वक्त शायद वो भूल गये कि इससे ज्यादा तबाही उन्होने पूरी दुनिया में फैलाई है जिसके लिए यूएसए में कभी पश्चाताप की भावना नही पनपी ।
अमेरिका में 9/11 की घटना बेशक दुखद रही लेकिन अगर हम नौ सितंबर सन् दो हजार एक से ठीक अट्ठाइस साल पीछे जाएँ तो अमेरिका और उसकी क्रूर संस्था सीआईए का एक घिनौना खेल देखने को मिलेगा । ये महज संयोग है कि जिस दिन सीआईए ने चिले के राष्ट्रपति की हत्या करवाई उसके ठीक अट्ठाईस साल बाद अमेरिका को अपने इतिहास का सबसे काला दिन देखना पड़ा ।
यूएसए के वर्चस्व के कारण ही 9/11 की डब्ल्यू टी ओ और पेंटागन ध्वस्त होने की घटना को प्रमुखता से हर अख़बार में तवज्जो दी जाती रही है, इसी वर्चस्व में चिले की घटना धूमिल हो जाती है या जानबूझकर भुला दी जाती है ।
आज हम लैटिन अमेरिकी देश चिली की 9/11 पर चर्चा करेंगे क्योकि ये इतिहास का वो हिस्सा है जिसे भुलाए जाने से बचाना है ।
सीआईए द्वारा चिले के राष्ट्रपति की हत्या से ठीक पहले उन्होने रेडियो पर देश के नाम संदेश दिया जिसका अनुवाद इस प्रकार है । 

"Workers of my country, I have faith in chile and it's future. Others men will overcome this dark and bitter movment when treason seeks to prevail. Keep in mind that, much sooner then later, the great avenues will again be opened, through which will pass free men to construct a better society. Long live chile ! Long live the people ! Long live the workers !
These are my last words, and I am certain that my sacrifice will not  be in vain. I am certain that, at the very least, it will be a moral lesson that will punish felony, cowardice, and treason.

- SALVADOR ALLENDE


"मेरे मुल्क के मेहनतकश मजदूरो ! चिली और इसका भविष्य बहुत ही अच्छा है, इस बात का मुझे पूरा भरोसा है । जब देशद्रोह करने वाली ताकतें अपनी सत्ता पूरी तरह कायम कर लेंगी तब भी चिली के लोग उस मुश्किल और अंधियारे से पार पा लेंगे । हमें यह कभी नही भूलना चाहिए कि देर सबेर वें परिस्थितियाँ बनेंगी ही जिसमें आजाद लोग बेहतर समाज की रचना के लिए आगे बढ़ेंगे । चिली जिंदाबाद ! चिलीवासी जिंदाबाद! मजदूर जिंदाबाद !
ये मेरे आखिरी शब्द है और मुझे पूरा भरोसा है कि मेरी कुर्बानी बेकार नही जाएगी और मैं महा-अपराध, कायरता और देशद्रोह के खिलाफ एक नैतिक सबक बनकर मौजूद रहूँगा" ।
- साल्वाडोर अयांदे

                                 बायें तरफ हेलमेट पहने हुए अयांदे


11 सितंबर 1973 को चिली के तात्कालिक राष्ट्रपति साल्वाडोर अयांदे ( Salvador Allende) ने ये बात रेडियो पर अपने अंतिम भाषण में कही । इस रेडियो टेलिकास्ट के कुछ ही घंटे के बाद चिली की जनता ने अपने प्रिय नेता की मौत की खबर सुनी ।
 अयांदे को क्यो मारा गया ? किसने मारा ? ये जानने से पहले हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि अयांदे बंदा चीज क्या था ?
तो जान लो कि अयांदे 'सोशलिस्ट पार्टी ऑफ चिली' के फाउंडर लीडर मनै पार्टी के दीन दयाल उपाध्याय थे । और 1970 के प्रेसिडेंशियल इलेक्शन जीत कर राष्ट्रपति बने थे । अयांदे गरीबो और मजदूरो के लिए कुछ करना चाहते थे यू नो वही कम्युनिस्टों वाला राग ।
उन्होने चिली के एजुकेशन सिस्टम को ठीक किया, बच्चो के लिए फ्री दूध की व्यवस्था की, भूस्वामियो से जमीन लेके गरीबो को बांटा, यही नही उन्होने विदेशी कंपनिया जो चिली में खनिजो का खनन करके मोटा मुनाफा कमा रहीं थी उनका खाना-पीना भी बंद कर दिया । इसलिए भूस्वामी और रईस उनके खिलाफ आ गये और इस खिलाफत मे चर्च ने भी एलीट क्लास को समर्थन दिया साथ ही कुछ अवसरवादी राजनैतिक पार्टियो ने भी उनकी सुर में सुर मिलाया ।
हमारे गाँव मे कहते हैं कि जब कोई अच्छा काम करता है तो उसके बहुत से दुश्मन हो जाते हैं अयांदे के साथ भी ऐसा ही हुआ, उनके सारे दुश्मन यूनाइटेड हो गये और उनका दादा था-अमेरिका । जैसा कि हम सभी जानते हैं कि शांति और सोशलिज्म से जबसे ज्यादा किसी को दर्द उठता है तो वो है-अमरीका और उसके कारपोरेट चेलें । कोल्ड वाॅर के दौरान तात्कालिक यूएसए प्रेसिडेंट रिचर्ड निक्सन ने अयांदे की सत्ता को उखाड़ फेंकने के स्पष्ट आदेश दिए थे ।
अमेरिका हमेशा से कई देशो मे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से टांग अड़ाता रहा है । तेल के लिए मध्य एशिया मे कूटनीति-राजनीति खेल रहा है । उसने सोशलिस्ट देश क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो पर अनगिनत हमले करवाए । सोवियत यूनियन को तोड़ने के लिए तरह-तरह के क्लासिफाइड ऑपरेशन चलवाए और सोशलिज्म के विपरीत सरमायेदारी का वर्चस्व पूरी दुनिया में फैलाने मे लगा हुआ है ।


अयांदे की हत्या में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA का पूरा-पूरा समर्थन था और उसी के समर्थन से जनरल ऑगस्टो पिनाॅशे अयांदे के बाद चिली का तानाशाह बना जिसने 17 साल चिली पर राज किया । इस दौरान पिनाॅशे के खिलाफ आवाज उठाने वालो को टार्चर किया किया । कहते हैं पिनाॅशे के राज मे 3000 से ज्यादा लोगो की हत्या की गयी और बहुत से लोग कश्मीर की तरह 'डिसएपेयर' हो गये जिनका कभी कुछ पता नही चला ।
गोलीबारी से कुछ वक्त पहले जब पिनाशे उन्हे बंदूक के नोक पर आत्मसमर्पण कर इस्तीफा देकर देश छोड़ जाने की मांग कर रहा था तो वो उसे खारिज कर रेडियो पर 'देश के नाम संदेश' पढ़ रहे थे । ईमान पर बने रहने के लिए करेज़ की जरूरत है वरना बहुत से नेताओ को जान पर बनते देश से गद्दारी करते भी देखा गया है ।
अयांदे जैसे महान क्रांतिकारी को क्रांतिकारी सलाम ।
-सम्राट विद्रोही




Friday, September 8, 2017

मर कर भी जिंदा है पाश

आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता.
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता.
कुछ नहीं सोचनें
और कुछ नहीं बोलनें पर
आदमी
मर जाता है.



उदय प्रकाश की इस कविता को पढ़ते हुए अक्सर पाश याद आतें हैं । ज़िन्दा लाशों के देश में पाश न सिर्फ सोचता और बोलता रहा बल्कि वो ज़िदगी और इंसानियत के लिए लड़ता भी रहा । जीते जी ही नही, मरने के बाद भी पाश की आवाज़ लोगो के ज़मीर को झकझोरती रही । पाश आज भी जिंदा है लोगो की दिलों में, प्रगतिशील समाजविचारकों के ज़ेहन में ।

हिन्दी के पाठको में जब सबसे चर्चित पंजाबी कवि का नाम पूछा जाता है तब जवाब सिर्फ एक ही होता है -अवतार सिंह संधू जिन्हें'पाश' के नाम से भी जाना जाता है । क्रांतिकारी विचारधारा से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने पाश की कविताएँ न पढ़ी हो । इसी तरह 'पाश' मेरे भी पसंदीदा कवियो में से एक हैं ।

सबसे खतरनाक

अक्सर पाश को पढ़ते हुए आस-पास की ज़ुल्मतों की सारी घटनाएँ सिलसिलेवार ढंग से आँखो के सामने नाचनें लगती हैं । पाश की कविताएँ कोयले की खादान जैसी है जहाँ अंदर जाकर आप कालिख़ से अनछुए होके नही आ सकते ।
पाश को ऐसे क्रांतिकारी कवि के रूप में देखा जाता है जो हमेशा विरोध की बात करता है लेकिन पाश विद्रोह के स्वर में जब सोनी-माहिवाल, हीर रांझा, मिर्जा-साहिबा की प्रेमकहानियों को भी शामिल करता है तो उसकी एक नयी तरह की शैली सामने आती है । पाश की ये विशेषता उसे बाकी क्रांतिकारी कवियों से अलग करती है । उसकी आवाज में विद्रोह है, प्रेम है, आंचलिकता है, विषाद है, दर्द है, गुस्सा है लेकिन कविता का मूल भाव में आशा की किरण है । पाश की कविताओ में एक चीज जो आपको कहीं नही मिलेगी वो है "बीच का रास्ता" । पाश समझौतों से नफरत करता था क्योंकि सच्चे क्रांतिकारी कभी समझौता नही करते ।
इतिहास में जब भी जुल्मतों के दौर की गाथाएँ सुनाई जाएगी पाश की कविताए बड़े ही अदब से सुनाई जाएगी ।
गरीबी से जूझ रही आवाम जब आपातकाल झेल रही थी तब पाश बड़े बेखौफ होके बेबाकी से कहते हैं-

जिन्होने देखे हैं

छतो पर सूखते सुनहरे भुट्टे
और नही देखे
मंडियो मे सूखते दाम
वें कभी न समझ पाएंगे
कि कैसे दुश्मनी है
दिल्ली की उस हुक्मरान औरत की
नंगे पांवो वाली गांव की उस सुंदर लड़की से ।


('उड़ते हुए बाजो के पीछे' कविता का अंश)

आज के दौर में जब फेक-नेशनलिज्म का तांडव चरम पर है । राष्ट्रवाद की नयी-नयी परिभाषाएँ गढ़ी जा रही है । देशभक्ति के नाम पर सिर्फ "भारत माता की जय" और "वंदे मातरम" भर कहना ही शेष रह गया है । पाश की पहली किताब 'लौहकथा' की पहली ही कविता 'भारत' में हमें भारत की सच्ची तस्वीर दिखाती देती है ।


भारत-

मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी प्रयोग किया जाये
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भूख लगने पर
अपने अंग भी चबा सकते हैं
उनके लिए जिंदगी एक परंपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
जब भी कोई समूचे भारत की
राष्ट्रीय एकता की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है-
उसकी टोपी हवा में उछाल दूं
उसे बताऊं
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर हैं
जहां अन्न उगता है
जहां सेंध लगती है



पाश की कविता में सच्चाई की भीषण गंध है जले हुए लोहे की तरह ।
'लौहकथा' मे समाज के शोषक-शोषितों को रेखांकित करते हुए पाश कहते हैं

लोहे ने बड़ी देर इंतजार किया है
कि लोहे पर निर्भर लोग
लोहे की पत्तियाँ खाकर
खुदकुशी करना छोड़ दें
मशीनो में फंसकर फूस की तरह उड़ने वाले
लावारिसो की बीवियाँ
लोहे की कुर्सियो फर बैठे वारिसो के पास
कपड़े तक खुद उतारने के लिए मजबूर न हों ।


पाश मुकम्मल आजाद मुल्क में सांस लेना चाहता था, गले तक जिंदगी जीना चाहता था । उसने देश के लिए समतावादी, समाजवादी सपना देखा था लेकिन तमाम दुश्मनों से घिरा, अपनों से छला हुआ आदमी क्या कर सकता ? पाश लड़ता रहा, न सिर्फ पंजाब की सामप्रदायिक ताकतों से, न सिर्फ दमनकारी सरकार से बल्कि उन धोखेबाज आंदोलनकारी कम्युनिस्टों से भी जिन्होनें संघर्ष का रास्ता छोड़कर अवसरवाद की राह पकड़ ली । उन्हें लानतें देता हुआ पाश कहता है-

"यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दो ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊ
मार्क्स का सिंह जैसा सिर
दिल्ली की भूलभुलैया में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारो, ये कुफ्र हमारे ही समयों मे होना था ।"


पाश ने अपने समय की सारी समस्यायों को रेखांकित किया है, 'चिड़िया का चंबा' कविता में पंजाब की युवतियो की दुर्दशा के बारे मे पाश लिखता है-

चिड़ियो का चंबा उड़कर
किसी भी देश न जाएगा
सारी उम्र कांटे चारे के झेलेगा
और सफेद चादर पर लगा
उसकी माहवारी का रक्त उसका मुँह चिढ़ाएगा


 पाश एक कवि भर ही नही था वो क्रांति का सिपाही था । पाश अपनी लड़ाई दोहरे मोर्चे पर लड़ रहा था एक तरफ वो तानाशाह दमनकारी सरकार से लड़ रहा था तो वहीं दूसरी तरफ पंजाब के सामप्रदायिक ताकतों से । पाश भगत सिंह की वैचारिक विरासत का सच्चा वारिस था जो आखिरी सांस तक अन्याय के खिलाफ लड़ता रहा और शांति के दुश्मनो को खौफज़दा करता रहा । आखिरकार खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा 23 मार्च 1988 को यानी भगत सिंह की शहादत के ठीक 57 साल बाद गोलियों से छलनी कर मार डाला गया ।
जिंदगी के बारे मे पाश लिखता है


तुम यह सभी कुछ भूल जाना मेरी दोस्त,
सिवाय इसके
कि मुझे जीने की बहुत लालसा थी
कि मैं गले तक जिंदगी मे डूबना चाहता था
मेरे हिस्से का भी जी लेना, मेरी दोस्त
मेरे हिस्से का भी जी लेना ।
-मै अब विदा लेता हूँ कविता से

(पाश की इस कविता को जानी-मानी अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने अपनी आवाज दी है उसका यूट्यूब लिंक है - https://youtu.be/l_EoqwrBpYw

Monday, August 14, 2017

जश्न-ए-आजादीः क्या सचमुच आजाद हैं हम ??


पन्द्रह अगस्त आ गया है । गली नुक्कड़ और चौराहे छुटभैय्ये नेताओ के पोस्टर होर्डिंगो से भर चुके हैं । पिछले तीन दिनो से न्यूज पेपर और प्राइम टाइम मे देशभक्ति की अविरल गाथाए गाई गयी होंगी । टीवी पर भारत-पाक मुद्दे पर बनी फिल्में प्रसारित की गयी होगी । लोग फेसबुक व्हाट्स एप पर तिरंगे की डीपी लगाए होंगे और एक दूसरे को "हैप्पी इंडीपेंडस डे" की मुबारकबाद दे रहे होंगे । लम्पट, चोर, मर्डरर, दलाल और रेपिस्ट नेता भी राष्ट्रीयता पर लम्बे चौड़े भाषण देंगे और हमे राष्ट्र के प्रति जीने का कायदा बताएंगे लेकिन इस बीच गिने चुने प्रगतिशील लोगो को छोड़ कर कोई भी पिछले सत्तर साल के घटनाक्रम पर कोई विवेचना नही करेगा । शाम ढल जाएगी और लोग देशभक्ति के चोले को उतार कर अलमारी मे तह करके रख देंगे ।
नेहरू का "किस्मत से वादा" भारत के लोगो को घूर रहा है और इससे किसी को कोई फर्क नही पड़ता ।

आज से सत्तर साल पहले उन्होने कहा कि हम अंधेरे से उजाले के युग मे प्रवेश कर रहे हैं । कभी न आने वाले इस उजाले की कीमत हमने डेढ़ करोड़ लोगो को बेघर करके और लाखो लोगो की हत्या करके अदा की । दो मुल्को के काॅन्सैप्ट ने हमारी खुशियो मे आग लगा दी । हमे समझना था कि ये बंटवारा किसी प्राकृतिक आपदा से नही हुई थी । कोई जलजला नही आया था न ही धरती अपने आप फटी थी । चंद सम्पत्तिशाली घरानो के लालच और सत्ता के नशे ने एशिया के सबसे ताकतवर भविष्य पर अपने फायदे की लकीर खींच कर इसे कमजोर कर दिया । जिन्ना और नेहरू का ये सौदा जनता के लिए आखिर घाटे का सौदा साबित हुआ । हमे नही पता था चंद लोगो की महत्वकांक्षा करोड़ो लोगो के जीवन मे तूफान ला देगा । जिन्ना और नेहरू ने अपने हिस्से जरूर बांट लिए लेकिन उन्ही हिस्सो पर मुकम्मल आजादी की खुशी न दे सके, उल्टे जमीन के एक टुकड़े पर अपनी सारी ताकतें खर्च करते चले गये । भारत-पाक युद्धो ने देश को वक्त से पीछे धकेल दिया ।
शुरूआती दौर मे ही भारत के अवसरवादी नेताओ ने भारी गलतिया की, जिसका असर हम आज तक देख रहे हैं । वो समाजवाद की दिशा मे बढ़ने के बजाए पब्लिक सेक्टर के नाम पर देश को कारपोरेट के चरणो मे शनै-शनै समर्पित करते चले गये, आज सत्तर साल बाद हम देखते हैं कि अमीर और अमीर होता चला गया और गरीब, गरीबी रेखा से नीचे ।

कहने को हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं । हम अपनी सरकार खुद चुनते हैं और देश चलाते है लेकिन हकीकत तो ये है कि हर पाँच साल पर हम एक मदारी चुनते हैं जो पूंजीपतियों के इशारो पर हमे जम्बूरा बना कर मनचाहा नाच नचाता है  । हमे लगता है हम आजाद देश के बाशिंदे हैं और इसीलिए हर साल पन्द्रह अगस्त को 'सत्ता का हस्तानांतरण' का जश्न मनाते हैं । हमारा लोकतंत्र एक भ्रम है । किसी महान लेखक ने कहा था कि "यदि लोकतंत्र से कुछ बदलाव आ सकता तो वें इसे ही बदल देते"
ये लोकतंत्र जो हमे मुकम्मल आजादी देने का दावा करता है, झूठ है फरेब है । ये लोकतंत्र जनता की व्यवस्था नही बल्कि पूंजीवाद की राजनीतिक व्यवस्था है, जो ये भ्रम फैलाता है कि मुल्क मे सब बराबर हैं । हमे समझाना होगा कि हमारा देश दो वर्गो मे बंटा है शोषक और शोषित ।  इस देश मे जो भी अपना श्रम कारपोरेट के दुकान पर बेंच रहा है शोषित है फिर वो चाहे दिहाड़ी मजदूर हो या किसी मल्टीनेशनल कंपनी का सूटेड-बूटेड कर्मचारी । और मजदूरो का शोषण करके बड़े-बड़े एम्पायर खड़ा करने वाला शोषक ।
पूंजीवाद की गुलाम ये लोकतंत्र शोषित और शोषक मे भला क्या बराबरी दे सकती है ?
राजनीतिक स्वतंत्रता के नाम पर ये सिस्टम मजदूरो को वोट देने भर की आजादी देता है जबकि पूंजीपतियो को शासन करने की आजादी ।
पैसे के बल पर पूंजीपति न्याय, कानून और शासन को अपने मातहत कर लेता है । जो चाहे खरीद सकता है जो चाहे बेच सकता है जबकि शोषित के पास खरीदने के लिए सिर्फ रोटी और बेचने के लिए अपना जिस्म भर ही होता है । फिर ये कैसी बराबरी ???
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था भी कारपोरेट हितैषी है । लगातार शिक्षा बजट मे कटौती, विश्वविद्यालयो मे विमर्श पर हमला वैचारिक रूप से आने वाली पीढी को पंगु कर रही है ताकि कारपोरेट की मनमानी पर कोई सवाल न उठा सके साथ ही उन्हे चीप लेबर मिलता रहे, जो उनके उत्पादन को बिना सवाल किए बढ़ाते रहे । ताकि गरीब हमेशा गरीब रहे और अमीर और जादा अमीर बन जाए । भविष्य मे उन्हे लेबर की कमी न रहे इसलिए बेरोजगारो की फौज तैयार की जा रही है और धीरे धीरे ट्रेड यूनियनों को भी खत्म किया जा रहा है ।
बढ़ती बेरोजगारी मे लोग अपने जिंदगी के बदले अपनी स्वतंत्रता कारपोरेट के हाथों गिरवी रख देंगे । जब राजनीति हमारा भविष्य तय करने लगे तो हमे राजनीति का भविष्य तय कर देना चाहिए ।
गरीब और अमीर की खाई भयावह तरीके से बढ़ रही है । एक तरफ गरीबी के मामले मे भारत विश्व मे 126 वें स्थान पर है जबकि दूसरी तरफ भारत के पूंजीपति दुनिया के धनी लोगो की लिस्ट मे अपना नाम बनाए हुए हैं । एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार भारत के 52 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधन पर भारत के एक प्रतिशत लोगो का कब्जा है । जल जंगल जमीन की अंधाधुंध लूट मे इन पर आश्रित लोगो को विस्थापित किया जा रहा है आवाज उठाने पर उन्हे कुचला जा रहा है । नक्सलवाद का फैलाव इन्ही पूंजीवाद और सरकारी मनमानी का नतीजा है ।
भगत सिंह ने हमे पहले ही आगाह किया था कि कांग्रेस के रास्ते गोरे अंग्रेज तो चले जाएंगे लेकिन उनकी जगह भूरे अंग्रेज आ जाएंगे । इन भूरे अंग्रेजो और उनके भ्रष्ट सिस्टम को हटाकर वैज्ञानिक समाजवाद लाना सही मायनो मे आजादी होगी ।
पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश के शब्दो मे " जिस दिन भगत सिंह को फाँसी हुई  उसके कमरे मे लेनिन की किताब मिली जिसमे एक पन्ना मुड़ा हुआ था । हिन्दुस्तान की जवानी को उसके मोड़े हुए पन्ने से आगे जाना है"
सच्ची आजादी की इस लड़ाई मे युवाओ को नेतृत्व अपने हाथ मे लेना होगा और गरीब किसान, मेहनतकश मजदूरो के बीच जाकर उन्हे वर्ग-चेतना की शिक्षा देनी होगी उन्हे समझाना होगा कि उनके असली दुश्मन कौन हैं । राजनीति के बहकावे मे आकर सामप्रादायिक झगड़ो से दूर रहना होगा और धर्म, जाति, रंग, और क्षेत्र के भेद को मिटाकर एकजुट होकर अपनी शक्ति लुटेरी सरकार और पूंजीवाद के खिलाफ लड़ने मे लगाना होगा । तभी ये देश अपनी मुकम्मल आजादी हासिल कर सकेगी और देश का हर आदमी खुशहाल हो सकेगा और हम हर दिन आजादी का जश्न मना सकेंगे ।
इंकलाब जिंदाबाद ।
-सम्राट विद्रोही

Tuesday, May 9, 2017

बीड़ी पे चर्चा

एलयू के छात्रावास प्रवास के दौरान अक्सर महीनें खत्म होने से पहले कड़की आ जाती थी । खाली जेब, बढ़ती मंहगाई, देर रात बीसी और धुँआ फूंकने की चर्राई हुई शौक को बचाने की जुस्तजू । ये वो परिस्थितयाँ थीं जिसने बीड़ी से दोस्ती कराई। इसी बहाने हम चार-पाँच लोग इकट्ठा होते थे और फिर पूरी रात बहसबाजी होती थी ।
रात की खामोशियों में जब पूरा शहर सो रहा होता रैम्ब्रांट, मोने-माने, विंची, माइकेएंजलो, टर्नर और पिकासो जी उठते, उनकी कृतिया बोल उठती । मोनालिसा न जाने कितनी बार हम लोगो के साथ सिस्टाइन चैपल (एमएफए वाली खंडहर) के नीचे बैठकर बीड़ी पीती । गुएर्निका अपना दुखड़ा सुनाती ।

लखनऊ के एक कोने मे बैठकर हम यूरोप की आर्ट गैलरी घूमते तो कभी लंदन का लैंडस्कैप बनाते । जब कभी हम फ्रसटेट होते तो लगता कि हम ही वान गाॅग है और अपनी बीड़ी उसका ब्रश । तकलीफ इस बात की थी कि हम कभी उसके चवन्नी बराबर भी न पहुँच सके तसल्ली इस बात की थी कि फ्रस्टेशन मे उसकी तरह कभी कान नही काटे ।
यूरोप से निकल कर जब हम इंडिया पर बहस करते तो लीजेण्ड रवि वर्मा, अमृता शेरगिल, यामिनी राय और हुसैन साहब देशी मोर्चे पे साथ होते ।
हुसैन साहब की स्ट्रगल वाली कहानियाँ जिसमें कमर्शियल आर्ट उनकी गर्लफ्रेंड होती तो ट्रेडिशनल आर्ट उनकी बीवी । एक उनके लिए जीविका का जुगाड़ करती तो दूसरी सूँकून की । ऐसी कहानियो से रातें पट जाती थीं । हास्टल से निकल कर जब हम मुक्ताकाशी थिएटर से घूम कर एमएफए के खंडहरो की तरफ जाते तो अजंता-एलोरा की विरानियाँ सन्नाटे मे घुल जाती । दोनो तरफ ऊँचे लम्बे अशोक के पेड़ के बीच से उजड़ी सड़क किसी पहाड़ी पर होने का एहसास कराती । कास्टिंग के लिए रखे पत्थरो पे बेतरतीब लेटे-बैठे न जाने कितनी बीड़ियाँ हमारे गुफ्तगू में साथ देतीं । राजनीति के रेलम पेलाई से लेके वाॅश, म्यूरल, फैब्रिक, मेटल-कास्टिंग, कंपोजीशन, क्ले-माॅडलिंग, फोटोग्राफी, लाइटिंग और न जाने कितनो विषयों पर थीसिस रचे जाते । छोटे-छोटे टाॅपिक पे लंबी-लंबी बहसे होती । नये नये आइडियाज़ खोजे जाते । एक बार तो हमारे एक मित्र ने "फाल ऑफ मैन" से प्रेरित होके "फाल ऑफ एमएफए" रच डाला ।

भगत सिंह ने किसी किताब मे कहा था कि कवि कलाकार और क्रांतिकारी एक ही पदार्थ से बने होते है साथ ही उन्होने सिगरेट और क्रांतिकारी जीवन पर भी एक सकरात्मक लाइन बोली थी ।
शायद यही वजह है कि कभी मेरे मन में ये ख्याल नही आया कि बीड़ी पीना बुरा है । हाँ ! कुछ लोग इसे खराब स्टेटस की पहचान मानते हैं तो वो ठेंगे से । हमारे काॅलेज के लाखों कमाने वाले कई प्रोफेसर तो बकायदा खैनी रगड़ के खाते थे और इस बात का अक्सर हम लोग मजाक बनाते थे । हम लोगो को तो लगता था कि तंबाकू सेवन तो आर्टिस्टो का जन्म-सिद्ध अधिकार है ।

हाल ही मे जामिया मिलिया इस्लामिया में मेरे लखनऊ के दिनो के एक मित्र मिले । मिलते ही उन्होने पूछा "बीड़ी पियोगे" ?
"नेकी और पूछ-पूछ" ?
फिर हम बीड़ी पीते रहे और घंटों कालेज के दिनों को याद करते रहे।
फिलहाल अब तो बीड़ी का शौक छूट गया है लेकिन फिर भी कभी कश लेता हूँ तो लखनऊ आर्ट काॅलेज और वहाँ के बिछड़े दोस्त याद आ जाते हैं ।

-सम्राट विद्रोही


Wednesday, May 3, 2017

यायावर की डायरी -1

यहाँ शायद ही कोई ऐसा होगा जो घूमने-फिरने का शौकीन न हो । ट्रैवलिंग एक तरह का आर्ट है जिसकी एबीसीडी फैमिली ट्रिप से शुरू होती है । फैमिली के साथ तीर्थ-स्थान पर भ्रमण ट्रैवलिंग की एलकेजी है । एक उत्तर भारतीय के लिए अयोध्या, काशी, मथुरा-वृंदावन और वैष्णो-देवी आइडल फैमिली ट्रिप होते है । फिर स्कूल-कालेज टूर मे जयपुर, लखनऊ, खजुराहो, पटना और कलकत्ता जैसे ट्रिप मे हमे कुछ जानने सीखने का हुनर मिलता है । दोस्तो के साथ गोवा, जैसलमेर मुम्बई पाण्डुचेरी जैसी भिन्न सांस्कृतिक डेस्टिनेशन पे मौज मस्ती हमारे घूमने के भूख को जगाती है । ये ऐसी जगहे है जहाँ से घूम कर आपकी ट्रैवलिंग की क्षमता, प्लेजर को बढ़ाती है इसी रास्ते से होके आप बैकपैकर्स बनते हैं । आज की व्यस्त लाइफस्टाइल मे घूमना फिरना थोड़ा खर्चीला और टाइम टेकिंग हो जाता है इस बात को समझते हुए ट्रैवलिंग का एक बाजार खड़ा हो गया है । अब तमाम ट्रैवलिंग एजेंसिया खुल गयी है जो आपके बजट मे पैकेज उपलब्ध करवाती है लेकिन इसकी लिमिटेशन एक बड़ी खामी है । मेरे मुताबिक एक अच्छे ट्रैवलर को इन पैकजो से बचना चाहिए । आमतौर पर लोग ट्रैवलिंग को खर्चीला शौक मानते हैं बेशक ये है लेकिन इतना भी नही जितना हम सोचते हैं । यायावरी मैनेजमेंट और शौक के बीच की कला है जिसमे पारंगत होने मे थोड़ा वक्त लगता है तो अगर आप एक ट्रैवलर बनना चाहते है तो मैं आपको बताऊँगा किस तरह आप कम से कम खर्चे मे ट्रैवलिंग का पूरा आनंद ले सकते हैं ।

1- ट्रैवलिंग मे हर तरह की तकलीफो से जूझने को मेंटली प्रिप्रेयर्ड रहिए मसलन, भीड़-भाड़ और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते वक्त नखरे न कीजिए ।

2- अगर आप कई जगहो की ट्रिप पे निकले हैं लम्बी दूरी के लिए रात का सफर कीजिए, इससे आप होटल के खर्चे से बचेंगे ।

3- बड़े रेस्टोरेंट के बजाए लोकल फूड का स्वाद लीजिए ये आपका बजट भी मैंटेन रखेगा और आप लोकल कल्चर को अच्छे से समझ पाएंगे ।

4- होटल लेते वक्त जम कर मोलभाव कीजिए ।

5- सामान कम से कम रखिए  ।