Thursday, December 31, 2020

कतर्निया घाट : रोमांच, सूकून और एडवेंचर

बहुत उकता गया हूँ यार,

क्यों क्या हुआ ?

अब क्या ही बताएँ ? शादी हुई होती तुम्हारी, तो समझ में आता ।

अरे ! ऐसा क्या है भाई जिसे समझने के लिए शादीशुदा होना जरूरी है ।

जब तुम्हारी होगी तब समझ आएगी,

जाको पाव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई

ऐसा नही है भाई । परेशान होने के लिए शादीशुदा होना कभी कोई शर्त नही रही है रंडुए भी परेशान ही रहते हैं ।

लेकिन रंडुओ पर परिवार की जिम्मेदारी नही रहती ।

'हाँ ये बात तो है' कहकर दोनो खिलखिलाकर हँस पड़े ।

तो चलिए कहीं घूम आते हैं

कहाँ चलें ?

नेपाल चलें ?

बाॅर्डर बंद है

सर्दियाँ हैं हिमाचल या उत्तराखंड चलें

कोरोना भी है

दिल्ली ?

प्रदूषण है

अच्छा फिर आसपास में कहीं ?

हाँ चलेगा

श्रावस्ती ?

सब बंद है ।

कहीं नेचर में चलें ?

हाँ ये ठीक है ।

कितने दिन ?

2-4 दिन ठीक रहेगा ?

हाँ एकदम ।

सामान पैक करो, मैं बुकिंग करता हूँ । 


अगर आप भी हैं हैरान-परेशान दुनियावी झमेलों से, फर्जी लाॅटरी के मेलों से, फेल होने की आहट से, बाॅस की झुंझलाहट से, भोजपुरिया गानों से, बीवी के कड़वे तानों सें, भक्त-शिरोमणि भूषण से, दिल्ली के प्रदूषण से तो ये लेख हैं बस आपके लिए, हर उस इंसान के लिए जो सर पर दुनियादारी का बोझ लिए बस चला जा रहा हैं और एक अदद सुकून के लिए मरा जा रहा है ।

बीते कुछ सालों जो मैनें खुद भी महसूस किया है कि आज का दौर डिप्रेशन का दौर हो चला हैं, बच्चा पैदा बाद में होता है डिप्रेशन का डोज पहले ले लेता है । शायद इसकी वजह तेजी से बदलती ग्लोबलाइजेशन वाली दुनिया, उटपटांग खान-पान, नशाखोरी और बेहद बिजी लाइफस्टाइल है । ऐसा मुझे लगता है, आपको क्या लगता है ! सोचिएगा ।

अगर मेरी सोच सही है तो इस समस्या को बदला तो नही जा सकता लेकिन कुछ हेर-फेर कर एडजस्टमेंट जरूर किया जा सकता है । इस समस्या का मूल जड़ है इंसान का प्रकृति से दूर जाना और मेरी लेख का विषय भी आज यही है । प्रकृति का मतलब आज शहरी लोगो ने लोहिया पार्क और जनेशर मिसिर पार्क समझ लिया है और इसमें गलती उनकी भी नही है, कंक्रीट के जंगल में रहने वालों के लिए प्रकृति का मतलब और हो भी क्या सकता है ?

बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए झोंकमझोंक जंगल साफ किए गये, जहाँ जंगल थे आज वहाँ खेत है, जहाँ खेत थे वहाँ मल्टीप्लैक्स, माॅल, अपार्टमेंट और बंगले लहलहा रहें हैं । इंसानों की इस चौड़ाई ने न जाने कितने वन्यजीवों को निगल लिया । चीता और शुतुर्मुर्ग जैसे जीव आज भारत की धरती से सफाचट हो गये हैं और बहुत से जीव गायब होने की कतार में लगे हैं । टोनी स्टार्क के लहज़े में कहें तो जो खोए हैं उन्हे वापस लाना है और जो हैं उन्हें खोना नही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । सरकार को अंबानी-अडानी की जी हुजूरी करने के बजाए पर्यावरण और वन्यजीवों को बचाने की तरफ भी ध्यान देना चाहिए । जनसंख्या पर नियंत्रण हो ताकि सबको बराबर संधाधन और अपरच्युनिटी मिल सके । कल को सच में थैनोस आ गया भागते भूत की लंगोटी भी न मिलेगी । अभी ऐसा भी नही है कि हमारा पास वन्य संसाधन खत्म हैं लेकिन जो हैं नाकाफी है । अभी हमारे पास पचास से अधिक नेशनल पार्क हैं । जिनमें जिम कार्बेट उत्तराखंड, काजीरंगा नेशनल पार्क आसाम, मानस नेशनल पार्क आसाम, नंदा देवी फ्लावर वैली उत्तराखंड, साइलेंट वैली नेशनल पार्क केरला, राजाजी नेशनल पार्क उत्तराखंड, दुधवा नेशनल पार्क उत्तर प्रदेश, सरिस्का नेशनल पार्क राजस्थान ब्ला ब्ला ब्ला प्रमुख हैं ।अगर आप उत्तरप्रदेश से हैं और लखनऊ के आस पास कहीं प्रकृति में घूमना चाहते हैं तो दुधवा नेशनल पार्क और कतरनिया घाट वन्य जीव प्रभाग आपके लिए बेहतर ऑप्शन हो सकता है ।



परवेज भाई, राशिद भाई और मैं तीनों नवोदयन गोण्डा से सुबह-सुबह साढ़े सात बजे तक निकल चुके थे । गोण्डा से नानपारा और नानपारा से मिहिंपुरवा पहुँचे । मिहिंपुरवा कस्बे को पार करते ही जंगल शुरू हो जाता है । ऊँचे-ऊँचे साखू के पेड़ आँखो को लज्जतदार सूकून देते हैं । मिहिंपरवा से तकरीबन 42 किलोमीटर पड़ता है कतरनिया । उन रास्तों से गुजरना और जगह जगह जानवरों के साइनबोर्ड को पढ़ना रोमांचक होता है ।



जंगल के भीतर पहुँचकर जब हम पक्की सड़क छोड़कर कच्चे रास्ते से रमपुरवा रेस्ट हाउस की तरफ़ बढ़ रहे थे उस वक्त दिल में एक अजीब सी खुशी हिलोंरे मार रही थी । मैं बार-बार विंडो खोलकर फ्रेश एयर और नज़ारों का लुफ्त लेता और बार राशिद भाई खिड़की बंद करने को कहते । उनको लगता था कहीं से कोई तेंदुआ या टाइगर अटैक न कर दे । खैर, रमपुरवा पहुँचने तक हमें सिवाय बंदर के कुछ न दिखाई दिया । लेकिन प्रकृति का बीच में पहुँचकर जो हमें मिला वो बहुत कीमती था । 

तीन तरफ से लम्बें चौड़े वृक्षों से घिरा रमपुरवा रेस्ट हाउस अपने आप में इतिहास हैं । 1878 में बना रमपुरवा रेस्ट हाउस अंग्रेजों नें प्रकृति विचरण और इंडो-नेपाल बाॅर्डर पर निगरानी हेतु अधिकारियों के लिए बनवाया था । जो 2008 से पर्यटकों के लिए खुला है ।

रमपुरवा रेस्ट हाउस


रेस्ट हाउस पहुँच कर हमना अपनी बुकिंग कंफर्म की और थारू हट के रास्ते कतरनिया ऑफिस की तरफ निकल पड़े । चारो तरफ से घिरे जंगलों के बीच छोटा सा गाँव जिसे थारू हट कहते हैं । थारू इंडो-नेपाल बाॅर्डर की बहुत प्रचलित जनजाति है जो पहले खानाबदोशीं का काम करते थे ।

ये गाँव आज भी अपने पारंपरिक रूप में हैं जैसा हम बचपन में गाँवो को देखा करते थे । कच्चे खपरैल और साफ-सुथरे घर, घर के बार लगी बाड़ जिसमें मवेशी जुगाली करते दिख जाएंगे । सड़को पर बत्तख और मुर्गिया घूमती दिख जाएंगी । कुल मिलाकर ये आपको अपने बचपन की गलियों की सैर करा देगी ।

वहाँ से कतरनिया लगभग आठ किलोमीटर है ।

वहाँ से हम कतरनिया पहुँचे और इंट्री टिकट लेके गाड़ी पार्क की । अंदर ही आपको कैफेटेरिया मिल जाएगा जहाँ आप अपनी पसंद का खाना खा सकते हैं ।

कैफेटेरिया में टाइट जलपान करके हम जंगल सफारी के लिए निकले । जंगल सफारी आमूमन दोपहर दो बजे के बाद शुरू होती है और हम तकरीबन 12-1 बजे पहुँच गये थे मतलब हमारे पास पर्याप्त समय था । हमारे टूरिस्ट गाइड चुन्ना भाई ने बताया कि सफारी के पहले आप लोग पास के बैराज तक घूम सकते हैं ।

बैराज


उनके बताए हुए कच्चे रास्ते से गुजरते हमने दर्जनों हिरनों के झुंड देखे जो पगडंडी के दोनो साइड कानों को खड़ा किए हैरत से हमारी तरफ देख रहे थे ।

कुलांचे भरता बारहसिंहा
आधा रास्ता तय करते ही सड़क किनारे दो हाथी दिखाई दिए । यूँ तो शहरों, सर्कस और चिड़ियाघर में बहुत हाथी देखे लेकिन जंगली हाथी का देखना अपने आप में एक अलग रोमांच होता है ।

जंगल का रास्ते में मिला हाथी

चूँकि इस तरह के जंगल में पहला विचरण था हमारा और उधर हम लोग अकेले भी थे इसलिए हमने तय किया कि हम चलते ही रहेंगे और जंगल का नज़ारा लेंगे ।  तकीबन 10-12 किलोमीटर जंगल के रास्ते चलते हुए हम बैराज पहुँचे । जहाँ नेपाल से चलकर गेरूआ नही घाघरा बन बन जाती है । जब हम पहुँचे तब बैराज से पानी छोड़ा जा रहा था । जहाँ तक नज़र जाती थी बस पानी-पानी ही नज़र आ रहा था और बैराज से गरजती पानी की आवाजें पैरों में झुरझुरी पैदा कर रही थी । मुझे पानी से ज्यादा डर लगता है इसलिए हम ज्यादा देर नही रूकें और फोटो विडियो निकाल कर चलते बने क्योकि हमें दो बजे सफारी के लिए भी निकलना था । वहाँ से वापस आते वक्त भी हमें हिरनों के तमाम झुंड मिले ।

वापस आकर हमने सफारी के लिए जिप्सी बुक किया और तकरीबन 3 बजे हम सफारी से जंगल के अंदर दाखिल हुए ।

तकरीबन डेढ़-दो घंटे हम जंगल के भीतरी हिस्से में रहे, हिरन, गरूड़, लंगूर और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष निगहबान रहे ।



टाइगर ग्रास के बीच से जब हमारी गाड़ी गुजरती और पत्तियों से सरसराहट से कुछ आहट होती तो बदन के पूरे नसों में एक सनसनी सी कौंध जाती । आखिरी में हम नदी किनारे एक शांत जगह रूके जो बहुत ही मनोरम थी । सनसेट का वक्त था और नदी के बीच में उभरे टीले पर मगरमच्छ लकड़ी जैसे पड़े थे ।

वहाँ से हम जल्द वापस निकलना चाहते थे क्योकि शाम ढलने लगी थी और ऐसे में जंगल के बीच रूकना 'सेफ' नही था ।

वापस आकर हमने अपनी गाड़ी ली और थारू हट के रास्ते रमपुरवा जाने लगे । थारू हट पहुँचकर हमने गाँव को करीब से देखा । वहीं अंडे खाए, मूंगफलियाँ खरीदी और लोगो से बातचीत करने लगे । वहीं एक गाँव वाले से बात करते हुए मालूम चला कि पिछली रात ही एक तेंदुआ गाँव से एक कुत्ता उठा ले गया है । ये सुनकर ही रगों में एक सिहरन सी उठी । अंधेरा हो चला था और हमें अपने ठिकाने पर भी पहुँचना था ।

रमपुरवा पहुँच कर हमने चौकीदार रमेश को खाना बनाने को कहा । रमेश ने बखूबी हम लोगो की मेजबानी की ।

राशिद भाई और रमेश (बीच में) के साथ

सात बजे तक खाना पीना खाकर हम लोग बात करने बैठ गये । शहरी जीवन और जंगल के जीवन को एक तराजू में तौलते हुए आकलन किया जा रहा था कि यहाँ के जीवन में क्या 'एडवांटेज' है और क्या 'डिसएडवांटेज' ।

तभी मुझे याद आया कि गाड़ी में कुछ जरूरी सामान छूट गया है और मुझे उसे लेने जाना था । भाई लोगो के सामने हिम्मत तो दिखा दी कि मैं जा रहा सामान लेने लेकिन जब मैं दरवाजे पर पहुँचा और दरवाने को खोलकर बाहर अहाते मैं आया और चारो तरफ नज़र दौड़ाकर घुप्प अंधेरे को मोबाइल की रोशनी से चीरते हुए किसी खतरे की आशंका का जायजा लिया और फिर आश्वस्त होकर झरपट गाड़ी की तरफ भागा और गेट खोलकर अंदर बैठ गया । अपना सामान समेटा और फिर विंटो से चारो तरफ नज़र दौड़ाई । सन्नाटे की चीरती मेरे पैरों की आहट कोठी के दरवाजे पर बढ़ रही थी और दरवाजे पर पहुँच कर जब मैने कुंडी लगाई तो चैन की सांस आई, लेकिन तब भी मेरे सीने की धड़कनें हिलोरे मार रही थी ।

जल्दी सोने की वजह से सुबह पाँच बजे ही मेरी आँख खुल गयी । सूरज नही निकला था और मुझे मार्निंग वाॅक की चुल्ल लगी थी लेकिन अकेले जाने में एक अनजाना सा डर लग रहा था । मैने दरवाजे को खोलकर बाहर नज़र डाली तो रमेश आग जलाकर अपने घर के आगे बैठा था और धुंए की चादर किसी नवयौवना के जुल्फों की तरह लहरा रही थी । मुझे कुछ हिम्मत आई और मैं दरवाजे को खोकर बाहर अहाते में आ गया थोड़ी देर आस-पास टहल कर मैं जंगल की ओर जाती पगडंडी पर आ गया । पगडंडी पर टहलते-टहलते मेरी नज़र मिट्टी पर छपी एक आस आकृति पर जा टिकी । मैं जमीन पर बैठकर और आकृति को गौर से देखने लगा मेरी धड़कने और बढ़ने लगी वो आकृति और कुछ नही बल्कि एक वयस्क तेंदुए के फुटप्रिंट्स थे जो सीधा हमारे रेस्ट हाउस की तरफ जा रही थी ।

तेंदुए के फुटप्रिंट्स

मैं फुटप्रिंट्स को फाॅलो करता हुआ आगे बढ़ रहा जो मेरे कमरे की खिड़की से होते हुए जंगल की झाड़ियों में गुम हो गयी । मैं वापस कमरे पर आया तब तक परवेज भाई जग चुके थे मैंने उन्हे फुटप्रिंट्स के बारे में बताया तो वो भी उत्सुकता वश मेरे साथ बाहर आए । हम काफी देर जंगल के बीच उस फुटप्रिंट्स को फाॅलो कर रहे थे । तब तक सूरज भी निकल चुका था और पगडंडी पर कुछ महिलाएँ मिट्टी खोदने जा रही थी  । तभी एक लड़का हमें वहाँ मिला हमने उससे फुटप्रिंट्स के बारे में पूछा तो उसने बताया कि सुबह पाँच बजे के आसपास तेंदुए इस रास्ते से गुजरते हैं ये सुनकर मेरे जेहन मे एक सनसनी कौंध उठी क्योकि पाँच बजे के आसपास ही मैं बाहर पगड॔डी पर घूम रहा था और वो तेंदुआ कुछ समय पहले ही वहाँ से गुजरा रहा होगा । वापस रेस्ट हाउस आने पर राशिद भाई ने बताया कि रात को खिड़की के बाहर किसी की आहट आ रही थी । चौकीदार रमेश ने बताया कि जंगल का ये हिस्सा तेंदुए की टेरेटरी में आता है और यहाँ पचास से ज्यादा तेंदुए की एक्टिविटी रहती है । तब तक हम नाश्ता करके वापस कतरनिया निकल गये । आज हमें रिवर सफारी भी करनी थी ।

नेचर लवर का लिए कतरनिया की रिवर सफारी बहुत एडवेंचरस फील देने वाली राइड होती है, जहाँ आप मगरमच्छ, घड़ियाल, माइग्रेटेड बर्ड्स और गंगेटिक डाॅल्फिन को करीब से देख सकते हैं । अगर आप वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के शौकीन है तो यहाँ आपको तमाम इंट्रेस्टिंग सब्जेक्ट मिल जाएंगे । रिवर सफारी के दौरान हमने तमाम ऐसे बर्ड्स देखे जिनको पहले कभी देखा ही नही था । विशाल शरीर वाले घड़ियालों को धूप सेंकते हुए करीब से देखना बेहद आश्चर्य-सुखद होता है ।

गेरूआ नदी में धूप सेंकता घड़ियाल
हम घड़ियाल और मगरमच्छ को देख ही रहे थे कि सीटी बजाती हुई डाॅल्फिन हमारे बोट के पास से गुजरी । बीच धार में गेरूआ नदी इतनी स्वच्छ है कि उसका पानी आप पी सकते हैं । लगभग 45 मिनट की राइड करते हुए हम वापस आ रहे थे तभी हमारे गाइड ने बताया कि पास में मैला नाला है जहाँ हाथियों की एक्टिविटी रहती है लेकिन वो जगह बेहद खूबसूरत है । स्पेशल गेस्ट होने की वजह से गाइड हमें मैला नाला की तरफ ले गया ।
मैला नाला

यकीनन वो जगह सुनने से ज्यादा देखने में खूबसूरत है । दोनो तरफ से बेंत की झाड़िया और गहरा हरा पानी 'एमेजाॅन' नदी का ठीक वैसा ही फील देता है जैसा कि हमें डिस्कवरी और नेशनल ज्याग्राॅफी चैनल में देखने को मिलती है ।

रीवर सफारी पूरी होते होते हमारा ट्रिप भी पूरा हो चुका था । अब हमें वापस जाना था । प्रकृति के गोद में दो दिन गुजारने के बाद हमें फिर से कृतिम दुनिया में वापस जाना था ये सोच-सोचकर हम तीनों का दिल बैठा जा रहा था ।

रास्ते भर हम पिछले 36 घंटो के वृत्तांत का डिस्कशन ही किए जा रहे थे । हमारे रीवर गाइड के अनुसार कभी भी जंगल घूमने आना हो तो ये सोचकर आएँ कि प्रकृति के बीच रहने जाना है जानवरों का दिख जाना तो 'बोनस' होता है । बहुत से लोग इतनी दूर से सिर्फ 'टाइगर' देखने आते हैं लेकिन जब उन्हे टाइगर नही दिखता तो उस ग़म में वो जो बाकी चीजें है उसे भी मिस कर देते हैं । मैं भी गाइड की बात से इत्तेफाक रखता हूँ  ।

गाइड सानू भाई (बीच में)
तो !  ये तो रहा हमारा यात्रा वृत्तांत । लेकिन अगर आप कभी जंगल घूमने का प्लान करें तो कुछ बातों का एहतराम जरूर करें जैसे -


कैसे जाएँ

कतरनिया जाने के लिए आप किसी भी दिशा सें लखनऊ आएँ । लखनऊ देश के हर राज्य-शहर से डायरेक्ट जुड़ा है, लखनऊ से कैब करके बहराइच और वहाँ से नानपारा, नानपारा से मिहिंपुरवा कस्बा कस्बे को छोड़ते ही कतरनिया का जंगल शुरू हो जाता है । मिहिंपुरवा से कतरनिया जंगल का ऑफिस तकरीबन 42 किलोमीटर है, और इस 42 किलोमीटर का सफर बहुत रोमांचक है, दोनो साइड से लम्बे ऊँचे पेड़ और दीमक की बड़ी बड़ी-बड़ी बांबिया देखने को मिल जाएगी, इस रोड पर गाड़ी की स्पीड 30 से ज्यादा न रखें तो आपको कई सारे वन्यजीव देखने को मिल जाएंगे । सबसे पहले आप ऑफिस पहुँच कर अपनी बुकिंग कंफर्म करें और रेस्ट हाउस पहुँच कर फ्रेश हो लें क्योकि थकान लेके आप जंगल एक्सप्लोर नही कर पाएंगे । अगर आप रमपुरवा रेस्ट हाउस बुक कराते हैं तो वहाँ के चौकीदार रमेश मिलेंगे जो बहुत कोऑपरेटिव हैं और आपकी हर जरूरत का ख्याल रखेंगे । रमपुरवा रेस्ट हाउस में सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले बाहर न निकलें क्योकि रेस्ट हाउस लेपर्ड के एरिए में बना है और शाम-सुबह उनकी चहलकदमी होती है, इसके बारे में रमेश आपको डिटेल में बता देंगे । रेस्ट हाउस में आपको घर का बना हेल्दी खाना भी मिलेगा ।

कब जाएँ

वैसे तो पर्यटकों के लिए कतरनिया 15 नवंबर से 15 अप्रैल तक खुला रहता है लेकिन कतरनिया जाने का सबसे मुफीद वक्त होता है दिसंबर-जनवरी । क्योकि इस दौरान विडाल वंशियों का मेटिंग टाइम होता है और टाइगर-लेपर्ड आपको पेयर में घूमते दिख जाएंगे । रीवर सफारी में धूप सेंकते एलीगेटर और क्रोकोडायल आसानी से दिख जाएंगे साथ ही इत्तेफाक आपके साथ हो गंगेटिक डाॅल्फिन भी देख पाएंगे । हाथियों का दिखना आम हैं वो कभी भी कहीं भी झुंड में मस्ती करते दिख जाते हैं ।

जंगल सफारी प्लान करते वक्त ख्याल रखें कि आपका प्लान वीकेंड और हाॅलीडे पे न हो क्योकि वीकेंड पे कभी-कभी रश बहुत ज्यादा हो जाता है और गाइड आपको फुर्सत से घुमा नही पाएंगे । बेहतर होगा कि आप वीक डे पर प्लान करें जिससे आप फुर्सत से जंगल घूम सकें । 

इस ट्रिप की संबंधित यू ट्यूब वीडियो की लिंक

1- https://youtu.be/nwNbq5OaaaM करतनिया में बाहरसिंहा

2- रमपुरवा रेस्ट हाउस https://youtu.be/bPVdyPm0Yq8

3- रीवर सफारी घड़ियाल का वीडियो https://youtu.be/DKn2owZRFWI

4- मैला नाला लिटिल एमेजाॅन व्यू https://youtu.be/6Z9MepD_jwE

5- रेस्ट हाउस के बाहर तेंदुए के फुटप्रिंट्स https://youtu.be/0Nip8GIUpTU



इस ट्रिप के लिए सादिक रजा जैदी 'नवोदयन' भाई और दबीर हसन साहब का बहुत बहुत शुक्रिया साथ ही परवेज आलम भाई, राशिद भाई का भी बहुत बहुत शुक्रिया जिन्होने यायावर की डायरी को फिर से लिखने को प्रेरित किया 








Monday, September 14, 2020

मौजूदा लोकतंत्र में भारतीय मीडिया की भूमिका

 आज अंतराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस है, लेकिन निष्पक्ष भारतीय मीडिया के लिए रोकतंत्र दिवस है और दिवस कई वर्षों से बरकरार है ।



कहते हैं मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है । क्या सच में ऐसा है ? लोकतंत्र में मीडिया को विपक्ष की भूमिका में होनी चाहिए जो सरकार के सही कदम की सराहना अवश्य करें लेकिन गलत फैसलों का पुरजोर विरोध भी करे । भारत में पत्रकारिता के इतिहास पर नज़र डाले तो देखेंगे कि भारत का पहला समाचार पत्र 'बंगाल गज़ट' एक अंग्रेज जेम्स ऑगस्टस हिक्की द्वारा प्रकाशित किया गया । हिक्की को भारत में पत्रकारिता का जनक भी माना जाता है । हिक्की नें भारत में अंग्रेजों के भष्ट्राचार को निष्पक्षता और निडरता से प्रकाशित किया, यहाँ तक कि उच्च अधिकारी और वायसराय वाॅरेन हेस्टिंग्स तक के काले कारनामों को उजागर किया । इस बात से खफ़ा प्रशासन ने तमाम कोर्ट केस किए, प्रेस तोड़ डाले । हिक्की को तब तक टाॅर्चर किया जब तक 'बंगाल गजट' का प्रकाशन बंद नहीं हो गया । हाँलाकि हिक्की से प्रेरणा लेकर देश के अलग अलग हिस्सों में भारतीयों नें पत्रकारिता की शुरूआत की लेकिन अंग्रेज अफसरों ने हर किसी का दमन जारी रखा । अंग्रेज विरोधी समाचार पत्र और पत्रकारों का दमन 1947 तक जारी रहा । इस दौरान अंग्रेज विरोधी समाचार, कहानी, निबंध हर चीज़ को जब़्त किया और उसे नष्ट कर दिया गया । प्रेमचंद की पहली रचना 'सोज़े-वतन' भी इसी आग की भेंट चढ़ गयी । हाँलाकि आज़ादी के बाद समाचार-पत्र और पत्रकारों को खुली छूट मिली । आखिर उन्हे 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' का अधिकार मिल चुका था । एक लोकतांत्रिक देश में 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' का बहुत ज्यादा महत्व होता है ।



इसकी एक बानगी देखिए, भारत-चाइना के संबंध बिगड़ने के शुरूआती दौर में मुम्बई के प्रदर्शनकारियों नें रिपब्लिक ऑफ चाइना के फाउंडर माओ के तस्वीर पर टमाटर और अंडे फेंके जिसे किसी विदेशी पत्रकार नें अपने समाचारपत्र में प्रमुखता से प्रकाशित किया । बात जब चाइना पहुँची तो तात्कालिक राष्ट्रपति चाओ एन लाई नें नेहरू को पत्र लिखकर इस बात का विरोध किया और इसे चीन की बेज्जती समझते हुए प्रदर्शनकारियों पर कार्यवायी की मांग की ।उनके इस पत्र पर दो टूक जवाब देते हुए नेहरू ने कहा कि भारत चाइना नहीं है, ये एक लोकतांत्रिक देश है यहाँ लोग विरोध के नाम पर मुझे और गांधी जी को नहीं छोड़ते तो भारतीयों के लिए माओ क्या चीज हैं ?नेहरू के इस जवाब से चाउ एन लाई बौखला गये थे, क्योकि माओ चाइना में पूजनीय थे ।



नेहरू काल तक मीडिया ने विपक्ष की भूमिका निभाई । आजादी के बाद देश को नवनिर्माण के दौर से गुजरना था जिसमे मीडिया नें सरकार की हर छोटी बड़ी गलतियों की आलोचना की । उस दौर को भारतीय पत्रकारिता का स्वर्णिम युग माना जाता सकता है । इंदिरा काल में इमरजेंसी के दौरान एक बार फिर पत्रकारिता के दमन का दौर शुरू हुआ । कहते हैं उस वक्त पूरी अख़बार काली आती थी क्योंकि जो खबर भी सरकार विरोधी लगती थी उस पर कालिख पोत दी जाती थी । उस दौर में मीडिया माध्यम में समाचारपत्र, टेलीविजन और रेडियो ही प्रमुख थे । कांग्रेस काल में 2010 के आसपास का वक्त एक बदलाव लेकर आता है । बंदे बंदे के पास स्मार्ट फोन और इंटरनेट की पहुँच थी लोग ऑर्कुट, फेसबुक और व्हाट्स एप से एक दूसरे से जुड़ने लगे थे । 2012 मे निर्भया आंदोलन में सोशल मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । सोशल मीडिया से शुरू ये आंदोलन इस कदर सफल रहा कि इसी फार्मूले पर लोकपाल आंदोलन नें भी लोगों को कांग्रेस विरोधी पूर्वाग्रह डेवलप करने मे मदद की । इस बात का फायदा उठाकर केजरीवाल सीएम की कुर्सी पर पहुँचते हैं तो मेनस्ट्रीम मीडिया को इंफ्लुएंश करके भाजपा केन्द्र में पहुँचती है । बीजेपी के मीडिया पर कंट्रोल इस कदर हावी हो चुका है कि आज प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया में, शिक्षा, रोजगार, अर्थव्यवस्था और मानवाधिकार जैसे मुद्दे ऐसे गायब हो चुके हैं जैसे गंजे के सर से बाल । आज मेनस्ट्रीम मीडिया में प्रथानमंत्री का यशोगान, मंदिर निर्माण, भारत-पाक जैसे मुद्दे निरंतर रीपीट होते हैं । देश के लिए अहम सवाल ये नहीं रह गया है कि शिक्षा और अर्थव्यवस्था कहाँ जा रही हैं, रोजगार के अवसर कब आएंगे, कोरोना निवारण के लिए समुचित उपाय किए जा रहे हैं या नहीं बल्कि अहम सवाल ये है प्रधानमंत्री आम चूस कर खाते है या काट कर । ये कितना हास्यास्पद लगता है । ऐसा लग रहा है रोम फिर से जल रहा है और नीरो का वायलन बजाना देश के लिए सुखद टेलिकास्ट है । भारतीय मीडिया के लिए ये एक पेड इमरजेंसी है जिसमे उन्हें ये दिखाना है कि देश में सब ठीक हैं । उप्र में राम मंदिर और रामराज्य की खबर के नीचें रेप, हत्या, लूट, फिरौती, की खबरें कब दब जाती है किसी को कुछ पता नहीं चलता ।

न्यूज़ रूम अब खुद को सीबीआई का मेन ब्रांच और एंकर खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज समझने लगे हैं । रिया-सुशांत के केस में जिस तरह रिया को काला जादू करने वाली, ड्रग्स लेने वाली, बदचलन साबित करने की कोशिश की गयी और न्यूज रूम के कथित न्यायधीशों नें उसे अपराध सिद्ध हुए बिना अपराधी घोषित कर दिया । इसका प्रभाव लोगो पर इस कदर पड़ा कि लोग हर बंगाली लड़की को शक की निगाह से देखने लगे । जबकि इल्लीगल कंस्ट्रक्शन पर बुलडोजर चलाने पर कंगना की शिवसेना विरोधी आवाज पर बीजेपी नें उसे नेशनल हिरोइन बना कर वाई श्रेणी की सुरक्षा तक दे डाली । ये सब देखकर समझ ही नही आता लोकतंत्र में मीडिया किस दिशा में जा रहा हैं । आज से दस साल पहले मनमोहन-सोनिया और राहुल गांधी पर जोक्स बहुत वायरल होते थे लोग खुलकर विरोध की बात कर सकते थे लेकिन वही चीज़ अगर आप आज करें तो आप राष्ट्रविरोधी, देशद्रोही और नक्सली कहलाएंगे । आज हालात ये हैं कि सरकार या सरकार के किसी करीबी के कार्टून या ट्वीट पर आपको जेल तक जाना पड़ सकता है । वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और पत्रकार प्रशांत कनौजिया इसके नवीनतम उदहारण हैं ।



इसी सरकार के लोकतंत्र में सच बोलने के लिए गौरी लंकेश, गोविंद पानसरे,नरेन्द्र दाभोलकर जैसे महत्वपूर्ण लोगों की हत्या हो जाती है तो वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को जान से मारने की धमकी दी जाती है उनकी माँ बहन को गाली दी जाती है । इस दौर में 'फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन' सिर्फ बीजेपी समर्थकों को हासिल रह गया है ताकि वो अपने विरोधियों को जी भरकर गालियाँ दे सकें । इस लोकतंत्र में अगर सच बोलने के लिए जगह नहीं है तो ये लोकतंत्र नहीं है । ये एक विचारधारा विशेष की तानाशाही और अघोषित इमेरजेंसी से कम कुछ भी नहीं है ।

ऐसी स्थिति में एक पैरलल मीडिया की जरूरत है जो लोगो के आँखों से पर्दा हटाने का काम करें । ये इसलिए जरूरी है क्योंकि भविष्य में एक तबाह देश की जेनरेशन अगर हमसे सवाल पूछे कि जब देश लुट रहा था तब आप क्या कर रहे थे, उस वक्त के लिए हमें शर्मिन्दा होकर चुप रहने के बजाय जबाव देने के लिए शब्द रखने चाहिए । हम जीते या हारें ये मायने नहीं रखता गलत और दमन के खिलाफ हमारा लड़ना मायने रखता है ।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सच के लिए लड़ने के लिए अब हमे तैयार रहना होगा तभी ये लोकतंत्र बच सकेगा । हमें अपने लिए, अपने देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, आने वाली जेनेरेशन के लिए आवाज उठानी ही होगी ।

दुष्यंत कुमार के शब्दों में

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ।


-सम्राट विद्रोही

Thursday, August 6, 2020

ट्राॅयारण - अनटोल्ड स्टोरी ऑफ फाॅरगेटेन राम

 राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है, राम भक्तों में हर्षोल्लास का माहौल हैं । पूरा देश राममय है, होना भी चाहिए आखिर पाँच सौ वर्षों तक इंतजार किया है हिन्दू जनता ने, लेकिन राम की कहानी तो इससे कहीं ज्यादा पुरानी हैं । ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करें तो हमें बहुत से अनकहे, अनसुने फैक्ट देखने सुनने को मिलते हैं ।

किसी पंडा-पुजारी से अगर पूछा जाए कि राम का जन्म कब हुआ था तो उनका जवाब त्रेता युग से आगे नही बढ़ पाता । त्रेता युग कब था इसकी भी कोई ऐतिहासिक पुष्टि नही होती है । मोटा मोटी तौर पे देखें तो हिन्दू सभ्यता का श्रीगणेश वैदिक सभ्यता से होता है । ऐसा माना जाता है कि सिंधु सभ्यता के पतन के बाद आर्यों ने वैदिक सभ्यता की नींव रखी । और तभी से सतयुग का प्रारंभ माना जाता है । सतयुग के बाद त्रेता कब आया इसकी भी कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नही है । साहित्यिक और पुरातात्विक विश्लेषण के आधार पर माना जाता है कि पन्द्रहवी शताब्दी ईसापूर्व से नौवी शताब्दी ईसा पूर्व के बीच ॠगवेद की रचना हुई । और ध्यान देने वाली बात ये है कि किसी भी वेद में राम या अयोध्या का वर्णन नही मिलता

तो फिर राम कथा की शुरूआत कहाँ से हुई ? क्या सचमुच राम अयोध्या के राजा थे भी या ये सिर्फ किसी कवि की कल्पना थी ?
राम कथा की शुरूआत कहाँ से हुई इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली आज हम इसपर भी चर्चा करेंगे ।
कुल मिलाकर राम कथा का सार क्या है ?
"एक राजकुमार अपनी पत्नी और भाई के साथ एक विशाल राज्य का स्वामी होता है एक दिन एक अन्य राजा राजकुमार की पत्नी का हरण कर समंदर पार ले जाता है फिर दोनो भाई सुग्रीव, हनुमान, जामवंत जैसे महान योद्धा के साथ मिलकर एक विशाल सेना का गठन कर संमदर पार करते हैं और और राजा की हत्या करके रानी को वापस लाते हें और सुशासन की स्थापना करते हैं पूरा राज्य दोनो भाई और रानी का हर्षोल्लास से स्वागत करते हैं"
इस घटना को महर्षि वाल्मिकी संस्कृत में सूत्रबद्ध करके 'रामायण' महाकाव्य लिखते हैं जिससे प्रेरित होकर तुलसीदास 'राम चरित मानस' रचते हैं । साथ ही, जगह जगह इसका मंचन करते हैं, जिससे रामकथा आम जनमानस को बहुत ही प्रभावित करती है और राम जन जन के ह्रदय में स्थान बनाते हैं ।
अब चलिए एक और कहानी सुनाते हैं ।
आज से लगभग 3100 साल पहले जब उत्तर-पश्चिम भारत में वेद रचे जा रहे थे तब आधुनिक तुर्की में एक प्रसिद्ध घटना हुई । जिसे 'फाॅल ऑफ ट्राॅय' नाम से जाना गया । ये घटना उस समय बहुत चर्चित रही और ग्रीसवासी इसे बहुत ही गर्व और सम्मान के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाते रहे । गौरतलब है कि लोग उस समय साहित्य लेखन के बजाय साहित्य श्रुति पर ज्यादा भरोसा किया करते थे । यूरोप में इस घटना के लगभग 400-500 साल बाद का काल 'होमर' काल के नाम से जाना जाता है । होमर एक नेत्रहीन कवि थे जिन्होने 'फाॅल ऑफ ट्राॅय' को सूत्रबद्ध करने का कार्य किया और 'इलियड' और 'ओडिसी' महाकाव्य की रचना की । जर्मनी के हेनरी श्लीमान बचपन में अपने पिता से ट्राॅय की कहानियाँ सुना करते थे उन्होने बचपन में ही निश्चय किया कि वो ट्राॅय की खोज करेंगे, बड़े होकर हेनरी ने खुद से किया वादा निभाया और तुर्की सरकार से इजाजत लेकर उन्होने ट्राॅय को खोज निकाला । और होमर की इलियड की सत्यता साबित करते हुए उसे फिर से प्रासंगिक बनाने में अतुलनीय योगदान दिया ।
होमर की इन कृतियों के आधार पर तात्कालीन समाज की पुर्नव्याख्या हो सकी है । होमर की इस ग्रीक कथा के
अनुसार 3100 साल पहले वर्तमान पश्चिमी तुर्की के समुद्र के किनारे एक सुंदर नगर था, नाम था ट्राॅय । ट्राय एशिया, अफ्रीका और यूरोप के सीमा पर बसा व्यापारिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण नगर था । ट्राॅय पूर्वी देशों विशेषतः भारत और यूरोप के मध्य व्यापार का मध्य केन्द्र था । व्यापार के जरिए उसने अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली थी । सामाजिक स्थिति भी बहुत अच्छी थी । दास व्यवस्था नही थी, बंदा बंदा खुशहाल था । इस वजह से ग्रीस की नज़र ट्राॅय के व्यपार पर लगी थी । ट्राॅय के राजा प्रायम के दो बेटे थे हेक्टर और पेरिस । एक बार ट्राॅय का राजकुमार पेरिस व्यापार के लिए ग्रीस जाता है जहाँ उसकी मुलाकात स्पार्टा के राजा मेलेनीज और उसकी पत्नी हेलेन से होती है । हेलेन उस वक्त सम्पूर्ण ग्रीस की सबसे खूबसूरत महिला थी । पेरिस हेलेन पर मोहित हो जाता है जबकि रूढ़िवाद से ग्रसित ग्रीस की बंदिशों में रहने वाली हेलेन जब ट्राॅय के स्वच्छंदता के किस्से सुनती है तो उसके मन में ट्राॅयवासी होने का ख्वाब जग जाता है । उसी वक्त स्पार्टा राजा मेलेनीज़ के पिता का देहांत हो जाता है जो कि अपने बड़े बेटे और मेसीडोन के राजा एगोमेम्नेन के साथ रहते थे । मेलेनीज अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए मीसोडोन चला जाता है । मौका पाकर हेलेन और पेरिस ट्राॅय भाग आते 
ट्राॅय में जब ये बात सबको पता चलती है तो प्रायम और हेक्टर सहित सभी पेरिस पर हेलेन को वापस करने का दबाव डालते हैं । उधर स्पार्टा में ये बात फैल जाती है कि ट्राॅय का राजकुमार स्पार्टा की रानी का हरण कर ले गया है । गुस्से में आगबबूला हेलेन का पति मेलेनीज अपने भाई एगोमेम्नेन से मदद माँगता है एगोमेम्नेन की नज़र बहुत दिनों से ट्राय के व्यापार पर थी । उसने अपने भाई को मदद देने का आश्वासन दिया और सम्पूर्ण ग्रीस को संगठित कर एक विशाल नौसेना बनाई जिसमें एकीलीज़ और ओडिशियस जैसे महान योद्धा शामिल थे । सागर को पारकर ग्रीस की सेना ट्राॅय के गढ़ के सामने डेरा डाल देती है । दोनो भाई एक आखिरी बार प्रायम के सामने समझौता का प्रस्ताव रखते हैं । प्रस्ताव सभा में प्रायम से हेलेन को वापस करने के साथ साथ ट्राॅय का सालाना रेवेन्यू भी मांगा जाता है जिसे प्रायम ठुकरा देते हैं और बात युद्ध तक आ जाती है । 10 साल युद्ध होता है और राजा प्रायम, राजकुमार हेक्टर और पेरिस इस युद्ध में मारे जाते हैं । कुल मिलाकर कहानी का सारांश ये है कि

"एक राजकुमार एक महारानी का अपहरण करके ले जाता है और फिर दो भाई समंदर लांघ कर उस राजा का समस्त वैभव नष्ट कर महारानी को वापस ले जाते हैं । और राज्य की प्रजा सबका हर्षोल्लास से स्वागत करती है"
चाय पी हुई कप में अगर दूध डाल दिया जाए तब भी चाय की महक रह ही जाती है ऐसा ही कुछ इलियड और रामायण के साथ हुआ है ।
मसलन इलियड में एकिलीज जब हेक्टर की हत्या करता है तो उसे रथ में बांधकर घसीटता है और उसकी लाश को ट्रायवासियों को देने से मना कर देता है, जबकि रामायण मे मेघनाथ की हत्या करने के बाद राम की सेना मेघनाथ को रथ मे बांध कर घुमाने का प्रस्ताव रखती है और लाश को चील कौवे को खिलाने की बात कहती ।
इलियड में एकिलीज को दैवी पुत्र माना गया है जिसे कोई भी हरा नही सकता था ठीक वैसे ही जैसे हनुमान को देव पुत्र माना गया है और उन्हे हराना किसी के लिए मुमकिन नही ।
इलियड के क्लाईमेक्स में ट्रॉय के किले को जला कर भस्म कर दिया जाता है जैसा कि रामायण में हम लंका दहन पढ़ते हैं ।
इलियड के ओडिशियस को महान सेनानायक माना गया है जिसकी तुलना सुग्रीव से की जा सकती है । होमर ने ओडिशियस के लिए अलग से ओडिशी महाकाव्य की रचना की । मानव इतिहास में इलियड और ओडिशी को सबसे प्राचीनतम महाकाव्य माना जाता है ऐसे में ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर आप खुद तय कीजिए रामकथा का उदगम कहाँ से हुआ है ?
ये सत्य है कि दोनो कथाओं में निर्विवाद रूप से समानता पाई गयी है । यदि रामकथा इकत्तीस सौ साल पुराने इलियड से प्राचीन होती तो वेदों मे इसका जिक्र अवश्य मिलता ।
यहाँ पर कुछ गिने चुने समानताओं का जिक्र किया गया है, बेहतर समझ के लिए रामानंद सागर कृत 'रामायण' और ब्रेड पिट अभिनीत 'ट्राॅय' अथवा नेटफ्लिक्स पर एवलेबल 'फाॅल ऑफ ट्राॅय' वेब सीरीज देखिए ।
इलियड और रामायण में जो बुनियादी फर्क है वो ये है कि इलियड में घटनाओं को अपेक्षाकृत काफी रियलिस्टिक तरीके से प्रस्तुत किया गया है जबकि रामायण में अतिशयोक्ति का प्रयोग दिल खोल कर किया गया है ।
रामायण रचना में और भी बहुत से फैक्टर ने अपना प्रभाव डाला है ।
क्रोनोलाॅजी देखें तो वैदिक सभ्यता एलीट ब्राह्मणों की सभ्यता थी जिसमे उच्च कुलों में विचारों का आदान प्रदान संस्कृत भाषा में होता था । वैदिक कर्मकांड आम जनमानस से बहुत दूर थी बाद में महावीर, बुद्ध और गोशाल जैसे महापुरूषों ने आम जनमानस की भाषा में धर्म की नयी परिभाषाए गढ़ी जिन्हें जनता ने खुशी खुशी आत्मसात किया । शैव धर्मानुयायी अशोक के बौद्ध बनने के बाद के काल में बौद्ध धर्म अपने चरम पर पहुँच चुका था ठीक उसी वक्त वैदिक धर्म अपना स्वरूप बदल कर भागवत धर्म का रूप ले चुका था, यज्ञ, हवन कर्मकांड की जगह मूर्तिया और मंदिर, आरती और भक्ति ने ली लिया । बौद्ध के जातक कथाओं से प्रेरणा लेकर तमाम पुराण, उपनिषदों की रचना की गयी । संभवतः ग्रीस से व्यापार के जरिए इलियड और ओडिशियस भारत में प्रचलित हुए हो, साथ ही बौद्ध धर्म के ग्रंथ 'दशरथ जातक' के मिले जुले प्रेरणा से रामकथा की शुरूआत हुई हो । सच्चाई क्या है ये शोध का विषय हैं लेकिन जब धर्म पर शोध की बात आती है तो आस्था का नाम देकर उसपर ताला लगा दिया जाता है जैसा कि बाबरी मस्जिद की खुदाई के दौरान बौद्ध साम्रगियों के मिलने पर पुरातात्विक शोध को बंद कर दिया गया ।
खैर, कंवर्टेड बौद्ध अब हिन्दु बहुसंख्यक है और उनकी आस्था पर सवाल नही उठाया जा सकता, राम मंदिर बन रहा है, दिवाली मनाई जानी चाहिए, लोग खुश रहें, बस यही मायने रखता है ।
रामभक्तों को बहुत बहुत बधाई । हिन्दुस्तान को राम मंदिर मिल गया लेकिन
दुखद है कि मेलेनीज और हेलेन का कोई मंदिर नही बन सका ।

Wednesday, May 27, 2020

मेस्ट्रुएशन हाइज़ीन डे पर पुरूषों को संदेश

                                                              PCWash.com
आज दुनिया इक्कीसवीं सदी में प्रगति की राह पर चल रही है । महिलाओं के लिए पुरूषों से कदम से कदम और कंधे से कंधे मिलाकर चलने का दौर है । आज महिलाएँ किचन और बिस्तरों से उठकर किसी भी मुल्क के लिए प्रगति में बराबर की भागीदार हो रहीं हैं । स्कूल, काॅलेज, यूनिवर्सटी, ऑफिस, स्पोर्ट्स, राजनीति हर जगह महिलाए नये कीर्तिमान रच रही हैं ।
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इक्कीसवीं सदी महिलाओं की सदी है । ऐसा तभी संभव हो पाया जब लोगो की सोच महिलाओं के लिए उदारवादी हुई हैं । तमाम ऐसे आंदोलन और महा पुरूषों/नारियों के सराहनीय कदमों और संघर्ष के बदौलत महिलाओं को शिक्षा और आर्थिक आजादी के मौके मिले । लेकिन ऐसा नही था कि नारी-मुक्ति का संघर्ष मानव इतिहास से ही शुरू हुआ हो । प्राचीन भारत के सिंधु सभ्यता में मातृसत्ता के प्रमाण मिलते हैं तो वैदिक सभ्यता में गार्गी, अपाला, घोषा और लोपमुद्रा जैसी विदुषी महिलाओं नें वेदो की रचना की है । बराबरी का अधिकार उनका सार्वभौम अधिकार रहा है और हमेशा रहेगा जिसे हासिल करने के लिए महिलाओं के साथ-साथ प्रगतिशील पुरूषों को भी संघर्षरत रहना चाहिए क्योकि नारी-मुक्ति संघर्ष सिर्फ महिलाओं की ही नहीं बल्कि उन महिलाओं के पिता, भाई और दोस्त की भी लड़ाई है जो महिलाओं को गैर-बराबरी की लड़ाई लड़ते हुए और जीतते हुए देखना चाहते हैं ।

उत्तर वैदिक काल के बाद महिलाओं के अधिकारों का निरंतर हनन हुआ है जो मध्यकाल में चरमोत्कर्ष पर पहुँचा । महिलाओं को घर की नौकरानी और भोग की वस्तु से ज्यादा कुछ नही समझा गया ।


"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता" वाले मनुस्मृति में ही आगे लिखा है कि

"पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्रमर्हति"

अर्थात स्त्री जब तक बालिका है उनकी रक्षा की जिम्मेदारी पिता की है जवानी में पति की, बुढ़ापे में स्त्री की रक्षा का दायित्व पुत्र को है, महिलाओं को स्वतंत्र रहने का अधिकार नहीं ।
कुरान के चौथे अध्याय के चौंतिसवें आयत में महिलाओ को पीटने के स्पष्ट आदेश हैं । इस तरह हम देखते हैं कि किस तरह धर्म ने महिलाओं को महज 'चीज' या 'माल' बना कर रख दिया है । विज्ञान के बढ़ते वर्चस्व ने धर्म को चुनौती दी और महिलाओं के लिए आजादी का रास्ता खोला ।
फिर भी आज समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो नारी-मुक्ति और महिला विमर्श के खिलाफ खड़ा है । अंबेडकर द्वारा हिन्दू कोड बिल का विरोध ऐसे ही लोगो ने किया था । ऐसे लोग समाज के हर क्षेत्र में मौजूद हैं राजनीति, स्पोर्ट्स, फिल्म और कला जैसे प्रोग्रेसिव क्षेत्र में ऐसे लोगो की पकड़ मजबूत है । हिन्दी सिनेमा के एक प्रसिद्ध फिल्म में एक डायलाग है "मर्द को दर्द नही होता" ।
घोर पुरूषवादी समाज में 'मर्द को दर्द नहीं होता' जैसे वाक्य बेहद घटिया और स्त्री विरोधी डायलाग हैं । ये अपमान हैं उन आधी आबादी का जो हर महीने दर्द से गुजरती हैं । बजाय हम उनके दर्द के सहभागी होने के यदि 'मर्द को दर्द नहीं होता' जैसे वाक्यों का प्रयोग करते हैं, तो क्या हम उनके दर्द का उपहास नहीं उड़ाते ?

खुद को इतना प्रगतिशील दिखाने के बावजूद सच्चाई ये है कि आज भी भारत में 'पीरियड्स' का आना घृणा की दृष्टि से देखा जाता है । गाँवो में महिलाएँ माहवारी के दिनों में मंदिर नहीं जाती, पूजा नहीं करती, बिना नहाए किचन में नहीं जाती और कोई भी शुभ काम नहीं करती । ये दर्शाता है कि माहवारी को लेकर उनमें कितनी भ्रांतियाँ हैं । गाँवों में कहा जाता है कि माहवारी वाली लड़कियों को कौव्वा भी नही छूता । माहवारी एक नैसर्गिक और महत्वपूर्ण प्रकिया है फिर हम उनके साथ ऐसे अछूत जैसा बर्ताव क्यो करते हैं ?


                                                   PC-  The logical indian.com

विकास की राह पर अग्रसर भारत में सिर्फ छत्तीस प्रतिशत महिलाएँ ही सैनेटरी पैड इस्तेमाल करती हैं क्योंकि उनमें जागरूकता की कमी है और ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई इस 'अछूत' समस्या पर बात नहीं चहता । ये कितना शर्मनाक है । आज जागरूक लोगो के कंधो पर ये जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वें ज्यादा से ज्यादा लोगो को इस विषय पर जागरूक करें और सबसे महत्वपूर्ण कि उनके साथ अछूत जैसा बर्ताव न करें, उनसे खुलकर इस विषय पर बात करें और उनके मुश्किल वक्त पर उनका सहयोग करें ।


                                                               PC- BBC news

एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार भारत में सत्तर फीसदी लड़कियों को उनके पहले मासिक आने से पहले मासिक धर्म के बारे में पता ही नहीं होता । ये कितने हैरत की बात है कि जहाँ चार-पाँच साल के बच्चे बड़ी आसानी से फोन लैपटाॅप चला लेते हैं वहाँ टीनएजर्स को इतनी महत्वपूर्ण बात के बारे में पता ही नहीं होता । मैनें कई लोगो से इस विषय पर बात की तो जवाब मिला कि 'शर्म' आती है । जिस देश में महिलाओं की एक बड़ी संख्या शौच के लिए खुले में जाती हो उसी देश में मासिक चक्र पर बात करने में उन्हे शर्म आती है, ये कितना हास्यास्पद है ।
इस अज्ञानता का सबसे बड़ा कारण मासिक चक्र के बारे में कोई भी विमर्श करना नही है । ऐसे में यदि घर के पुरूष जागरूकता का जिम्मा उठा लें तो निश्चित रूप से घर की महिलाएँ मासिक चक्र पर बात करने में कंफर्ट महसूस करेंगी और सहजता से अपनी परेशानियों को शेयर कर सकेंगी ।


                                                                  PC- alamy.com

एक पुरूष होने के नाते हमारा ये परम कर्तव्य होना चाहिए कि हम अपने आस पास की महिलाओं चाहे वें हमारी माँ हो, बहन हो, दोस्त हो, प्रेमिका हो अन्यथा पत्नी हो को हर महीने आनी वाली परेशानी में उनका सहयोग दें । अब सवाल है कैसे सहयोग दें ? तो इसके लिए बस आपको इतना करना है कि जो प्रेम और सहयोग वो आपको साल के तीन सौ पैसठ दिन देती हैं आप भी उतना ही उनको दें और महीने के चार दिन उसमें कुछ एक्स्ट्रा दें । मसलन चार दिन खुद घर का काम करना और उन्हे आराम देना । उन्हे ज्यादा मेहनत वाले काम करने से बचाना और 'मूड स्विंग' से बचाने के लिए उन्हे खुश रखना । उन दिनों के 'मूड स्विंग' की वजह से महिलाएँ अक्सर चिड़चिड़ी हो जाती है, उनके चिड़चिड़ेपन को सहकर लेना ।


                                                                   PC- Pulse.ng

आमतौर पर पुरूषवादी समाज में घर का काम करना मसलन खाना पकाना, बच्चे संभालना और साफ-सफाई करना महिलाओं का काम घोषित कर दिया है । इतने काम करने के बाद ये कहना कि मेरे घर की औरतें काम नही करती, वो ग्रहणी है । कितनी सफाई से इतना बड़ा झूठ बोल दिया जाता है । यकीनन अगर निष्पक्ष रूप से ग्रहणियों के काम का हिसाब किया जाए तो इसमें मानव इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला सामने आएगा । ग्रहणी होने के नाम पर उन्हे कोई वेतन नही मिलता, बदले में सिर्फ दो वक्त का खाना और ताना मिलता है और हर महीने उन्हे अछूत जैसा व्यवहार सहना पड़ता है । एक सत्य तथ्य ये भी है कि माहवारी शुरू होते ही बहुत से बच्चियों का स्कूल छुड़वा दिया जाता है। हमें उनका स्कूल छुड़वाने के बजाए उन्हे मानसिक रूप से और मजबूत करना चाहिए ताकि उन्हे भी इंसान होने का सही अधिकार मिल सके । एक समझदार और नेकदिल इंसान होने के नाते समाज के हर वर्ग के पुरूषों का ये परम दायित्व होना चाहिए कि वें अपने आस पास की महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय के विरूद्ध मजबूती से खड़े हो और दकियानूसी रूढ़िवादी विचारों को जड़ से समाप्त करने के लिए संगठित हों ।

                                                                                             PC- Loopnauru.com

बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा था कि किसी भी देश की प्रगति का मापदंड उस देश की महिलाओं की स्थिति से आंकना चाहिए । तो इस तरह यदि हम इस देश की महिलाओ को हाशिए पे रखते जाएंगे तो ये देश कभी विकसित नही हो सकेगा इसलिए ये जरूरी है कि हम महिलाओं को वही सम्मान दें जिसकी वो अधिकारी हैं ।

तभी इस देश में बराबरी आ सकेगी और सही मायनों में विकास और खुशहाली भी ।