Monday, September 14, 2020

मौजूदा लोकतंत्र में भारतीय मीडिया की भूमिका

 आज अंतराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस है, लेकिन निष्पक्ष भारतीय मीडिया के लिए रोकतंत्र दिवस है और दिवस कई वर्षों से बरकरार है ।



कहते हैं मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है । क्या सच में ऐसा है ? लोकतंत्र में मीडिया को विपक्ष की भूमिका में होनी चाहिए जो सरकार के सही कदम की सराहना अवश्य करें लेकिन गलत फैसलों का पुरजोर विरोध भी करे । भारत में पत्रकारिता के इतिहास पर नज़र डाले तो देखेंगे कि भारत का पहला समाचार पत्र 'बंगाल गज़ट' एक अंग्रेज जेम्स ऑगस्टस हिक्की द्वारा प्रकाशित किया गया । हिक्की को भारत में पत्रकारिता का जनक भी माना जाता है । हिक्की नें भारत में अंग्रेजों के भष्ट्राचार को निष्पक्षता और निडरता से प्रकाशित किया, यहाँ तक कि उच्च अधिकारी और वायसराय वाॅरेन हेस्टिंग्स तक के काले कारनामों को उजागर किया । इस बात से खफ़ा प्रशासन ने तमाम कोर्ट केस किए, प्रेस तोड़ डाले । हिक्की को तब तक टाॅर्चर किया जब तक 'बंगाल गजट' का प्रकाशन बंद नहीं हो गया । हाँलाकि हिक्की से प्रेरणा लेकर देश के अलग अलग हिस्सों में भारतीयों नें पत्रकारिता की शुरूआत की लेकिन अंग्रेज अफसरों ने हर किसी का दमन जारी रखा । अंग्रेज विरोधी समाचार पत्र और पत्रकारों का दमन 1947 तक जारी रहा । इस दौरान अंग्रेज विरोधी समाचार, कहानी, निबंध हर चीज़ को जब़्त किया और उसे नष्ट कर दिया गया । प्रेमचंद की पहली रचना 'सोज़े-वतन' भी इसी आग की भेंट चढ़ गयी । हाँलाकि आज़ादी के बाद समाचार-पत्र और पत्रकारों को खुली छूट मिली । आखिर उन्हे 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' का अधिकार मिल चुका था । एक लोकतांत्रिक देश में 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' का बहुत ज्यादा महत्व होता है ।



इसकी एक बानगी देखिए, भारत-चाइना के संबंध बिगड़ने के शुरूआती दौर में मुम्बई के प्रदर्शनकारियों नें रिपब्लिक ऑफ चाइना के फाउंडर माओ के तस्वीर पर टमाटर और अंडे फेंके जिसे किसी विदेशी पत्रकार नें अपने समाचारपत्र में प्रमुखता से प्रकाशित किया । बात जब चाइना पहुँची तो तात्कालिक राष्ट्रपति चाओ एन लाई नें नेहरू को पत्र लिखकर इस बात का विरोध किया और इसे चीन की बेज्जती समझते हुए प्रदर्शनकारियों पर कार्यवायी की मांग की ।उनके इस पत्र पर दो टूक जवाब देते हुए नेहरू ने कहा कि भारत चाइना नहीं है, ये एक लोकतांत्रिक देश है यहाँ लोग विरोध के नाम पर मुझे और गांधी जी को नहीं छोड़ते तो भारतीयों के लिए माओ क्या चीज हैं ?नेहरू के इस जवाब से चाउ एन लाई बौखला गये थे, क्योकि माओ चाइना में पूजनीय थे ।



नेहरू काल तक मीडिया ने विपक्ष की भूमिका निभाई । आजादी के बाद देश को नवनिर्माण के दौर से गुजरना था जिसमे मीडिया नें सरकार की हर छोटी बड़ी गलतियों की आलोचना की । उस दौर को भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम युग माना जाता सकता है । इंदिरा काल में इमरजेंसी के दौरान एक बार फिर पत्रकारिता के दमन का दौर शुरू हुआ । कहते हैं उस वक्त पूरी अख़बार काली आती थी क्योंकि जो खबर भी सरकार विरोधी लगती थी उस पर कालिख पोत दी जाती थी । उस दौर में मीडिया माध्यम में समाचारपत्र, टेलीविजन और रेडियो ही प्रमुख थे । कांग्रेस काल में 2010 के आसपास का वक्त एक बदलाव लेकर आता है । बंदे बंदे के पास स्मार्ट फोन और इंटरनेट की पहुँच थी लोग ऑर्कुट, फेसबुक और व्हाट्स एप से एक दूसरे से जुड़ने लगे थे । 2012 मे निर्भया आंदोलन में सोशल मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । सोशल मीडिया से शुरू ये आंदोलन इस कदर सफल रहा कि इसी फार्मूले पर लोकपाल आंदोलन नें भी लोगों को कांग्रेस विरोधी पूर्वाग्रह डेवलप करने मे मदद की । इस बात का फायदा उठाकर केजरीवाल सीएम की कुर्सी पर पहुँचते हैं तो मेनस्ट्रीम मीडिया को इंफ्लुएंश करके भाजपा केन्द्र में पहुँचती है । बीजेपी के मीडिया पर कंट्रोल इस कदर हावी हो चुका है कि आज प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में, शिक्षा, रोजगार, अर्थव्यवस्था और मानवाधिकार जैसे मुद्दे ऐसे गायब हो चुके हैं जैसे गंजे के सर से बाल । आज मेनस्ट्रीम मीडिया में प्रथानमंत्री का यशोगान, मंदिर निर्माण, भारत-पाक जैसे मुद्दे निरंतर रीपीट होते हैं । देश के लिए अहम सवाल ये नहीं रह गया है कि शिक्षा और अर्थव्यवस्था कहाँ जा रही हैं, रोजगार के अवसर कब आएंगे, कोरोना निवारण के लिए समुचित उपाय किए जा रहे हैं या नहीं बल्कि अहम सवाल ये है प्रधानमंत्री आम चूस कर खाते है या काट कर । ये कितना हास्यास्पद लगता है । ऐसा लग रहा है रोम फिर से जल रहा है और नीरो का वायलन बजाना देश के लिए सुखद टेलिकास्ट है । भारतीय मीडिया के लिए ये एक पेड इमरजेंसी है जिसमे उन्हें ये दिखाना है कि देश में सब ठीक हैं । उप्र में राम मंदिर और रामराज्य की खबर के नीचें रेप, हत्या, लूट, फिरौती, की खबरें कब दब जाती है किसी को कुछ पता नहीं चलता ।

न्यूज़ रूम अब खुद को सीबीआई का मेन ब्रांच और एंकर खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज समझने लगे हैं । रिया-सुशांत के केस में जिस तरह रिया को काला जादू करने वाली, ड्रग्स लेने वाली, बदचलन साबित करने की कोशिश की गयी और न्यूज रूम के कथित न्यायधीशों नें उसे अपराध सिद्ध हुए बिना अपराधी घोषित कर दिया । इसका प्रभाव लोगो पर इस कदर पड़ा कि लोग हर बंगाली लड़की को शक की निगाह से देखने लगे । जबकि इल्लीगल कंस्ट्रक्शन पर बुलडोजर चलाने पर कंगना की शिवसेना विरोधी आवाज पर बीजेपी नें उसे नेशनल हिरोइन बना कर वाई श्रेणी की सुरक्षा तक दे डाली । ये सब देखकर समझ ही नही आता लोकतंत्र में मीडिया किस दिशा में जा रहा हैं । आज से दस साल पहले मनमोहन-सोनिया और राहुल गांधी पर जोक्स बहुत वायरल होते थे लोग खुलकर विरोध की बात कर सकते थे लेकिन वही चीज़ अगर आप आज करें तो आप राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही और नक्सली कहलाएंगे । आज हालात ये हैं कि सरकार या सरकार के किसी करीबी के कार्टून या ट्वीट पर आपको जेल तक जाना पड़ सकता है । वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और पत्रकार प्रशांत कनौजिया इसके नवीनतम उदहारण हैं ।



इसी सरकार के लोकतंत्र में सच बोलने के लिए गौरी लंकेश, गोविंद पानसरे,नरेन्द्र दाभोलकर जैसे महत्वपूर्ण लोगों की हत्या हो जाती है तो वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को जान से मारने की धमकी दी जाती है उनकी माँ बहन को गाली दी जाती है । इस दौर में 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' सिर्फ बीजेपी समर्थकों को हासिल रह गया है ताकि वो अपने विरोधियों को जी भरकर गालियाँ दे सकें । इस लोकतंत्र में अगर सच बोलने के लिए जगह नहीं है तो ये लोकतंत्र नहीं है । ये एक विचारधारा विशेष की तानाशाही और अघोषित इमेरजेंसी से कम कुछ भी नहीं है ।

ऐसी स्थिति में एक पैरलल मीडिया की जरूरत है जो लोगो के आँखों से पर्दा हटाने का काम करें । ये इसलिए जरूरी है क्योंकि भविष्य में एक तबाह देश की जेनरेशन अगर हमसे सवाल पूछे कि जब देश लुट रहा था तब आप क्या कर रहे थे, उस वक्त के लिए हमें शर्मिन्दा होकर चुप रहने के बजाय जबाव देने के लिए शब्द रखने चाहिए । हम जीते या हारें ये मायने नहीं रखता गलत और दमन के खिलाफ हमारा लड़ना मायने रखता है ।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सच के लिए लड़ने के लिए अब हमे तैयार रहना होगा तभी ये लोकतंत्र बच सकेगा । हमें अपने लिए, अपने देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, आने वाली जेनेरेशन के लिए आवाज उठानी ही होगी ।

दुष्यंत कुमार के शब्दों में

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।


-सम्राट विद्रोही