बहुत उकता गया हूँ यार,
क्यों क्या हुआ ?
अब क्या ही बताएँ ? शादी हुई होती तुम्हारी, तो समझ में आता ।
अरे ! ऐसा क्या है भाई जिसे समझने के लिए शादीशुदा होना जरूरी है ।
जब तुम्हारी होगी तब समझ आएगी,
जाको पाव न फटी बिवाई, सो का जाने पीर पराई
ऐसा नही है भाई । परेशान होने के लिए शादीशुदा होना कभी कोई शर्त नही रही है रंडुए भी परेशान ही रहते हैं ।
लेकिन रंडुओ पर परिवार की जिम्मेदारी नही रहती ।
'हाँ ये बात तो है' कहकर दोनो खिलखिलाकर हँस पड़े ।
तो चलिए कहीं घूम आते हैं
कहाँ चलें ?
नेपाल चलें ?
बाॅर्डर बंद है
सर्दियाँ हैं हिमाचल या उत्तराखंड चलें
कोरोना भी है
दिल्ली ?
प्रदूषण है
अच्छा फिर आसपास में कहीं ?
हाँ चलेगा
श्रावस्ती ?
सब बंद है ।
कहीं नेचर में चलें ?
हाँ ये ठीक है ।
कितने दिन ?
2-4 दिन ठीक रहेगा ?
हाँ एकदम ।
सामान पैक करो, मैं बुकिंग करता हूँ ।
अगर आप भी हैं हैरान-परेशान दुनियावी झमेलों से, फर्जी लाॅटरी के मेलों से, फेल होने की आहट से, बाॅस की झुंझलाहट से, भोजपुरिया गानों से, बीवी के कड़वे तानों सें, भक्त-शिरोमणि भूषण से, दिल्ली के प्रदूषण से तो ये लेख हैं बस आपके लिए, हर उस इंसान के लिए जो सर पर दुनियादारी का बोझ लिए बस चला जा रहा हैं और एक अदद सुकून के लिए मरा जा रहा है ।
बीते कुछ सालों जो मैनें खुद भी महसूस किया है कि आज का दौर डिप्रेशन का दौर हो चला हैं, बच्चा पैदा बाद में होता है डिप्रेशन का डोज पहले ले लेता है । शायद इसकी वजह तेजी से बदलती ग्लोबलाइजेशन वाली दुनिया, उटपटांग खान-पान, नशाखोरी और बेहद बिजी लाइफस्टाइल है । ऐसा मुझे लगता है, आपको क्या लगता है ! सोचिएगा ।
अगर मेरी सोच सही है तो इस समस्या को बदला तो नही जा सकता लेकिन कुछ हेर-फेर कर एडजस्टमेंट जरूर किया जा सकता है । इस समस्या का मूल जड़ है इंसान का प्रकृति से दूर जाना और मेरी लेख का विषय भी आज यही है । प्रकृति का मतलब आज शहरी लोगो ने लोहिया पार्क और जनेशर मिसिर पार्क समझ लिया है और इसमें गलती उनकी भी नही है, कंक्रीट के जंगल में रहने वालों के लिए प्रकृति का मतलब और हो भी क्या सकता है ?
बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए झोंकमझोंक जंगल साफ किए गये, जहाँ जंगल थे आज वहाँ खेत है, जहाँ खेत थे वहाँ मल्टीप्लैक्स, माॅल, अपार्टमेंट और बंगले लहलहा रहें हैं । इंसानों की इस चौड़ाई ने न जाने कितने वन्यजीवों को निगल लिया । चीता और शुतुर्मुर्ग जैसे जीव आज भारत की धरती से सफाचट हो गये हैं और बहुत से जीव गायब होने की कतार में लगे हैं । टोनी स्टार्क के लहज़े में कहें तो जो खोए हैं उन्हे वापस लाना है और जो हैं उन्हें खोना नही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । सरकार को अंबानी-अडानी की जी हुजूरी करने के बजाए पर्यावरण और वन्यजीवों को बचाने की तरफ भी ध्यान देना चाहिए । जनसंख्या पर नियंत्रण हो ताकि सबको बराबर संधाधन और अपरच्युनिटी मिल सके । कल को सच में थैनोस आ गया भागते भूत की लंगोटी भी न मिलेगी । अभी ऐसा भी नही है कि हमारा पास वन्य संसाधन खत्म हैं लेकिन जो हैं नाकाफी है । अभी हमारे पास पचास से अधिक नेशनल पार्क हैं । जिनमें जिम कार्बेट उत्तराखंड, काजीरंगा नेशनल पार्क आसाम, मानस नेशनल पार्क आसाम, नंदा देवी फ्लावर वैली उत्तराखंड, साइलेंट वैली नेशनल पार्क केरला, राजाजी नेशनल पार्क उत्तराखंड, दुधवा नेशनल पार्क उत्तर प्रदेश, सरिस्का नेशनल पार्क राजस्थान ब्ला ब्ला ब्ला प्रमुख हैं ।अगर आप उत्तरप्रदेश से हैं और लखनऊ के आस पास कहीं प्रकृति में घूमना चाहते हैं तो दुधवा नेशनल पार्क और कतरनिया घाट वन्य जीव प्रभाग आपके लिए बेहतर ऑप्शन हो सकता है ।
परवेज भाई, राशिद भाई और मैं तीनों नवोदयन गोण्डा से सुबह-सुबह साढ़े सात बजे तक निकल चुके थे । गोण्डा से नानपारा और नानपारा से मिहिंपुरवा पहुँचे । मिहिंपुरवा कस्बे को पार करते ही जंगल शुरू हो जाता है । ऊँचे-ऊँचे साखू के पेड़ आँखो को लज्जतदार सूकून देते हैं । मिहिंपरवा से तकरीबन 42 किलोमीटर पड़ता है कतरनिया । उन रास्तों से गुजरना और जगह जगह जानवरों के साइनबोर्ड को पढ़ना रोमांचक होता है ।
जंगल के भीतर पहुँचकर जब हम पक्की सड़क छोड़कर कच्चे रास्ते से रमपुरवा रेस्ट हाउस की तरफ़ बढ़ रहे थे उस वक्त दिल में एक अजीब सी खुशी हिलोंरे मार रही थी । मैं बार-बार विंडो खोलकर फ्रेश एयर और नज़ारों का लुफ्त लेता और बार राशिद भाई खिड़की बंद करने को कहते । उनको लगता था कहीं से कोई तेंदुआ या टाइगर अटैक न कर दे । खैर, रमपुरवा पहुँचने तक हमें सिवाय बंदर के कुछ न दिखाई दिया । लेकिन प्रकृति का बीच में पहुँचकर जो हमें मिला वो बहुत कीमती था ।
तीन तरफ से लम्बें चौड़े वृक्षों से घिरा रमपुरवा रेस्ट हाउस अपने आप में इतिहास हैं । 1878 में बना रमपुरवा रेस्ट हाउस अंग्रेजों नें प्रकृति विचरण और इंडो-नेपाल बाॅर्डर पर निगरानी हेतु अधिकारियों के लिए बनवाया था । जो 2008 से पर्यटकों के लिए खुला है ।
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| रमपुरवा रेस्ट हाउस |
रेस्ट हाउस पहुँच कर हमना अपनी बुकिंग कंफर्म की और थारू हट के रास्ते कतरनिया ऑफिस की तरफ निकल पड़े । चारो तरफ से घिरे जंगलों के बीच छोटा सा गाँव जिसे थारू हट कहते हैं । थारू इंडो-नेपाल बाॅर्डर की बहुत प्रचलित जनजाति है जो पहले खानाबदोशीं का काम करते थे ।
ये गाँव आज भी अपने पारंपरिक रूप में हैं जैसा हम बचपन में गाँवो को देखा करते थे । कच्चे खपरैल और साफ-सुथरे घर, घर के बार लगी बाड़ जिसमें मवेशी जुगाली करते दिख जाएंगे । सड़को पर बत्तख और मुर्गिया घूमती दिख जाएंगी । कुल मिलाकर ये आपको अपने बचपन की गलियों की सैर करा देगी ।
वहाँ से कतरनिया लगभग आठ किलोमीटर है ।
वहाँ से हम कतरनिया पहुँचे और इंट्री टिकट लेके गाड़ी पार्क की । अंदर ही आपको कैफेटेरिया मिल जाएगा जहाँ आप अपनी पसंद का खाना खा सकते हैं ।
कैफेटेरिया में टाइट जलपान करके हम जंगल सफारी के लिए निकले । जंगल सफारी आमूमन दोपहर दो बजे के बाद शुरू होती है और हम तकरीबन 12-1 बजे पहुँच गये थे मतलब हमारे पास पर्याप्त समय था । हमारे टूरिस्ट गाइड चुन्ना भाई ने बताया कि सफारी के पहले आप लोग पास के बैराज तक घूम सकते हैं ।
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| बैराज |
उनके बताए हुए कच्चे रास्ते से गुजरते हमने दर्जनों हिरनों के झुंड देखे जो पगडंडी के दोनो साइड कानों को खड़ा किए हैरत से हमारी तरफ देख रहे थे ।
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| कुलांचे भरता बारहसिंहा |
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| जंगल का रास्ते में मिला हाथी |
चूँकि इस तरह के जंगल में पहला विचरण था हमारा और उधर हम लोग अकेले भी थे इसलिए हमने तय किया कि हम चलते ही रहेंगे और जंगल का नज़ारा लेंगे । तकीबन 10-12 किलोमीटर जंगल के रास्ते चलते हुए हम बैराज पहुँचे । जहाँ नेपाल से चलकर गेरूआ नही घाघरा बन बन जाती है । जब हम पहुँचे तब बैराज से पानी छोड़ा जा रहा था । जहाँ तक नज़र जाती थी बस पानी-पानी ही नज़र आ रहा था और बैराज से गरजती पानी की आवाजें पैरों में झुरझुरी पैदा कर रही थी । मुझे पानी से ज्यादा डर लगता है इसलिए हम ज्यादा देर नही रूकें और फोटो विडियो निकाल कर चलते बने क्योकि हमें दो बजे सफारी के लिए भी निकलना था । वहाँ से वापस आते वक्त भी हमें हिरनों के तमाम झुंड मिले ।
वापस आकर हमने सफारी के लिए जिप्सी बुक किया और तकरीबन 3 बजे हम सफारी से जंगल के अंदर दाखिल हुए ।
तकरीबन डेढ़-दो घंटे हम जंगल के भीतरी हिस्से में रहे, हिरन, गरूड़, लंगूर और ऊँचे-ऊँचे वृक्ष निगहबान रहे ।
टाइगर ग्रास के बीच से जब हमारी गाड़ी गुजरती और पत्तियों से सरसराहट से कुछ आहट होती तो बदन के पूरे नसों में एक सनसनी सी कौंध जाती । आखिरी में हम नदी किनारे एक शांत जगह रूके जो बहुत ही मनोरम थी । सनसेट का वक्त था और नदी के बीच में उभरे टीले पर मगरमच्छ लकड़ी जैसे पड़े थे ।
वहाँ से हम जल्द वापस निकलना चाहते थे क्योकि शाम ढलने लगी थी और ऐसे में जंगल के बीच रूकना 'सेफ' नही था ।
वापस आकर हमने अपनी गाड़ी ली और थारू हट के रास्ते रमपुरवा जाने लगे । थारू हट पहुँचकर हमने गाँव को करीब से देखा । वहीं अंडे खाए, मूंगफलियाँ खरीदी और लोगो से बातचीत करने लगे । वहीं एक गाँव वाले से बात करते हुए मालूम चला कि पिछली रात ही एक तेंदुआ गाँव से एक कुत्ता उठा ले गया है । ये सुनकर ही रगों में एक सिहरन सी उठी । अंधेरा हो चला था और हमें अपने ठिकाने पर भी पहुँचना था ।
रमपुरवा पहुँच कर हमने चौकीदार रमेश को खाना बनाने को कहा । रमेश ने बखूबी हम लोगो की मेजबानी की ।
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| राशिद भाई और रमेश (बीच में) के साथ |
सात बजे तक खाना पीना खाकर हम लोग बात करने बैठ गये । शहरी जीवन और जंगल के जीवन को एक तराजू में तौलते हुए आकलन किया जा रहा था कि यहाँ के जीवन में क्या 'एडवांटेज' है और क्या 'डिसएडवांटेज' ।
तभी मुझे याद आया कि गाड़ी में कुछ जरूरी सामान छूट गया है और मुझे उसे लेने जाना था । भाई लोगो के सामने हिम्मत तो दिखा दी कि मैं जा रहा सामान लेने लेकिन जब मैं दरवाजे पर पहुँचा और दरवाने को खोलकर बाहर अहाते मैं आया और चारो तरफ नज़र दौड़ाकर घुप्प अंधेरे को मोबाइल की रोशनी से चीरते हुए किसी खतरे की आशंका का जायजा लिया और फिर आश्वस्त होकर झरपट गाड़ी की तरफ भागा और गेट खोलकर अंदर बैठ गया । अपना सामान समेटा और फिर विंटो से चारो तरफ नज़र दौड़ाई । सन्नाटे की चीरती मेरे पैरों की आहट कोठी के दरवाजे पर बढ़ रही थी और दरवाजे पर पहुँच कर जब मैने कुंडी लगाई तो चैन की सांस आई, लेकिन तब भी मेरे सीने की धड़कनें हिलोरे मार रही थी ।
जल्दी सोने की वजह से सुबह पाँच बजे ही मेरी आँख खुल गयी । सूरज नही निकला था और मुझे मार्निंग वाॅक की चुल्ल लगी थी लेकिन अकेले जाने में एक अनजाना सा डर लग रहा था । मैने दरवाजे को खोलकर बाहर नज़र डाली तो रमेश आग जलाकर अपने घर के आगे बैठा था और धुंए की चादर किसी नवयौवना के जुल्फों की तरह लहरा रही थी । मुझे कुछ हिम्मत आई और मैं दरवाजे को खोकर बाहर अहाते में आ गया थोड़ी देर आस-पास टहल कर मैं जंगल की ओर जाती पगडंडी पर आ गया । पगडंडी पर टहलते-टहलते मेरी नज़र मिट्टी पर छपी एक आस आकृति पर जा टिकी । मैं जमीन पर बैठकर और आकृति को गौर से देखने लगा मेरी धड़कने और बढ़ने लगी वो आकृति और कुछ नही बल्कि एक वयस्क तेंदुए के फुटप्रिंट्स थे जो सीधा हमारे रेस्ट हाउस की तरफ जा रही थी ।
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| तेंदुए के फुटप्रिंट्स |
मैं फुटप्रिंट्स को फाॅलो करता हुआ आगे बढ़ रहा जो मेरे कमरे की खिड़की से होते हुए जंगल की झाड़ियों में गुम हो गयी । मैं वापस कमरे पर आया तब तक परवेज भाई जग चुके थे मैंने उन्हे फुटप्रिंट्स के बारे में बताया तो वो भी उत्सुकता वश मेरे साथ बाहर आए । हम काफी देर जंगल के बीच उस फुटप्रिंट्स को फाॅलो कर रहे थे । तब तक सूरज भी निकल चुका था और पगडंडी पर कुछ महिलाएँ मिट्टी खोदने जा रही थी । तभी एक लड़का हमें वहाँ मिला हमने उससे फुटप्रिंट्स के बारे में पूछा तो उसने बताया कि सुबह पाँच बजे के आसपास तेंदुए इस रास्ते से गुजरते हैं ये सुनकर मेरे जेहन मे एक सनसनी कौंध उठी क्योकि पाँच बजे के आसपास ही मैं बाहर पगड॔डी पर घूम रहा था और वो तेंदुआ कुछ समय पहले ही वहाँ से गुजरा रहा होगा । वापस रेस्ट हाउस आने पर राशिद भाई ने बताया कि रात को खिड़की के बाहर किसी की आहट आ रही थी । चौकीदार रमेश ने बताया कि जंगल का ये हिस्सा तेंदुए की टेरेटरी में आता है और यहाँ पचास से ज्यादा तेंदुए की एक्टिविटी रहती है । तब तक हम नाश्ता करके वापस कतरनिया निकल गये । आज हमें रिवर सफारी भी करनी थी ।
नेचर लवर का लिए कतरनिया की रिवर सफारी बहुत एडवेंचरस फील देने वाली राइड होती है, जहाँ आप मगरमच्छ, घड़ियाल, माइग्रेटेड बर्ड्स और गंगेटिक डाॅल्फिन को करीब से देख सकते हैं । अगर आप वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के शौकीन है तो यहाँ आपको तमाम इंट्रेस्टिंग सब्जेक्ट मिल जाएंगे । रिवर सफारी के दौरान हमने तमाम ऐसे बर्ड्स देखे जिनको पहले कभी देखा ही नही था । विशाल शरीर वाले घड़ियालों को धूप सेंकते हुए करीब से देखना बेहद आश्चर्य-सुखद होता है ।
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| गेरूआ नदी में धूप सेंकता घड़ियाल |
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| मैला नाला |
यकीनन वो जगह सुनने से ज्यादा देखने में खूबसूरत है । दोनो तरफ से बेंत की झाड़िया और गहरा हरा पानी 'एमेजाॅन' नदी का ठीक वैसा ही फील देता है जैसा कि हमें डिस्कवरी और नेशनल ज्याग्राॅफी चैनल में देखने को मिलती है ।
रीवर सफारी पूरी होते होते हमारा ट्रिप भी पूरा हो चुका था । अब हमें वापस जाना था । प्रकृति के गोद में दो दिन गुजारने के बाद हमें फिर से कृतिम दुनिया में वापस जाना था ये सोच-सोचकर हम तीनों का दिल बैठा जा रहा था ।
रास्ते भर हम पिछले 36 घंटो के वृत्तांत का डिस्कशन ही किए जा रहे थे । हमारे रीवर गाइड के अनुसार कभी भी जंगल घूमने आना हो तो ये सोचकर आएँ कि प्रकृति के बीच रहने जाना है जानवरों का दिख जाना तो 'बोनस' होता है । बहुत से लोग इतनी दूर से सिर्फ 'टाइगर' देखने आते हैं लेकिन जब उन्हे टाइगर नही दिखता तो उस ग़म में वो जो बाकी चीजें है उसे भी मिस कर देते हैं । मैं भी गाइड की बात से इत्तेफाक रखता हूँ ।
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| गाइड सानू भाई (बीच में) |
कैसे जाएँ
कतरनिया जाने के लिए आप किसी भी दिशा सें लखनऊ आएँ । लखनऊ देश के हर राज्य-शहर से डायरेक्ट जुड़ा है, लखनऊ से कैब करके बहराइच और वहाँ से नानपारा, नानपारा से मिहिंपुरवा कस्बा कस्बे को छोड़ते ही कतरनिया का जंगल शुरू हो जाता है । मिहिंपुरवा से कतरनिया जंगल का ऑफिस तकरीबन 42 किलोमीटर है, और इस 42 किलोमीटर का सफर बहुत रोमांचक है, दोनो साइड से लम्बे ऊँचे पेड़ और दीमक की बड़ी बड़ी-बड़ी बांबिया देखने को मिल जाएगी, इस रोड पर गाड़ी की स्पीड 30 से ज्यादा न रखें तो आपको कई सारे वन्यजीव देखने को मिल जाएंगे । सबसे पहले आप ऑफिस पहुँच कर अपनी बुकिंग कंफर्म करें और रेस्ट हाउस पहुँच कर फ्रेश हो लें क्योकि थकान लेके आप जंगल एक्सप्लोर नही कर पाएंगे । अगर आप रमपुरवा रेस्ट हाउस बुक कराते हैं तो वहाँ के चौकीदार रमेश मिलेंगे जो बहुत कोऑपरेटिव हैं और आपकी हर जरूरत का ख्याल रखेंगे । रमपुरवा रेस्ट हाउस में सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले बाहर न निकलें क्योकि रेस्ट हाउस लेपर्ड के एरिए में बना है और शाम-सुबह उनकी चहलकदमी होती है, इसके बारे में रमेश आपको डिटेल में बता देंगे । रेस्ट हाउस में आपको घर का बना हेल्दी खाना भी मिलेगा ।
कब जाएँ
वैसे तो पर्यटकों के लिए कतरनिया 15 नवंबर से 15 अप्रैल तक खुला रहता है लेकिन कतरनिया जाने का सबसे मुफीद वक्त होता है दिसंबर-जनवरी । क्योकि इस दौरान विडाल वंशियों का मेटिंग टाइम होता है और टाइगर-लेपर्ड आपको पेयर में घूमते दिख जाएंगे । रीवर सफारी में धूप सेंकते एलीगेटर और क्रोकोडायल आसानी से दिख जाएंगे साथ ही इत्तेफाक आपके साथ हो गंगेटिक डाॅल्फिन भी देख पाएंगे । हाथियों का दिखना आम हैं वो कभी भी कहीं भी झुंड में मस्ती करते दिख जाते हैं ।
जंगल सफारी प्लान करते वक्त ख्याल रखें कि आपका प्लान वीकेंड और हाॅलीडे पे न हो क्योकि वीकेंड पे कभी-कभी रश बहुत ज्यादा हो जाता है और गाइड आपको फुर्सत से घुमा नही पाएंगे । बेहतर होगा कि आप वीक डे पर प्लान करें जिससे आप फुर्सत से जंगल घूम सकें ।
इस ट्रिप की संबंधित यू ट्यूब वीडियो की लिंक
1- https://youtu.be/nwNbq5OaaaM करतनिया में बाहरसिंहा
2- रमपुरवा रेस्ट हाउस https://youtu.be/bPVdyPm0Yq8
3- रीवर सफारी घड़ियाल का वीडियो https://youtu.be/DKn2owZRFWI
4- मैला नाला लिटिल एमेजाॅन व्यू https://youtu.be/6Z9MepD_jwE
5- रेस्ट हाउस के बाहर तेंदुए के फुटप्रिंट्स https://youtu.be/0Nip8GIUpTU
इस ट्रिप के लिए सादिक रजा जैदी 'नवोदयन' भाई और दबीर हसन साहब का बहुत बहुत शुक्रिया साथ ही परवेज आलम भाई, राशिद भाई का भी बहुत बहुत शुक्रिया जिन्होने यायावर की डायरी को फिर से लिखने को प्रेरित किया











