Thursday, December 9, 2021

तालिबान 2.0 और समकालीन राजनीति

कहते हैं महाभारत खत्म होने पर जब शकुनि के षणयंत्र का पता चला तब गांधारी ने अपने भाई को ही श्राप दे डाला कि जिसके षणयंत्र से भारत-भूमि में इतना रक्तपात मचा है उस शकुनि के खुद के देश गांधार (तात्कालिक अफगानिस्तान) में कभी शांति नही रहेगी । अब इसे गांधारी का श्राप कहें या राजनैतिक और भौगोलिक परिदृश्य, अफगानिस्तान हमेशा से बारूद का ढेर पर ही बैठा रहा । अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन के शपथ ग्रहण से ही अटकलें लगाई जा रही थी कि अफगानिस्तान से अमेरिका के बोरिया-बिस्तरा बांधने में अब ज्यादा दिन नही बचे । लम्बे समय से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में लोकतंत्र की दुहाई और चरमपंथ की मनमानी की गर्मागर्म बहस के बीच अफगानिस्तान कुछ इस तरह फंसा रह गया कि जब असल मुसीबत दबे पाँव उसकी दहलीज पर दस्तक देने लगी तो अफगानी आवाम को संभलने तक का भी मौका नही मिला । रात की खामोशीं मे अशरफ गनी चुपचाप देश छोड़कर भाग जाते हैं तो वहीं अत्याधुनिक हथियारों से लैस लाखों की तादाद में अफगानी सेना महज पचहत्तर हजार की संख्या वाले तालिबानी लड़ाको के आगे घुटने टेक देती है । अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसियों को तड़कता-भड़कता मसला मिल गया, चरमपंथियों को सत्ता मिल गयी, अमेरिका को वादाफरामोशी के लग रहे आरोपो से निजात मिली, पाकिस्तान को उम्मीद मिली, चाइना और रशिया को कूटनीतिक जीत मिली । हर किसी को अपने-अपने फायदे की जरूरत भर चीजें मिल गयी लेकिन इन सबके बीच अफगानी आवाम को जिस दर्द से गुजरना पड़ा उसके बारे में न्यूज एंकर और यूएन के पदाधिकारी एक्साइटमेंट और गुस्से में कुर्सियों पर उछल कर चिल्लाने से ज्यादा कुछ कर नही पाए । जिस वक्त अफगानिस्तान को यूएन और शांति के हिमायतियों की सबसे ज्यादा जरूरत थी उस वक्त वो सभी बगले झांकते नज़र आए । काबुल एयरपोर्ट पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलती रही और दुनिया के शांतिदूत शांति से सोते रहे । तुर्की, तजाकिस्तान, पाकिस्तान, रशिया, चाइना और ईरान अपने अपने फायदे के लिए अफगानी बिसात पर अपनी-अपनी मुहरें चलते रहे । भारत जैसे शांतिदूत देश भी निंदा बम की बरसात कराकर आखिरकार तालिबान को मान्यता देने वाली फेहरिस्त में शामिल हो ही गया । ये जो नयी जेनरेशन के युवा है इन्हे कुछ वक्त तो ये समझने में गुज़र गया कि आखिर तालिबान के नाम का इतना खौफ क्यों फैला हुआ है ? दुनिया में हर महीने किसी न किसी देश में तख़्तापलट तो होता ही रहता है । हाल ही में अफ्रीकी देश माली में तख्तापलट हुआ । अफ्रीका के ही गिनी में अभी पिछले हफ्ते सैनिक विद्रोह हुआ जिसमें राष्ट्रपति अल्फा कोंडे को गिरफ्तार कर तख्तापलट की घोषणा की गयी । पिछले साल पड़ोसी मुल्क बर्मा में भी सैनिक तख्तापलट हुआ लेकिन जितनी चर्चा, अफवाहें, सरगर्मियाँ तालिबान को लेकर फैली उतनी किसी और की नही । आखिर तालिबान को लेकर ऐसा क्या ही मसला है कि सिर्फ अफगानी आवाम ही नही बल्कि समूची दुनिया इस बात से हैरान-परेशान हो उठी । कौन है ये तालिबान, कहाँ से आया है तालिबान ? और क्यों इतना उत्पात मचा रहा हैं जिसकी गूंजे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के कान खड़े किए हुए है । दिल्ली के जेएनयू की शोध छात्रा रशिदा अब्बास 70 के दशक में काबुल यूनिवर्सटी में पढ़ने वाली अपनी दादी की तस्वीर दिखाते हुए कहती हैं कि वो वक्त अफगान इतिहास का सुनहरा वक्त था जब अफगानी औरतें अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकती थी । कपड़ो पर कोई बंदिश नहीं थी लेकिन आज का दौर देखकर यही कह सकते हैं कि जब पूरी दुनिया विकास की दिशा में आगे बढ़ रही है तब उस दौर में अफगानिस्तान वक्त के दायरे में पीछे की तरफ बह रहा है । वापस अपने मुल्क जाने के सवाल पर रशिदा भावुक हो जाती हैं और कहती हैं कि अपने मुल्क से किसे मुहब्बत नही होती लेकिन जिन हालातों से अफगानिस्तान जूझ रहा है वहाँ वापस जाने का सवाल ही नही उठता । अफगानिस्तान में तालिबान 'सोवियत-अफगान फ्रेंडशिप ट्रिटी' के तहत सोवियत का 1978 में अफगान में घुसना एक महत्वपूर्ण घटना थी । सोवियत की साम्यवादी विचारधारा इस्लाम की विचारधारा से कुछ हद तक समानता रखती है । दोनो ही समान अधिकार की बात करते हैं । गौरतलब है कि 1979 में यूएसए-सोवियत का शीत युद्ध अपने चरम था । दोनो ही देश अपना विस्तार करने और एक दूसरे को नीचा दिखाने की भरसक कोशिश कर रहे थे । एक तरफ यूएसए नाटो तैयार कर रहा था तो दूसरी तरफ सोवियत वारसा तैयार कर रहा था । 90 के दशक में सोवियत अफगानिस्तान छोड़ने को तैयार हुआ उस वक्त फैली अव्यवस्था और अफरा-तफरी में चरमपंथियों को अपनी राह प्रशस्त करने का मौका मिला । मुल्ला नामक एक मौलवी ने 50 छात्रों जिन्हें पाश्तो भाषा में तालिबान कहते हैं को लेकर 'तहरीक ए तालिबान' की नींव डाली । सोवियत युद्ध के मुजाहिदों ने तालिबान को सर-आँखो पर बैठाया । इस संगठन को सऊदी और पाकिस्तान का समर्थन हासिल था । पाकिस्तान की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर अली भुट्टो के शौहर आसिफ अली जरदारी का बहुत बड़ा हाथ रहा । बहरहाल, सोवियत के जाने के बाद पाकिस्तान में मजबूत हुआ तालिबान अफगानिस्तान पर टोटल कंट्रोल के लिए काम करने लगा । शुरू शुरू में अफगानी कबिलाई को बड़ा मजा आया । उनको लगा कि जैसे मुल्ला उमर के अक्श में मुहम्मद का नूर उतर आया हो । उन लोगो ने मुल्ला को खुल्ला समर्थन दे डाला । लेकिन तालिबान ने पाॅवर आते ही अपना असल-रंग रूप दिखाना शुरू कर दिया । जिस तरह भस्मासुर ने शिव से घातक वरदान प्राप्त कर लेने के बाद उन्हें ही भस्म करने के लिए दौड़ा लिया । तालिबान ने भी अपने ही समर्थको पर अत्याचार शुरू कर दिए । लोगो को लम्बी दाढ़ी रखने के लिए मजबूर किया गया । आधुनिक शिक्षा पद्धति को नष्ट किया गया । यहाँ तक कि मनोरंजन के साधनों पर भी प्रतिबंध लगाए गये । अब अफगानियों के पास सिवाए पछतावे के कुछ नही बचा था । खौफ का यह धंधा 1996 से 2001 तक चलता रहा । तालिबान का यह नंगा नाच तब तक चलता रहा जबतक उसने ओसामा बिन लादेन को पनाह नही दी, जिसने ट्विन टाॅवर को ध्वस्त करके सीआईए और एफबीआई की रडार में खुद को तालिबान और अलकायदा सहित झोंक नही दिया । 2001 में ट्विन टाॅवर (वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन) पर हमले से बौखलाया अमेरिका अपनी नाटो सेना लेकर अफगानिस्तान में घुसता चला आया । और यहीं से तालिबान की उल्टी गिनती शुरू हो गयी । तालिबान का रक्त रंजित कृत्य पिछले हफ्ते ही ख़बर आई कि पूर्व उपराष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह के भाई का तालिबान ने पंजशीर में बेरहमी से कत्ल कर दिया गया । जिस मुल्क के सियासतगर्द ही महफूज़ न हो उस मुल्क के आवाम की सुरक्षा का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है । 1996 से 2001 के बीच तालिबान ने शरिया कानून के नाम पर जो कहर बरपाया है उसकी कोशिश यही रहेगी कि इस बार की सत्ता पिछले से इक्कीस ही हो उन्नीस न हो । धार्मिक कट्टरता के मामले में तालिबान ने बाकी सभी को पीछे छोड़ दिया है । दुनिया भर के तमाम मानवाधिकार संगठन भी इस बर्बरता के सामने बेबस नज़र आए । तालिबान की कार्य-पद्धति पूरी तरह शरीयत पर आधारित है । पाकिस्तान की खुफिया एंजेसी आईएसआई और सऊदी अरब ने तालिबानी को फंडिंग और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराकर जेहाद के लिए तैयार किया है । अफगानिस्तान की युवा बाॅक्सर सीमा रेजाई इस वक्त बहुत डरी हुई हैं । वजह ! उनका गुनाह । और गुनाह भी क्या कि, उन्होने एक राष्ट्र के रूप में अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व लेने का सपना देखा सीमा रेजाई वर्तमान नेशनल लाइटवेट चैंपियन हैं और अब वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने मुल्क की नुमाइंदगी करना चाहती है लेकिन अगस्त में हुए तख्तापलट के बाद से तालिबान ने ऐसी महिलाओं को खोजना शुरू कर दिया है जो बकौल शरिया कानून के खिलाफ कोई काम कर रही हैं । तालिबान को मालूम हुआ कि सीमा पुरूष कोच से ट्रेनिंग ले रही है इस बात पर उसने फतवा जारी कर दिया । अब सीमा अपना मुल्क छोड़कर कतर की शरण में है और अमेरिका से गुहार लगा रही हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे । दरअसल तालिबान के अपने कायदे-कानून हैं जिसे वो शरियत का नाम देकर आम लोगो पर थोप रहा है । उसके इस कानूनों की कुछ झलकिया देखिए- • हिजाब पहनना महिलाओं के लिए बेहद जरूरी करना और गलती से भी शरीर का कोई अंग दिख जाने पर सरेराह महिला की पिटाई करना • प्रेम करने और प्रेमी के साथ भाग जाने पर बीच चौराहे पत्थरों से पीट पीट कर मार डालना • 11 साल से ऊपर बच्चियों की शिक्षा बंद करना • पुरूष डाॅक्टर द्वारा महिला मरीज की जाँच करने पर प्रतिबंध लगाना • क्लीन शेव करने पर कोड़े मारना • महिलाओं को घर में कैद रखना और उन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन समझना इस तरह हम देख सकते हैं कि तालिबानी कायदे किस तरह मानव विरोधी विचारों को प्रोत्साहित करता है । और हिंसा के नोक पर लोगो को ज़लालत की जिंदगी जीने पर मजबूर कर रहा है । अंतरराष्ट्रीय बिरादरी चुप क्यो है ? हम देखते हैं इस संगीन मसले पर लोग हल्ला तो मचा रहे हैं लेकिन जब इस दिशा में कुछ करने की बात आती है सारे अंतरराष्ट्रीय संगठन मुँह में दही जमाए बैठ जाती है । सच तो ये है कि किसी को भी अफगानी आवाम के दर्दो-गम से कोई लेना देना नही है । हर कोई बस अपने फायदे के लिए पक्ष-विपक्ष का पाला चुन लेते हैं । साढ़े तीन हजार साल पहले भारत में पहली घुसपैठ से लेकर सिंकदर, सेल्यूकस, डेरियस (दारा), शक, हूण, और कुषाण जैसे गैर मुस्लिम समुदायों ने अफगान को लूटा उसके बाद इस्लाम के उदय के साथ ही बर्बरता अपने चरम पर आने लगी । पूर्व मध्यकाल में तुर्क, मंगोल और फारसी शासकों ने भी अफगान को लूटा भी और अपना घर भी बनाया । विभिन्न संस्कृतियों के लोग वहाँ आते भी रहे और जाते भी रही । इससे वहाँ की मूल संस्कृति कभी सहेजी ही न जा सकी । भारत और फारस के बीच का ये भूभाग हमेशा रण क्षेत्र ही बना रहा । प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर ये ज़मीन हमेशा शोषण की पनाहगाह बनी रही । आधुनिक युग में लीथियम का आकूत भंडार की खबर होने पर अमेरिका, यूरोप और चाइना की नज़र अफगानिस्तान पर लम्बे समय से गड़ी रही है । यही वजह है कि कोई भी देश ये नही चाहता कि वहाँ शांति बहाल हो । फिलहाल वहाँ विश्व समुदाय तीन फाड़ में बट चुका है • चाइना, रशिया, पाकिस्तान • ब्रिटेन, भारत, अमेरिका • तुर्की सऊदी ईरान चाइना, रशिया और पाकिस्तान अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर ललचाई नजरो से मुँह खोले तालिबान को समर्थन दे रहे हैं ताकि वक्त आने पर उसका दोहन किया जा सके । ब्रिटेन, भारत और अमेरिका लोकतंत्र और शांति के पक्षधर बन तालिबान का लगातार विरोध कर रहे हैं तुर्की, सऊदी और ईरान एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने के हसीन सपने देख रहे हैं । तालिबानी युग में मानवाधिकार वर्तमान समय में मानवाधिकारों की जितनी धज्जिया तालिबान ने उड़ाई है उतनी आधुनिक दुनिया में कही भी देखने को नही मिलती । स्वतंत्रता के अधिकारों का लगातार मखौल उड़ाया जा रहा । मानव के नैतिक जीवन मूल्यों को कोई कद्र नहीं बची है । मोस्ट वांटेड आतंकी सवैंधानिक पदो पर असलहें लहराते बैठे हुए हैं । महिलाओ को घरों में कैद किया जा रहा है । शरिया कानून की अवहेलना पर उन्हें पीटा जा रहा । सड़को पर गोलियाँ चलाई जा रही । पूर्व में बनाए गये सारे संस्थान नष्ट किए जा रहे । आपको याद होगा तालिबान की पिछली सरकार में बामियान में बुद्ध की सबसे बड़ी मूर्ति को तोप और गोलियों से पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था । तालिबानी अपने विचार के अलावा किसी दूसरे विचार को बर्दाश्त नहीं करते । यह लोकतंत्र के लिए कलंक है । तालिबान के वापस आने से अफगानिस्तान फिर से अंधेरे समय में खोता दिख रहा है । कुछ दिन पहले ही काबुल यूनिवर्सटी में महिलाओं के ड्रेस कोड की ऑफिशियल घोषणा की गयी साथ ही उन्हें शरिया कायदे से जिंदगी गुजारने की जबरन शपथ भी दिलाई गयी । लड़के और लड़कियों के साथ पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गयी । एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए यह अफगानिस्तान के लिए काले दिनों की शुरूआत है । अव्वल होना तो ये था कि इसमें विश्व समुदाय को अफगान की सहायता के लिए यूएन आर्मी को पंजशीर के समर्थन हेतु भेजना चाहिए था । लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और चाइना के बढ़ते वर्चस्व को चुनौती देने के लिए कोई भी तैयार नहीं है । जिस वक्त अफगानिस्तान को विश्व बिरादरी की सबसे ज्यादा जरूरत थी उस वक्त लोगो ने उससे मुँह फेर लिया । हमने देखा कि जिद, पागलपन, धर्मांधता, लालच के बीच किस तरह के हालातों से अफगानिस्तान जूझ रहा है । सोवियत, अमेरिका, चाइना के सम्राज्यवादी विस्तार ने अफगानिस्तान को अपने पैरो पर खड़े नहीं होने दिया तो वहीं चरमपंथियों के गुट ने इस कमजोरी का फायदा उठाकार हालात को और विध्वंसक बना डाला है । रशिदा और सीमा जैसी हजारों-लाखो महिलाओं का भविष्य अंधेरे में हैं, उन्हें अपने भविष्य के लिए भारत और अमेरिका सहित विश्व समुदाय की सहायता की जरूरत है । बंद कमरों में महिलाएँ डिप्रेशन की तरफ ढकेली जा रहीं हैं । अब भी अगर मानवता के हित के लिए कोई निर्णायक फैसला नही लिया गया तो आने वाले समय में यह चरमपंथियों के लिए एक मिसाल बनेगा और उन्हें अपने विचार आम लोगो पर थोपने का प्रोत्साहन मिलेगा । इसे समय रहते रोक लेना चाहिए अन्यथा बाकी विश्व में लोकतंत्र पर संकट गहराते दिखने शुरू हो जाएंगे । संदर्भ: 1-बीबीसी न्यूज 2- द क्विंट 3- विकिपीडिया

Monday, August 30, 2021

नवोदयनामा: दहर के दयार में

हम मनुष्य कोशिकाओं से नही बल्कि स्मृतियों से बने हैं -शिवेन्द्र । सर्द मौसम, दिसंबर का महीना । कुहासे में नहाकर निकलती हवाओं का हुस्न अपने चरम पर ठहरा हुआ था । जिसकी छुअन माथे और नाक को छूकर पूरे बदन में सिरहन पैदा कर रही थी । सुबह तड़के ही मैं घर से निकल आया था । आज कई साल बाद अपने स्कूल जाना था । स्कूल में पुरातन छात्र सम्मेलन का आयोजन किया गया था । मैं बहुत उत्साहित था कि बरसो बाद स्कूल के उन सड़कों, गैलरी, हाॅस्टल और क्लास बिल्डिंग के दीदार का मौका मिलेगा, जिनके जर्रों में दबी मेरी शरारतों की यादें फिर से ताज़ी होने वाली थी । जिन्हें वक्त ने अपने लिहाफ से ढक रखा था । हकीम साब एक महीने पहले ही इनवीटेशन भेज चुके थे और लगातार उनके रिमाइंडर आ रहे थे । हकीम साब उर्फ राशिद भाई । हमारे स्कूल के सबसे पुराने चावल मतलब स्कूल के पहले बैच के विद्यार्थी और पुरातन संगठन के पितामह । ये उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि स्कूल से पास आउट हुए सभी विद्यार्थी एक दूसरे से मिल पाए और एलुमिनाई मीट जैसी गेट टुगेदर का आयोजन हो सका ।  उनको जड़ी बूटियों, गार्डनिंग और नेचर में एडवेंचर का बड़ा शौक है । खासे दिलचस्प इंसान है हमारे हकीम साब । एक बार वो घूमते-टहलते नाॅर्थ ईस्ट पहुँच गये, वहाँ से उन्हे बाँस की औषधिक ग्यान की प्राप्ति हुई और हर किसी को वो बाँस के फायदे गिनाने लगे । हाँलाकि नाॅर्थ ईस्ट जो कि बाँस की खेती के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है वहाँ हर क्षेत्र में बाँस का इस्तेमाल किया जाता है । घर बनाने से लेकर नाॅर्थ ईस्ट कुज़ीन तक । लेकिन उत्तर भारत में बाँस के सीमित उपयोग ही माने गये हैं । हाँ ! कहीं कहीं मुहावरे के रूप में अश्लीलता का पर्याय ही माना गया है । अब जब हकीम साब सबको बाँस के फायदे गिना रहे थे तो कुछ शरारती तत्वो नें उनका उपनाम ही 'हकीम साब' रख दिया । हम लोगो के लिए राशिद भाई के नाम से राशिद और भाई का लोप हो गया और उसकी जगह 'हकीम' और 'साब' का नया अवतार सामने आ गया । उनके जैसे दिलचस्प शख्सियत के लिए अलग से लिखा जाना मुफ़ीद रहेगा फिलहाल हम यहाँ किसी और मुद्दे की बात कर रहे हैं । बहरहाल हकीम साब, परवेज भाई और डाॅक्टर आशिम अबरार के साथ मैं आज 8 साल बाद उस धरती पर खड़ा था जिसने मुझे खुद की पहचान दी, नाम दी और जिंदगी का मकसद दिया । ये वही जगह थी जिसने मुझे वक्त के साथ दौड़ना सिखाया, लड़ना सिखाया और हलक तक भरकर इल्म को पीना सिखाया । आज भी वहीं सड़कें, वही गलियाँ, वही मैदान और वही आसमान अपनी जगह पर रूका हुआ था जिसे छोड़कर मैं जिंदगी की रेस में आगे बढ़ गया था । वापस उस जगह आकर जैसे मेरा बचपन लौट आया था । सफ़ेद यूनिफाॅर्म में मुर्गियों के बच्चो की तरह झुंडो में चलते अल्हड़ उदंड लड़के आँखो के सामने नाचने लगे । कीचड़ में सने कैनवस के जूतों से सामने वाले के चमकदार सफ़ेद जूतों को मैला करके अट्ठाहस करते चंट मुरहे लड़को के बीच मेरा बचपना फिर से जीवित होने लगा । शर्मीली, पूड़ी, गडरा, पिद्दी और चिरई जैसे मेरे सहपाठियों की छद्म धुंधली आकृति अब साफ होने लगी । ऊँची काली पानी की टंकी जिसे देखकर स्कूल के शुरूआती दिनों में धुकधुकी बंध जाती थी आज इस धरती से प्रेम के किस्सों की गवाही देती नज़र आने लगी । सारी औपचारिकता, भाषण, और खाने के बाद हम असल काम पर आए यानी वर्तमान विद्यार्थियों से टू वे वार्तालाप । पुरातन और वर्तमान विद्यार्थियों के बीच वाॅलीबाॅल का मैच चल रहा था  । किसी भी मैच को देखने का मज़ा मैदान में बैठकर ही आता है । चारो तरफ़ अपने अपने टीम को उत्साहित करते दर्शक, शोर शराबा और हर एक प्वाइंट पर जोश का उबाल । न जाने कितने दिनों बाद उस गर्मी को मैंने अपने सीने में महसूस किया । स्कूल के दिनो में हर महीने इंटर हाउस कंपटीशन होते रहते थे । अरावली, नीलगिरी, शिवालिक और उदयगिरी पर्वत श्रेणियों नाम पर बनाए गये हाउस एड़ी चोटी का जोर लगाकर हर फील्ड में अव्वल बने रहने की भरसक कोशिशें करते रहते थे । इसके अलावा कलस्टर, रिजनल और नेशनल लेवल के गेम्स का अलग ही चार्म रहता था । एक बड़े से मैदान में अलग-अलग कलस्टर, और राज्यों के प्रतिभागी जोर अजमाइश करते थे । वो हमारे लिए किसी ओलंपिक से कम न होते थे । हर एक प्वाइंट पर दर्शकों का उबलता जोश और मैच हारने के बाद गले लगाकर सात्वंना देना स्पोर्ट्स के सबसे खूबसूरत लम्हे हुआ करते थे । उन दिनों मैं जूडो खेला करता था । जूडो खेलने और एक्सट्रा एक्टिविटी के बहाने मैंने स्कूल की तरफ से खूब भ्रमण किया । अलग-अलग स्कूलो में रहकर वहाँ के बच्चो से मिलकर मैंने बहुत सी चीजें सीखी । स्कूल में देश के सूदूर क्षेत्रों से बच्चे माइग्रेशन करके आते थे । मसलन मेरे स्कूल में त्रिपुरा से, तो वहीं बाराबंकी में पंजाब, फैज़ाबाद में कश्मीर और लखनऊ में केरल से बच्चे पढ़ने आते थे । गेम्स और एक्स्ट्रा एक्टिविटी के नाम पर मेरा दूसरे विद्यालयों में आना-जाना लगा रहता था । इससे मुझे भारत की विविधता के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला । स्काउट कैंप के दौरान ट्रैकिंग, कुकिंग, सरवाइवल स्किल और थोड़े बहुत जासूसी के गुर सीखने को मिले । स्काउटिंग करते हुए हर रात हमें एक सीक्रेट कोड दिया जाता था और संदिग्ध व्यक्ति से बात करते हुए हम उससे कोड पूछते थे । सही कोड बताने पर ही हम उसे अपना साथी मानते थे । एक बार की बात है रात को हमारा कोड टाॅर्च था और एक गैर स्काउट लड़का हमारा कैंप में घुस आया कोड पूछने पर उसने सही जवाब दिया तभी मालूम चला कि कोड रीवील हो गया है । आनन-फानन में तुरंत कोड बदला गया और सुबह होते ही उस लड़के को स्काउट से निकाल दिया गया जिसने अपने गैर स्काउट दोस्त को कोड बता दिया था । उस वक्त मुझे बुरा लगा था कि एक कोड बता देने भर से उसे निकाला तो नही जाना जाना चाहिए था लेकिन कम उम्र में अनुशासन सिखाने के लिए दंड जरूरी होता है ये बात मुझे बाद में समझ आ ही गयी । फिलहाल वाॅलीबाॅल का मैच खत्म हो गया था । बेहद रोमांचक मैच में पुरातन छात्र को विजयी घोषित किया गया । पुरातन छात्रों की जीत पर वर्तमान छात्रों को खुशी मनाते देख दिल को बड़ा सूकून आया । आज जिस दौर में हम जी रहे हैं उसमें खेल और विचारधारा की प्रतिद्वंदिता में एक अजब ही कड़वाहट देखने को मिलती है । खेल और राजनीति में असहिष्णुता इस कदर हावी हो जाती है कि भारत-पाक मैच में हारने वाली टीम के समर्थक हिंसा पर उतर आते हैं तो वहीं राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई में गले कटने लगते हैं । इसी दौर में प्रतिद्वंदी की जीत में खुशी मनाने की परंपरा मेरे स्कूल ने अभी तक जिंदा रखी है इसे देखकर देश के भविष्य के लिए एक उम्मीद की किरण जगती तो है । मैच के बाद मैं बाॅस्केटबाॅल कोर्ट से हाॅस्टल की तरफ जा रहा था तभी एक लड़का मेरी तरफ दौड़ता हुआ आया उसके हाथ में एक डायरी और एक पेन था । मेरी तरफ आते उसने अपनी डायरी और पेन मेरी तरफ बढ़ा दिया । मैंने आँखों से पूछा 'क्या' ? तो उसने कहा भैया कुछ लिख दीजिए । उफ ! ये डायरी मैं फिर से अतीत में डूबता-उतरारा महसूस करने लगा । हाईस्कूल के बोर्ड एक्जाम आने वाले थे और पूरे हाॅस्टल में डायरी घुमाने की परपंरा चल रही थी । रंगीन, खूबसूरत, बड़ी-बड़ी डायरियाँ एक हाथ से दूसरे हाथों में जा रही थी । कहीं कही लिखे हुए पन्नों में स्टेपलर से पंच किया होता था । खासतौर से लड़कियों की डायरी में । क्या पता उसमे कोई काॅन्फिडीशियल या राॅ की इन्फाॅर्मेशन होती थी या डायरी के बीच में कोई प्रेमपत्र । कौन जाने क्या लिखा होता था । मैंने भी उस दौरान न जाने कितने लोगो की डायरी भरी । ज्यादातर सीनियर्स का ही लिखा । सच कहूँ तो लिखना मैंने कम उम्र में ही सीख लिया था लेकिन शब्द भंडार मेरा डायरी लेखन से समृद्ध हुआ । मेरी भी डायरी गर्ल्स और ब्यायज हाॅस्टल की चक्कर लगा के जब मेरे पास आई तो लगा इस पाँच साल की जेल यात्रा का असली लेखा जोखा मेरे हाथ में है । मार्कशीट तो सिर्फ ये बताते हैं कि आपने तय सिलेबस में कितना पढ़ा और लिखा है । और जो वक्त हमने उस कैंपस में रहकर गुजारा, जो 'कर्म और 'कांड' किए उसका रिपोर्ट कहाँ है ? दोस्तो से बेहतर क्रिटिक और कौन हो सकता है, जिसने आपको करीब से देखा हो, महसूस किया हो । नवीं कक्षा में रिक्त सीटो पर नये एडमिशन हुए थे । अच्छे लड़के आए थे घर से दूर रहने आए नये दोस्तो को कायदे सिखाने की जिम्मेदारी हमीं लोगो पर थी । हम लोग कोशिश में थे कि उन लोगो को किसी तरह की तकलीफ न हो । इसेंशियल दिलाने से लेकर क्लास रूम और हास्टल में एडजस्ट कराने तक हम सभी उन सबकी हेल्प कर रहे थे । तभी मालूम चला कि रात को कोई सीनियर उनमे से एक लड़के की रैगिंग कर गया है । गहन पड़ताल करने पर पता चला कि मेरे बैच का ही लड़का सीनियर बनकर नये लड़को की रैगिंग कर रहा था । ये सुनकर हम सब हँस हँस कर लोट पोट हुए जा रहे थे । जब नये लड़के को मालूम हुआ कि रैगिंग करने वाला कोई सीनियर नही बल्कि उसका ही बैचमेट था तो गालियों का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसकी तल्खी लंबे समय तक बनी रही । गाहे-बगाहे कोई न कोई उस लड़के से पूछ ही लेता 'क्यो भाई सुना है कोई रैगिंग ले रहा था तुम्हारा' बस इतना वाक्य काफी होता और वो लड़का बस छूट ही जाता । कलकल, अविरल, निर्झर अत्तरी-धत्तरी करके गालियाँ उसके मुखारबिंदु से प्रवाहित होने लगती । इस कर्म में लोगो को विशेष आनंद आने लगा । तब तक के लिए जब तक मनोरंजन का कोई दूसरा मुद्दा नही मिल गया । बाद में वो लड़का मेरा बहुत अच्छा दोस्त बना । उसका नाम विस्तृत था । जैसा उसका नाम वैसा ही उसका व्यक्तित्व । स्कूल के दिनों के बाद मैं उससे कभी नही मिला, लेकिन स्कूल के दिनों में मैंने उससे तेज तर्रार लड़का कभी नही देखा । गोरी चमड़ी, बिना होंठ कि मुँह जिसके पीछे गाँव के खड़न्जे से उबड़ खाबड़ दाँत, दो हड्डी का बच्चा जिसका कंधे से कमर तक का आकार एक पटरे जैसा था । कंधे से लटकते तंदूरी सींक से हाथ, पतली पतली दो टांगे, कुपोषण के बेहतरीन ब्रांड एंबेसडर हो सकते थे । इन सब के बीच उसका प्रेजेंस ऑफ माइंड और क्रिएटिविट गज़ब की थी हाँलाकि साहित्य और कला से उसकी दुश्मनी थी लेकिन साइंस का वो ब्रिलियंट स्टूडेंट था । विज्ञान और साहित्य के बीच जो समानता है उसी का नाम क्रिएटिविटी है । हम दोनो के बीच यही समानता था और यही वजह थी जिससे मेरी उसकी छनती थी । फरवरी का महीना चल रहा था और उस दिन मौसम बहुत खुशगवार था । चारो तरफ बदली और रेशमी हवाएँ रूह को सूकून दे रही थी । तिस पर स्कूल के ज्यादातर टीचर एंट्रेंस एक्जाम कराने अलग अलग जगहों पर गये हुए थे । इक्का दुक्का ही टीचर कैंपस में रह गये थे । मौके की नज़ाकत को देखते हुए मैंने विस्तृत से कहा कि चलो मनकापुर घूम आएँ, मौका लगा तो पिच्चर भी देख लेंगे । मामला जँच गया और सुबह ग्यारह बजे तक हम लोग बाउंड्री लांघ गये । मनकापुर पहुँचकर हमने कुछ सामान खरीदे । वक्त पर्याप्त था तो हम लोग टाॅकिज की तरफ चल निकले । रात की विधिवत बारिश का पनारा अभी तक बह रहा था । उन्हीं कीचड़ो, नालियों और चहबच्चो से होते हुए टाॅकिज पहुँचे । उस दिन कुछ कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था इसलिए टाॅकिज बंद थी । हम उदास मन से वापस लौट रहे थे कि तभी आसमान जोर से कड़का और झमाझम बारिश शुरू हो गयी । जो जहाँ था वहीं फंस गया । उन्मुक्तता के सेलेब्रेशेन में हम छाता लाना तो भूल ही गये थे । हड़बड़ी में एक सब्जी की दुकान में दोनो घुस गये । उस मूसलाधार बारिश में हम दो घंटे फंसे रहे । जब बारिश कम हुई तो समय देखा । चार बज गये थे । चार बजने का मतलब कि टीचर्स के वापस कैंपस आने का समय हो गया । अब क्या किया जाए, ये कमबख़्त बारिश थमने का नाम ही नही ले रही । फायनली हमने तय किया कि अब रूकेंगे नही, कैसे भी करके वापस स्कूल पहुँचना ही है । सब्जी वाले से पाॅलीथीन लेकर दोनो ने उसे सर पर चढ़ा लिया । चौराहे पर पहुँचा तो एक धक्का और लगा । एक भी गाड़ी चौराहे पर नही थी जो हमारे स्कूल तक जाती है । अब क्या किया जाए ? विस्तृत हैरत से बोला 'दो ही रास्ते हैं' मैंने बहुत संजीदगी से सोचते हुए जवाब दिया वो क्या ? या तो लिफ्ट मांगकर चलो या फिर पैदल लिफ्ट के लिए कोई गाड़ी तो गुज़रनी चाहिए तो पैदल चलो 'सिरिया गये हो का ? 8 किलोमीटर पैदल ? हमसे न हो पाएगा तुहिन जाओ' फ्रस्टेशन में भाषा हिन्दी से अवधी पर आ गयी । तो मरो फिर इहैं । यहाँ से किसी तरह पहुँच भी गये और स्कूल में मालूम चल गया तो पेले बहुत जाओगे तो अब ? चलो धीरे धीरे । कोई मिल गया रास्ते में तो लिफ्ट ले लेंगे वरना शाम की काउंटिग से पहले पैदल तो पहुँच ही जाएंगे । मामला यही फायनल हुआ । पाँच बच चुके थे, ठंड के दिन और बारिश के मौसम ने शाम को रात की तरफ ढकेल दिया था । हम दोनो पैदल-पैदल मार्केट पीछे छोड़ चुके थे कि तभी सड़क से दूर कोई मोटरसाइकिल आती दिखाई थी । दोनो ने एक दूसरे की आँखो में देखा जो काँच की गोलियों सी चमक रही थी । मोटरसाइकिल पास आई तो मैंने हाथ दिखाकर रूकने को कहा और जोर से चिल्ला कर कहा "देवरिया चलबौ हो का" ? मोटरसाइकिल सवार जिसने नीले रंग का रैनकोट पहना था, मोटरसाइकिल साइड में रोक दी और हेलमेट उतारा । मोटरसाइकिल सवार का चेहरा देख कर हम दोनो के चेहरे का रंग उड़ गया । अरे ! मर गये । ये तो केमेस्ट्री सर थे यहाँ क्या कर रहे हो ? सर कुछ सामान लेने आए थे क्या सामान ? साइंस प्रोजेक्ट का सामान है सर अच्छा ! परमिशन लेके आए हो ? हाँ सर नीलिमा मैम से परमिशन लिए थे अच्छा चलो बैठो । दोनो ने एक दूसरे की तरफ कुटिल मुस्कान से देखा और मैंने उसे आँख मार दी । स्कूल पहुँचकर सीधे हाॅस्टल की तरफ दौड़े, आज का दिन तो बहुत एडवेंचर भरा था । भइया आप लोगो ने तो बहुत फन किए होंगे न अपने टाइम पर । कुछ बताइए न । ये सुनकर मेरी तंद्रा टूटी और मैं मुस्कुरा उठा । उस लड़के की डायरी में शुभकामनाएँ लिखी, जैसा हम स्कूल के दिनो में दूसरो की डायरी में लिखते थे । ग्राउंड से निकल कर मैं एक लड़के का साथ जूनियर हाॅउस की तरफ जा निकला जिसे परित्यक्त कर दिया गया था । उसे देखकर मन उदास सा हो गया । हाय ! यही वो जगह थी जहाँ कदम थमते थे, तेरी गलियों से गुज़रे तो ख़्याल आया । किसी जमाने में ये जगह हम लोगो से गुलज़ार रहती थी । हर हाउस के सामने चूना और गेरूए से पुती अधधंसी ईटो से मेढ़ बनाकर करीने से किया गया पौधरोपड़ की जगह आज चारो तरफ बड़े-बड़े घास फूंस, जंगल ने ले लिया था । जगह-जगह से उजड़ती दीवारें, खिड़कियों से झांकती अंधेरे के साए । मैं नीलगिरी की सीढ़ियों से दुमंजिले पर जा पहुँचा । सिंटेक्स को रखने के लिए बनाया गया लोहे के मोटे चद्दर के चबूतरे पर बैठकर, पानी की ऊँची काली टंकी, मेस, स्टाॅफ कालोनी की तरफ देखने लगा कि शायद इस जगह से गुजरा कोई लम्हा वापस मेरे हाथों मे आ जाए । लेकिन ऐसा नही हुआ, मैं वहाँ से उठकर छत के कोने पर आ खड़ा हुआ जहाँ से ग्राउंड, क्लास बिल्डिंग और गर्ल्स हाॅस्टल साफ दिखाई देते थे । वहाँ खड़े होकर ऐसा महसूस हुआ जैसे गौधूलि का समय है, गेम टाइम अभी-अभी खत्म हुआ हो और ग्राउंड से बच्चे अपने अपने आशियानें की तरफ लौट रहे हो । तभी आसमान से चिड़ियों का एक बहुत बड़ा झुंड मेरे सर के ऊपर से पश्चिम में गुज़र गया । ये देखकर मुझे याद आया कि मुझे भी अब जाना है । मैं आज यहाँ एक दिन का मेहमान बनकर आया हूँ । हकीम साब का फोन आया कि कहाँ हो ? अकेले में जितनी यादें हो सकती थी मैंने दोनो हाथों से बटोर ली लेकिन ऐसी कोई जेब ही नही बनी जिनमें जीवन की छोटी बड़ी सभी यादों को एक साथ भरा जा सके । मेरे स्कूल के किस्सों के लिए कम से कम एक किताब जितनी बड़ी जेब तो होनी ही चाहिए । उस सुखद दिन का अंत उदासी भरी शाम से होता दिखाई पड़ा । हम गाड़ी में बैठे, कुछ सीनियर बच्चे हमे विदाई देने आए और एक दूसरे से जल्द दुबारा मिलने का वादा करके हम वापस अपने आशियाने की तरफ जा उड़े । गाड़ी सड़को पर सरपट दौड़ी जा रही थी तभी परवेज भाई ने रेडियो ऑन किया और किशोर दा की मखमली आवाज कानों में घुलने लगी 'यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे, सपनों की शहनाई बीते दिनों को पुकारे'। हम सभी अपने अपने बचपन के दिनों की गलियों में भागते हुए कहीं खो से गये ।

Thursday, July 22, 2021

संस्कृति के विनाश में भाषा की भूमिका

प्रसिद्ध अश्वेत अमेरिकी उपन्यासकार टोनी माॅरिसन भाषा के संदर्भ में एक कहानी कहतीं हैं । कहानी का सार ये है कि एक समय किसी अमेरिकी शहर के बाहर एक बूढ़ी महिला रहती थी । वो महिला आँखों से लाचार और किसी गुलाम की बेटी थी । महिला अपने घर में अकेली रहती थी । महिला बहुत ज्ञानी थी और लोगो को उसकी विद्वता पर कोई संदेह नही था । एक दिन कुछ युवा उस बूढ़ी महिला का मखौल उड़ाने के लिए उसके घर आते हैं । उनमें से एक लड़के ने उस महिला से पूछा कि उसके हाथ में एक चिड़िया है, वो चिड़िया जिंदा है या मरी हुई है ?
चूँकि वो महिला देख नही सकती थी, इसलिए चुप रही । इसपर लड़के हँस पड़े । आखिरकार उस महिला ने जवाब दिया 'मैं ये तो नही जानती कि जो चिड़िया आपके हाथ में है वो जीवित है या मृत किंतु मैं इतना जरूर जानती हूँ कि उसका जीना-मरना जरूर आपके हाथ में है । महिला के जवाब का अर्थ यह था कि अगर चिड़िया मरी हुई है तो या तो वो पहले से मरी थी या फिर उन लड़कों ने उसे मारा था । और अगर चिड़िया जीवित है, तो वो उसे मार सकते हैं । टोनी माॅरिसन उस चिड़िया को भाषा के रूप में देखतीं हैं और वृद्ध महिला को लेखिका के रूप में । उस महिला की चिंता यह थी कि जिस भाषा के बारे में वो सोच रही है उसका अस्तित्व कुछ ऐसे लोगो के हाथ में है जो उसे इस्तेमाल या मजे करने की वस्तु बना देना चाहते हैं । उन युवाओं को चिड़िया रूपी भाषा की कोई चिंता नही थी । ऐसे हास्य और मनोविनोद के तहत भाषा की हत्या हो सकती है । आज के दौर में भाषा की जिम्मेदारी उन लोगो के हाथ में है जो भाषा के सही प्रयोग को लेकर एकदम नाॅनसीरियस हैं । किसी भी भाषा के नष्ट होने के लिए उस भाषा को बोलने वाला ही जिम्मेदार होता है । सिन्धु घाटी लिपि और ब्राह्मी लिपि के विलुप्त होने के लिए भी वही लोग जिम्मेदार थे जो उस भाषा और लिपि का इस्तेमाल करते थे । अमेरिकी महाद्वीप में उपनिवेशवादी ताकतों के घुसने के बाद अमेरिका के मूल निवासियों का बुरी तरह सफाया किया गया । आज आप इंका, माया और एज़टेक सभ्यताओं की इमारतों को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दे दें लेकिन खुला सच ये भी है प्राचीन अमेरिका के मूल निवासियों की संस्कृति की हत्या का इल्ज़ाम भी उनपर ही है जो आज उन्हे संरक्षित करने की बात कह रहे हैं । यूरोपीय घुसपैठियों ने संवाद के लिहाज से बस इतना ही प्रयास किया कि मूलनिवासियों की भाषा में उन्हें गुलाम बनाए जाने और हुक्म बजाए जाने भर तक ही प्रोत्साहन दिया गया । अंग्रेजी, पुर्तगाली, फ्रेंच और स्पेनिश जैसी यूरोपीय भाषाओं ने उनकी संस्कृति और उनकी भाषा को इस कदर नष्ट किया कि आज सम्पूर्ण अमेरिकी महाद्वीपों पर (उत्तर और दक्षिणी) पर अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली और स्पेनिश भाषाओं का ही बोलबाला है । चाहे वो ब्राजील हो, इक्वाडोर हो, अर्जेंटीना हो, बोलीविया हो हर जगह प्राचीन अमेरिकी भाषाओं की जगह यूरोपीय भाषाओं ने ले लिया है । यूएसए (यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका) का तो पूछना ही नही । जिस देश, महाद्वीप का नामकरण ही यूरोपीय खोजकर्ता 'अमेरिगो वेस्पूची'  के नाम पर हुआ हो उस धरती की खुद की संस्कृति का कितना ख्याल रखा गया होगा, आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं । आज इतिहास के विद्यार्थियों के अलावा ज्यादातर युवाओं को मालूम ही नही कि वर्तमान अमेरिका में ब्रिटिश मूल के लोग ही बहुसंख्यक हैं और मूल अमेरिकी अल्पसंख्यक ।
यही वजह है कि फिल्म की दुनिया के सबसे बड़े अवार्ड एकेडमी अवार्ड में ब्रिटेन की इंग्लिश फिल्में यूएसए की कैटेगरी में ही नामांकन करती है । स्लमडाॅग मिलेनियर, लाइफ ऑफ पाई, गाँधी (1892) कुछ ऐसी ही ब्रिटिश फिल्में थी जिन्हें यूएसए की कैटेगरी में अवाॅर्ड मिला था । खैर, अमेरिकी महाद्वीप का जो हाल रहा है, ठीक यही हाल ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का रहा है । आस्ट्रेलियाई द्वीप पपुआ न्यूगिनी और आस्ट्रेलिया के लोगों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर आपको ये बात स्पष्ट हो जाएगी ।
इसी तरह ब्रिटिश भारत में ऐसे तमाम ट्राइब्स समुदाय को साफ़ कर दिया गया जो अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए । पिंडारी, ठग कुछ ऐसी ही जातियाँ थी । अपनी जन्म-भूमि और कर्मभूमि को दमनकारी, शोषक आक्रमणकारियों से बचाते-बचाते दुनिया भर के तमाम मूलनिवासी अपनी संस्कृति को खो दिए और खुद भी नष्ट हो गये । बचे हुए इन मूल निवासियों को अपनी संस्कृति और भाषा बचाने के लिए बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी उन मूलनिवासियों ने जब अपनी भाषा को बचानें के लिए आवाज उठाने की कोशिश की तब उन्हे गोलियाँ खानी पड़ी । उनकी अपनी जुबान में जीवन को निर्देशित करने और प्रेम अभिव्यक्ति के कितनें शब्द, कितने प्रसंग, कितनी जानकारियाँ जिंदा रह सकती थी । लेकिन दुर्भाग्य से दमन, शोषण और लूट की हवस ने एक पूरी जीती जागती संस्कृति को नष्ट करके समूची दुनिया का जो नुकसान किया है उसे कभी भरा नही जा सकता । हम स्पष्ट रूप से देख सके हैं कि किस तरह ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन ने अपनी-अपनी भाषाओं को प्रोत्साहन देने के नाम पर दुनिया भर के विभिन्न भाषाओं का रक्तपात किया है । उसके उलट हिन्दी और चीनी भाषा ने किसी भाषा या बोली को नुकसान पहुचाएँ बिना दुनिया के शीर्ष भाषाओं में अपनी जगह सुनिश्चित की हुई है । भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में
पिछले 60 साल में भारत की क़रीब 20 फीसदी भाषाएं विलुप्त हो गई हैं । 60 साल पहले यानी 1961 की जनगणना के बाद 1652 मातृभाषाओं का पता चला था । उसके बाद ऐसी कोई लिस्ट ही नहीं बनी । उस वक़्त माना गया था कि 1652 नामों में से क़रीब 1100 मातृभाषाएं ही अस्तित्व में थीं क्योंकि कई बार लोग ग़लत सूचनाएं दे देते थे । वडोदरा के भाषा शोध और प्रकाशन केंद्र के सर्वे के मुताबिक यह बात सामने आई है । 1971 में केवल 108 भाषाओं की लिस्ट ही सामने आई थी क्योंकि सरकारी नीतियों के हिसाब से किसी भाषा को लिस्ट में शामिल करने के लिए उसे बोलने वालों की तादाद कम से कम 10 हज़ार होनी चाहिए । इसे भारत सरकार ने कटऑफ़ प्वाइंट स्वीकार किया था । 'पीपुल लिंगुइस्टिक सर्वे' के मुख्य संयोजक गणेश डेवी कहते हैं कि जब उन्होनें सर्वे किया तब उन्हें 1100 में से सिर्फ़ 780 भाषाएं ही देखने को मिलीं । वो मानते थे कि शायद उनसे 50-100 भाषाएं रह गईं हों क्योंकि भारत एक बड़ा देश है और यहां 28 राज्य हैं । उनके पास इतनी ताक़त नहीं थी कि वो पूरे देश को कवर कर सकें । उनके पास सिर्फ़ तीन हज़ार लोग ही थे और उन्होनें चार साल तक काम किया । उन्होनें स्वीकारा कि इस काम के लिए बहुत से लोग चाहिए थे । वो कहते हैं कि हम यह मान भी लें कि हमें 850 भाषाएं मिल गईं हैं तब भी 1100 में से 250 भाषाओं के विलुप्त होने का अनुमान है । भाषाओं का इतिहास लगभग 70 हज़ार साल पुराना है जबकि भाषाएं लिखने का इतिहास सिर्फ़ चार हज़ार साल पुराना ही है । इसलिए ऐसी भाषाओं के लिए यह संस्कृति का बहुत बड़ा नुकसान है । ख़ासकर जो भाषाएं लिखी ही नहीं गईं और जब वो नष्ट होती हैं, तो यह बहुत बड़ा नुकसान होता है । यह सांस्कृतिक नुकसान तो है ही, साथ ही आर्थिक नुकसान भी है । भाषा आर्थिक पूंजी होती है क्योंकि आज की सभी तकनीक भाषा पर आधारित तकनीक हैं । हर संस्कृति का अपना खुद का विज्ञान होता है, विश्व-विज्ञान दुनिया के अलग अलग संस्कृतियों से जरूरत का ज्ञान हासिल करता है, फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलाॅजी, गणित, खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र और साहित्य जैसे ज्ञान के अलग-अलग क्षेत्र अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न रहे हैं । सुमेरियन, बेबीलोनियन, मिस्र, मोसोपोटामिया, चीनी जैसी सभ्यताओं से दुनिया ने कितना कुछ सीखा है ऐसे में किसी संस्कृति की भाषाओं का लुप्त होना एक आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक नुकसान होता है । भारत में जो भाषाएँ लुप्त हुई उसकी खास वजह लोगो का अपने मूल स्थान से पलायन करना है । सिंधु घाटी के लोगो का आर्यों के हमलें या फिर पर्यावरणीय बदलाव की वजह से प्रायद्वीप के आंतरिक हिस्सों में पलायन हुआ और आर्यों की भाषा संस्कृत का प्रसार भी स्थानीय भाषा के लिए नुकसानदायक साबित हुआ । वर्तमान समय में जंगलों को साफ़ करके आदिवासियों को शहरों की तरफ विस्थापित करना भी एक बड़ी वजह है उनके मूल भाषा के विलुप्त होने में । ऐसे ही तटीय इलाक़ों के लोग 'सी फ़ार्मिंग' की तकनीक में बदलाव आने से शहरों की तरफ़ चले गए. उनकी भाषाएं भी विलुप्त हुईं । दूसरे जो डीनोटिफ़ाइड कैटेगरी है, यानि कि बंजारा समुदाय के लोग, जिन्हें 'अनसिविलाइज्ड' माना जाता था । वे अब शहरों में जाकर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहे हैं । आपने भी सड़कों पर अज़ीब से कपड़े पहने, भीख़ मांगते, या फुटपाथ पर फेरी लगाकर कुछ सामान बेचतें लोगो को जरूर देखा होगा जिसकी हिन्दी भी थोड़ी अटपटी मालूम पड़ती है जैसे हिन्दी में किसी और भाषा का टोन मिलाकर बोल रहे हों, कभी सोचिएगा ये कौन लोग हैं, कहाँ से आएँ हैं ? इस सवाल का जवाब खोजनें में आपको भाषा और संस्कृति संबंधी बहुत से तथ्य जानने को मिलेंगे । ऐसे कुल 190 से ज्यादा समुदाय हैं, जिनकी भाषाएं बड़े पैमाने पर लुप्त हो गईं हैं । हर भाषा का अपना एक 'इकोलाॅजी होता है । और जब कोई एक भाषा लुप्त होती है, तो उसे बोलने वाले पूरे समूह का ज्ञान नष्ट हो जाता है । जो एक बहुत बड़ा नुकसान होता है, क्योंकि भाषा ही वो माध्यम है जिससे लोग अपनी परंपरा और संस्कृति को जिंदा रखते हैं । अंडमान निकोबार द्वीप समूह का एक छोटा सा आईलैंड 'सैंटियागो' अब तक बाकी दुनिया से अछूता रहा है । भारत सरकार ने उनसे संपर्क पर प्रतिबंध लगा रखा है । भविष्य में यदि कभी उनसे संपर्क होता है, उनकी भाषा और संस्कृति को समझने का मौका मिलता है तो संभव है भारत की प्राचीन सभ्यता को भी समझने के रास्ते खुल सकें क्योंकि हाल ही में हुए सिंधु घाटी की महिला नर-कंकाल के डीएनए रिसर्च से ये पुष्टि हुई है, कि भारत के प्राचीन अनार्य लोगो का डीएनए दक्षिण भारत और अंडमान निकोबार के निवासियों की डीएनए संरचना एक दूसरे से काफी करीब है ।
इस बात की प्रबल संभावना है, कि यदि उन्होंने अपने परंपरागत संस्कृतियों को बचा सकने में कामयाबी हासिल की है, तो भारत के इतिहास में दफ़्न हो चुके उस गौरव को प्रकाश में लाया जा सकता है जो हमारे लिए आज भी अनसुलझी पहेली बनी हुई है । हमनें ये भी देखा कि किस तरह दमनकारी भाषाएँ किसी स्थानीय भाषाओं की हत्या करती हैं, जरूरी नही ये हत्यारी भाषाएँ हर बार आक्रमणकारी के रूप में ही आए । कभी कभी भाषाएँ धर्म का लिबास पहन कर, तो कभी राष्ट्रवाद का मुखौटा लगाकर भी आतीं हैं, तो कभी फासीवाद और नस्लवाद के रूप में । वक्त रहते हमें भाषाओं को लेकर सह-अस्तित्व का नज़रिया अपना लेना चाहिए अन्यथा अनगढ़ या बची हुई पुरानी भाषा का लुप्त हो जाना तय है, जो भारत की विविधता के लिए अच्छा नही है । और मैंने पहले भी कहा है कि जब कोई भाषा विलुप्त होती है तो सिर्फ भाषा विलुप्त नही होती बल्कि पूरी संस्कृति विलुप्त होती है ।

Thursday, June 24, 2021

विद्रोह के फूल: अदम और विद्रोही

कभी-कभी किसी को याद करना अतीत के उन गलियों में दौड़ जाना होता है जहाँ वक्त ठहरा हुआ होता है, किसी टेप-रिकाॅर्डर की तरह बार-बार उसी अंतरे को सुनना जो दिल के करीब आती महसूस होती है । यादें संगीत की तरह ही होती हैं और संस्मरण टेप-रिकाॅर्डर की तरह । इसीलिए मैं मानता हूँ अच्छी यादों का लिखा जाना जरूरी है । न वक्त एक सा रहता है, न लोग एक से रहते हैं । हर चीज़ परिवर्तनकारी है सिर्फ याद ऐसी चीज़ है जो अपरिवर्तनशील है । जब तक टाइम मशीन की खोज़ नही होती फिलहाल तब तक के लिए तो हम ऐसा ही मानेंगे । इसलिए यादों को सहेजे जानी की सख्त़ जरूरत है । कोई घटना, कोई तारीख़, कोई वस्तु या किसी व्यक्ति से जुड़ी लाइफ की टर्निंग प्वाइंट की हमारे पास ऐसी बहुत सी यादें होती है जिसे हम ताउम्र नही भुलाना चाहते । कहते हैं कि आदमी मर जाता है विचार नही मरता लेकिन मैं मानता हूँ कि विचार को सहेजा न जाए तो विचार मरते भी हैं । यही वजह है कि मैं विचार-लेखन को तवज्जो देता हूँ बजाय विचार सुनाने के । लिखने की इसी कड़ी में आज मैं बात करने वाला हूँ ऐसे व्यक्तित्व के बारे में जिन्होंने वैचारिकता और साहित्य के प्रति मेरे रूझान को प्रोत्साहित किया । और वो व्यक्तित्व हैं जनकवि अदम गोण्डवी  और रमाशंकर यादव 'विद्रोही' । बात स्कूल के दिनों की है जब मैं बचपन के दिन छोड़कर किशोरावस्था में कदम रख रहा था । शरीर में हार्मोनल बदलाव हो रहे थे, और बदन में एक अजीब सी बिजली कौंधनी शुरू हुई थी । एक अलग सी ताजगी, नया-नया जोश और बहुत कुछ सीख लेने की हवस रगों में दौड़ रही थी । वे दिन मेरे बोर्डिंग के दिन थे । आसमान का उन्मुक्त पंक्षी, जैसे सभी सीमाओं को दरकिनार कर बस उड़ता जाता है और आसमान की असीम क्षितिज पर गोते लगाता रहता है, उन दिनों मुझे भी ऐसा ही महसूस हो रहा था । लेकिन ऐसा भी नही कि ये हमेशा से था । उस स्कूल में मेरा लेट एडमिशन हुआ था इसलिए मुझमें इक इनसिक्योरिटी वाली भावना पनप रही थी कि मेरे क्लास के बाकी बच्चे दो महीने आगे चल रहे हैं मुझसे । बाल-मन बहुत सेंसटिव होते भी हैं । धीरे-धीरे दिन गुजरे, मैं एडजस्ट करने की कोशिश कर रहा था । नये दोस्त, घर से बाहर का माहौल, बड़ा सा प्ले-ग्राउंड, मेस का खाना और काली, ऊँची पानी की टंकी ये सब कुछ मेरे लिए नया नया अनुभव था । एक तरफ घर से बाहर आकर दुनिया देखने की खुशी तो दूसरी तरफ घर को याद करने का ग़म । दो विरोधी विचार आपस में परस्पर द्वंद कर रहे थे । इस तरह का अंतर्द्वंद भी मैंने पहली बार महसूस किया । मैं आजतक इस निष्कर्ष पर नही पहुँच सका कि उस अंतर्द्वद में कौन सा पक्ष ज्यादा मजबूत था । मैं 'खुश' ज्यादा था या 'दुखी' ज्यादा था । एक्साइटमेंट और यादें इस तरह आपस में उलझी थी कि उन्हें सुलझाने से बेहतर छोड़ देना ही मुझे मुफीद लगा । मैं वापस तीन साल आगे आता हूँ । जहाँ मुझमें वो चुपचाप सा रहने वाला बच्चा कहीं खो गया था । अब मैं सवाल पूछता था पढ़ता था, कल्चरर प्रोग्राम में भाषण देता था । इंटर-स्कूल लेवल पर कलस्टर और रीजनल जूडो भी खेल चुका था । कुल मिलाकर मुझमें बहुत से बदलाव आ गये थे लेकिन ये बदलाव प्राकृतिक और वातावरणीय बदलाव का असर था । असली बदलाव या यूँ कहें की मनोवृत्ति का विकास होना अभी बाकी था । अगस्त खत्म हो चुका था और सितंबर लग चुका था । प्रचंड गरमी और लौटते मानसून की बारिश की धार अब ढलान पर थी । मधु-मालती और शिउली की महक पूरे वातावरण में फैल रही थी । मौसम अब गुलाबी हो रहा था । हिन्दी भाषा को प्रोत्साहन देने के लिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है । हिन्दी के लिए महज एक दिन मुकर्रर करना विद्वानों को रास नही आया इसलिए हिन्दी के लिए सितंबर के पहले दो हफ्ते 'हिन्दी पखवाड़ा' नाम से मनाया जाने गया ताकि हिन्दी पर विधिवत् मंथन हो और पखवाड़े का आखिरी दिन यानी 14 नवंबर को हिन्दी दिवस रखा गया । हमारे स्कूल में भी हिन्दी को प्रोत्साहन देने के लिए हिन्दी पखवाड़ा का आयोजन किया गया था । बहुत कुछ मेरे लिए नया था । भारत की विविधता को भी समझने का मौका मुझे अपने स्कूल के दिनों में ही मिला । स्कूल में त्रिपुरा के बच्चे माइग्रेशन से एक साल के लिए पढ़ने आते थे, उनकी भाषा जो शुद्धतम बांग्ला भी नही थी उससे मुझे भाषाई विविधता के बारे में काफी कुछ सीखने को मिला । खैर, मैं हिन्दी दिवस पर था और मेरे स्कूल में हिन्दी पखवाड़े का आयोजन चल रहा था । पद्मश्री 'बेकल उत्साही' का दौरा हो चुका था । और उनसे हिन्दी के बारे में काफी कुछ सीखने को मिला । अगले दिन जनकवि 'अदम गोण्डवी' का दौरा था । अदम जी को मैं बचपन से जानता था, मैं उनकी गोद में खेला था । वो अक्सर घर आते, चाय पीते और पिताजी से घंटो बातें करते थे । मुझे जरा भी अंदाजा नही था कि ये खिचड़ी हो चुके बालों वाला आदमी क्या तोप आदमी हैं । अरे भाई ! कविता ही तो करते हैं ! तो ? कविता भी कोई कर ले, इसमें क्या है ? हम भी तो कविता करते हैं । फिर इस सफ़ेद कुरते वाले बुजुर्ग की कविताओं में ऐसा क्या है ?
मैंने अदम को बहुत सुना था । उनकी बातें, उनकी कविताएँ । जिनमें ज्यादातर मेरी समझ से परे थी । उनकी कविताएँ जातिवाद, समाजवाद और सामंतवाद जैसे भारी भरकम हथितारों से लैस होती थी । एक किशोरवय बच्चे से क्या ही उम्मीद की जाए कि वो इन शब्दों का मतलब भी समझेगा । अदम का व्याख्यान खत्म हुआ तो मैंने सीनियरों के मुँह से अदम की तारीफ सुनी । फिर शाम हुई और अदम को रात हमारे स्कूल में ही रुकना था । रीमीडियल क्लास खत्म हुई थी और हम हाॅस्टल पहुँचे थे । गेम टाइम शुरू होने को था । गेम टाइम हमारा पर्सनल टाइम होता था । गेम टाइम मुझे बहुत पसंद था । इसलिए नही कि मैं स्पोर्ट पर्सन था बल्कि इसलिए कि उस वक्त मैं ग्राउंड में बैठकर नेचर को भी देखता था, लोगो को खेलते हुए, हँसते हुए देखता था । ये वक्त दिमाग के घोड़ों का बेलगाम दौड़ाने का होता था । उस दिन मैं रीमीडियल क्लास से लौटने के बाद कपड़े बदल रहा था इतने में एक जूनियर मेरे कमरे में दाखिल हुआ और बोलने लगा कि भैया प्रिंसिपल सर ने बुलाया है आपको । अभी । उस वक्त प्रिंसिपल के घर से बुलावा आने का मतलब गाज़ गिरना होता था । पिछले तीन-चार दिनों की सारी हरकतें आँखों के सामने आकर घुटनों तक लहंगा चढ़ाए 'छैया-छैया' नाचने लगी । कहीं ऐसा तो नही कि किसी जूनियर ने शिकायत कर दी हो, या फिर बाउंड्री फांदते वक्त किसी स्टाफ ने देख लिया हो । मेस स्टाफ हो सकता है क्या ? 'नही यार मैंने तो डबलिंग भी नही मारी' ये गाँव वाले तो नही पहचान लिए किस बात के लिए ? उसके बाग में घुसकर अमरूद तोड़े थे । अरे तो उसको नाम थोड़े मालूम था । किसी ने बता दिया हो तो ? किसी ने सिगरेट फूंकते देखा था क्या ? उधर जंगल में जाता ही कौन है ? इस तरह के तमाम सवाल मन में उठ रहे थे और जवाब भी मन खुद ही दे रहा था । ये समझ आया कि गलत तो कुछ नही हुआ है लेकिन फिर भी दिल एक अनजाने डर के साए में सिहरता जा रहा था । भारी मन और दबे पाँव मैं 'प्राचार्य आवास' पहुँचा । हल्के गुलाबी रंग से पुते प्राचार्य आवास का वास्तु स्कूल के बाकी इमारतों से अलग था । स्कूल के गेट नं एक में घुसते ही गेस्ट हाउस के ठीक सामने एक-मंजिला इमारत जिसके बगल में मल्टी-पर्पस स्कूल की मिनी बस परमानेंट खड़ी रहती थी । आवास के ठीक सामने अहाते में बड़ा सा बगीचा था जहाँ तरह-तरह के फूल लगे होते थे । और उस बगीचे की नर्म, हरी घास पर एक टेबल और दो तीन कुर्सियाँ हमेशा पड़ी रहती थी । मैं अपने साथ दो विश्वसनीय दोस्तों को भी साथ लाया था जो मुश्किल हालातों में मेरी तरफ से दलीलें रख सकें । हाॅस्टल के दिनों में ये ट्रिक बहुत पापुलर हुआ करती थी । बहरहाल जब मैं प्राचार्य आवास पहुँचा तो बाहर बगीचे में प्रिंसिपल और अदम जी बैठे हुए थे । हाल ही में पुराने प्रिंसिपल का ट्रांसफर हुआ था और उनकी जगह नये प्रिंसिपल आए थे । वो नये प्रिसिंपल चेहरे पे हमेशा बारह बजाए रहते थे । न हँसना, न बच्चो से ज्यादा बात करना । उनमें अज़ब ही मनहूसियत छाई रहती थी जबकि इसके उलट पुराने प्रिंसीपल बच्चो से संवाद करते थे, मजाक करते थे और एक पाॅजिटिव एनर्जी लेके चलते थे । उस वक्त तक हम मानते थे कि साइंस पढ़ने वाला इंसान ऐसे ही बोरिंग सा हो जाता है । और नये प्रिंसीपल ने इस मिथक पर 'सच' का ठप्पा लगा दिया था । एक साहित्यकार और एक वैज्ञानिक साथ बैठकर क्या बात करते होंगे ये हमारे हाॅस्टल में देर रात वाली विमर्श का टाॅपिक बना । मुझे देखकर अदम जी के चेहरे पर मुस्कुराहाट की एक लम्बी सी लकीर खिंच गयी । मैंने उनके पैर छुए तो उन्होंने कहा कि 'बेटा मैं बार-बार सोच रहा था कि सेन साहब का बेटा इसी स्कूल में पढ़ता है लेकिन ऑफिशियल नाम नही याद आ रहा था'। फिर वो प्रिंसिपल की तरफ मुड़े और उनसे कहने लगे कि प्राचार्य जी ! ये लड़का बहुत होशियार और होनहार है इसपर खास ध्यान दीजिएगा । मैंने मन में सोचा ऐसा आदमी ध्यान न ही दे तो बेहतर है क्योंकि पिछले ही दिनों प्रिंसिपल ने मुझे हाॅस्टल में 'इल्लीगल' हीटर जलाते पकड़ा था । ये तो अच्छा हुआ कि प्राचार्य महोदय ने मेरी होशियारी के किस्से अदम जी को नही बताए । गोधूलि का वक्त हो चला था और मुझे प्राचार्य आवास में खड़ा देखकर ग्राउंड में खेलते मेरे कुछ दोस्त भी इधर ही दौड़े चले आए । इस दौरान अदम जी ने बहुत पते की बात कही । एक सवाल पर उन्होनें कहा कि आप जितना पढ़ते हो उतना ही ज्यादा लिखने की इंस्पीरेशन भी आपको मिलती है । जब आप किसी पहलू को बहुत गहराई से जानने की कोशिश करते हैं तो इस सफ़र में चाहे-अनचाहे आपका राब़ता उन चीज़ों से भी हो ही जाता है जिनसे आप अब तक अनजान थे ।
उस दौरान बहुत सी बातें हुई फिर शाम की रीमेडियल क्लास के लिए जाना था इसलिए प्रिंसीपल ने हम लोगो को जाने को कहा । हाॅस्टल पहुँचते-पहुँचते ये बात लोगों में फैल गयी कि अदम गोण्डवी मेरे परिचित हैं । इस बात का बाल-मन पर एक अलग ही इम्पैक्ट पड़ता है, जैसे किसी सेलेब्रिटी का परिचित होने पर आस-पास के लोगो में इज्जत बढ़ जाती है,  उस दिन मुझे वैसा ही महसूस हुआ । लेकिन इस घटना ने मुझे हिन्दी साहित्य की तरफ अग्रसर करने के लिए बहुत प्रोत्साहित किया । ये उसी प्रोत्साहन का नतीजा था कि उस साल मैंने गीता, मारियो पूजो कृत गाॅडफादर, मालगुड़ी डेज़, गोदान, गब़न, मानसरोवर, गीतांजलि,विष-कन्या  जैसी बहुत सी किताबें पढ़ डाली । सच कहूँ तो वो ऐसा वक्त था जहाँ मैंने अपनी हैसियत से ज्यादा किताबें पढ़ ली थी जिनमें से बहुतों के अर्थ ही नही समझ आते थे । उस वक्त 'सरस-सलिल' जैसी वयस्क पत्रिकाएँ भी छुप-छुप कर पढ़ी । आज सोचता हूँ कि उन दिनों सचमुच मैं वक्त से आगे था । कुल मिलाकर मैं ये कह सकता हूँ कि अदम के प्रोत्साहन का ही नतीजा था कि मैंने अपनी सिलेबस से बाहर के साहित्य का रसास्वदन किया । ये भी सच है कि सार्थक कविताएँ लिखने का शौक भी मुझे अदम की कविताएँ सुनकर चढ़ा । वो मुलाकात शायद अदम से मेरी आखिरी मुलाकत थी । उसके बाद मैं उनसे कभी नही मिला । साल 2011 में जब उनके देहावसान की खबर सुनी तो मुझे धक्का सा लगा । ये कसक दिल में उठने लगी कि उनसे अभी बहुत कुछ सीखना था । उनके गुजरने के कुछ साल बाद मैं उनके घर गया । मुझे ताज्जुब हुआ जो इंसान जीते जी ईश्वरीय सत्ता को नकार चुका था आज उसकी तस्वीर देवी-देवताओं के साथ लगा दी गयी थी । मैंने और गहराई से जब उन्हें समझने की कोशिश की तो मालूम चला कि जिस सामंतवाद का जिक्र उन्होनें अपनी कविता 'चमारो की गली'  में किया था अंततः उसी सांमती सोच के लोगो ने उनका चरित्र हनन किया । नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि वो उस दौरान तात्कालीन विधायक का ड्राइवर हुआ करता था और एक दिन अदम उस विधायक के घर पर स्पेशल गेस्ट थे । दो पैग लगाने के बाद उस विधायक ने अदम जी से कुछ नगमें छेड़ देने की इल्तज़ा की । शराब अदम की कमजोरी थी इसी का हवाला देकर उनके पाटीदारों ने जम कर उनका चरित्र हनन किया । बहरहाल विधायक के आग्रह पर अदम कुछ देर शांत रहें और टेबल पर रखी काजू की प्लेट से काजू उठाते हुए कहा । काजू भुने प्लेट में व्हिस्की भरी गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में, पक्के समाजवादी हैं तस्कर हो या डकैत कितना असर है खादी के उजले लिबास में । बाद में ये अदम की प्रतिनिधि कविता बनी । जिसने उन्हें समूचे हिन्दी भाषी बेल्ट में मशहूर किया । दमन के दौर में वो जनवादी कवि जब उंगलियाँ उठाकर जनता के साथ खड़े होने का ऐलान करता तो जनता भी उनके साथ खड़ी होती दिखती थी । अदम का आज न होना भले ही अखरता हो लेकिन उनकी कविताएँ जब भी सुनाई जाती है अदम जी उठते हैं । ग्रेजुएशन के दिनों में अदम की किताब 'धरती की सतह पर' और 'समय से मुठभेड़'  पढ़ी । बल्ली सिंह चीमा अपनी कविता में पूछते हैं- 'तय करो किस ओर हो तुम आदमी हो या आदमखोर हो तुम' आदमी का पक्ष मैंने अदम की कविताएँ पढ़कर ही चुना था । यूँ तो साहित्य से मेरा जुड़ाव बहुत पहले हो चुका था लेकिन कविताओं और लेखों में विद्रोह का स्वर दिल्ली में एक दिलचस्प शख्सियत से मुलाकात के बाद आया । साथ ही 'विद्रोही' तख़ल्लुस भी उसी दौरान अपनाया । बात 2013 की है, किशोरावस्था से जवानी की दहलीज़ पर जिंदगी आ खड़ी थी । लखनऊ से विद्यार्थियों का एक समूह किसी कन्वेंशन के सिलसिले में जेएनयू आया था । मैं भी उसी समूह का हिस्सा था । कन्वेंशन सेंटर के बाहर मैं खड़ा चाय पी रहा था तभी एक मैले-कुचैले, सिलवटों में लहराते कुर्ते में एक बुजुर्ग बाहर घूमते दिखाई दिए । चूँकि जेएनयू में ये मेरा पहला विजिट था । चारो तरफ़ युवा चेहरे ही दिखाई दे रहा थे । उन युवाओं के बीच एक बुजुर्ग को इस तरह दिखना मेरे मन में कौतूहल पैदा कर रहा था कि जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के छात्र-युवा कंवेन्शन में ये बूढ़ा आदमी कौन है ? जो न प्रोफेसर है, न वक्ता है न ही कोई वर्कर । तभी मेरे साथियों ने मुझे अंदर चलने को कहा । मैं अंदर जाकर बैठा था कि पीछे से वो बुजुर्ग भी अंदर आते दिखाई दिए । उनके अंदर आते ही हाल में सरगर्मिया बढ़ सी गयी । इसे देखकर मेरे मन में कौतूहल और ज्यादा बढ़ गया । मैंने अपने पास बैठे लड़के के पूछा 'कौन हैं ये महाशय' तो उनसे दो टूक जवाब दिया कि 'भाई !मैं भी पहली बार ही आया हूँ' । आखिरकार मेरी जिज्ञासा तब शांत हुई जब उस बुजुर्ग को मंच पर ससम्मान आमंत्रित किया गया । और वो बुजुर्ग थे रमाशंकर यादव 'विद्रोही' विद्रोही जी ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया जिनमें, 'आसमान में धान', 'मोहनजोदड़ो के मुहाने पर' और 'अपना हक छोड़ दो'  कविताएँ प्रमुख रही । महफिल में एक गज़ब सी गर्माहट दौड़ उठी । लेकिन उन कविताओं ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया । उस दिन शाम को मैं 'गंगा-ढाबा' पर विद्रोही जी से मिला, उनसे फाॅर्मल बातें की । उसके बाद जब कभी भी जेएनयू जाना होता विद्रोही जी से मुलाकात जरूर होती थी ।
एक बार जेएनयूएसयू बिल्डिंग में मैंने उनसे पूछा था कि सिस्टम के लिए इतना आक्रोश आप कहाँ से लाते हैं ? तो उन्होंने कहा था कि जब आप सच को सच की निगाह से देखते हैं, और सच के लिए सच बोलने का माद्दा रखने लगते हैं तो आप विद्रोही हो ही जाते हैं । आप भी तो विद्रोही हैं, ये आप कैसे कह सकते हैं विद्रोही जी ? तुम विद्रोही न होते तो तुम मुझसे इस विषय पर बात नही कर रहे होते, तुम हो विद्रोही । उस दिन उन्होंने एक शब्द इस्तेमाल किया था 'फैमिलियर' हाँ यही शब्द था । उन्होनें कहा था कि तुम लोगो से बातें करना अच्छा लगता हैं । युवाओं से बात करने से उम्र खुद पर हावी नही होती । साल 2015 का दिसंबर महीना था, कड़ाके की सर्दी । और दिल्ली की सर्दी तो वैसे भी मशहूर है । दिल्ली में देश भर के छात्र यूजीसी के फेलोशिप हटा लेने के मुद्दे को लेकर कड़कड़ाती ठंड में सड़कों पर थे । कुछ मित्रों का फोन आया कि दिल्ली चलना है । 8 तारीख की सुबह मैं दिल्ली पहुँचा । आंदोलन में पहुँचते ही मालूम चला कि विद्रोही जी की तबीयत ज्यादा खराब है कुछ लोग उन्हें हास्पिटल लेकर गये हैं । शाम तक खब़र मिली कि विद्रोही जी नही रहे । आंदोलन का चेहरा उतर गया । आधे लोग आंदोलन में और आधे विद्रोही जी के साथ । अगले दिन उनकी शव यात्रा जेएनयू से निकलने वाली थी और अंतिम दर्शन के लिए उनके शव को जेएनयूएसयू की बिल्डिंग के बाहर रखा गया था । अगली सुबह जब मैं जेएनयूएसयू बिल्डिंग पहुँचा तो वहाँ बहुत भीड़ थी और विद्रोही जी की याद में नारे लगाए जा रहे थे । पैरलल सिनेमा के अग्रणी विश्लेषक और 'प्रतिरोध का सिनेमा' के फाउंडर संजय जोशी उन भावुक लम्हों को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे । लोग पुष्प॔जलि अर्पित कर रहे थे । मैं वही थोड़ी दूर पर जमीन पर बैठ गया । तभी इलाहाबाद यूनिवर्सटी का वरिष्ठ छात्रनेता अंतस मेरे पास आया और बोला कि जाओ पुष्पांजलि अर्पित कर दो, मन हल्का हो जाएगा और यकीन होगा कि विद्रोही जी नही हैं । मैंने उससे कहा कि 'नही ! मैं ये नही यकीन कर सकता कि वो हमारे बीच नही हैं, वो अब भी जिंदा है, वो तब तक जिंदा रहेंगे जब तक आसमान में धान नही बोया जाता (उनकी कविता आसमान में धान से) । अंतस भी मेरे कंधे पर हाथ रखकर वहीं बैठ गया । हम दोनो की आँखें नम थी । आंदोलन में जीने वाला इंसान आखिर आंदोलन में ही मरा । महबूबा के बाहों में मरने से बेहतर मौत और हो ही क्या सकती है ?
विद्रोही जी जब भी मिलते गर्मजोशी से मिलते थे । मैं आज भी विद्रोही जी के हाथों के दाब को महसूस कर सकता हूँ । मैंने 'विद्रोही' तख़ल्लुस को उनसे मिलने के बाद, उनसे प्रभावित होकर रखा था और मेरी कोशिश रहेगी कि विद्रोही जी विचारो को भी आगे लेके जा सकूँ । इस तरह मेरी किशोरावस्था और जवानी के शुरूआती दिनों में दो विद्रोही कवियो का प्रभाव रहा । अदम ने मुझे आम आदमी के करीब होने का एहसास दिलाया तो वहीं विद्रोही ने नारीवाद पर पुरूषों की भूमिका और असमानता, शोषण और दमन के खिलाफ़ प्रखर आवाज़ बुलंद करने का । आमतौर पर लोग विद्रोह का अर्थ विध्वंस समझते हैं लेकिन मैंने कम समय में ये सीख लिया कि विद्रोह का मतलब सिर्फ विध्वंस ही नही बल्कि निर्माण भी होता है । विद्रोह में भी वैसी ही खूबसूरती और नज़ाकत होती है, जैसे किसी खूबसूरत फूल में । ये दोनो विद्रोही देश के ऐसे फूल हैं जो सदियों तक इस मुल्क के गुलशन को गुलजार करते रहेंगे, फिजाओं को महकाते रहेंगे । जब भी अधिकारों के हनन की बात होगी इन दोनो कवियों को याद करना प्रासंगिक होगा । मेरे लिए अदम और विद्रोही मेरे ज़ेहन में हमेशा जिंदा रहेंगे ।

Saturday, June 19, 2021

दर्द के चिलमन से झांकती उम्मीदें: शरणार्थी समस्या

आज के दौर में दुनिया एक भयावह स्थिति से गुजर रही है । अमरीका से लेकर अफ्रीका और एशिया जैसे विशाल महाद्वीप पर एकतरफा शोषण की जो चरम स्थिति बनी हुई हैं उसमें आम जन का एक बहुत बड़ा तबका विस्थापन की स्थिति से गुजर रहा है । धर्म के प्रति धर्म, नस्ल के प्रति नस्ल, विचारधारा के प्रति विचारधारा, संस्कृति के प्रति संस्कृति की जो असिष्णुता विगत शताब्दी से प्रसारित हुई है उसमें न जाने कितने लोगो को बद से बदतर हालातों में जीने को मजबूर होना पड़ रहा है । फिर वो चाहे सीरिया का मसला हो, यमन का मसला हो, तिब्बत का मसला हो, दक्षिणी सूडान का मसला हो, भारत-पाक का मसला हो अफगानिस्तान, सोमालिया या रोहिंग्या मुहलमानों का मसला हो, हर मसले में इंसान की पहचान कहीं से भी इंसान की रह ही नही गयी है । इंसान ही इंसान को विकट से विकट परिस्थियों में धकेल देने पर आमादा है बिना ये सोचे कि जिनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है उनकी रगों में भी वही खून बह रहा है जो हमारी रगों में है । धर्म, नस्ल, सम्प्रदाय, विचारधार और नैतिक मूल्य इंसानी लहू के कहीं ज्यादा बेशकीमती बना दिया गया है । खास तौर से खाए पिए अघाए वाले तबके में सिवाय दौलत के इंसानी मूल्यों की कोई कद्र नही बची है । उनके लिए दौलत दे सकने वाली कोई भी चीज ही इस दुनिया में अपना अस्तित्व बनाए रखने के सबसे अहम है । इंसानों की इसी हवस ने उसके मुँह में इंसानी खून लगा दिया है ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद द्विधुर्वीय दुनिया ने अपने व्यक्तिगत 'इगो'  को संतुष्ट करने, और संसाधनों की लूट के लिए तीसरी दुनिया में भंयकर तबाही मचाई । साथ ही शक्ति संतुलन के नाम पर उन्हें आपस में ही उलझाए रखा । उस आंतरिक 'काॅन्फ्लिक्ट' ने कालातंर में वीभत्स रूप अख़्तियार कर लिया । विश्वयुद्ध के बाद ईरान-इराक, भारत-पाक, कोरिया, वियतनाम में हम इसे बखूबी देख-समझ सकते हैं, कि किस तरह भाई-भाई ही आपस में दुश्मन बन गये और जमकर खून की होली खेली गयी । पूर्व मध्य एशिया और अफ्रीका में इसी नफ़रती माहौल में लोग पलायन करने को मज़बूर हैं । 2015 में सीरिया के गृहयुद्ध और आईएसआइएस के साथ संघर्ष में अपना सब कुछ गँवा चुके एक कुर्द परिवार के दो वर्षीय बच्चे एलन कुर्दी की समंदर में डूब कर मृत्यु हो गयी थी । उसका परिवार उसके बेहतर भविष्य की तलाश में ग्रीस जा रहा था । एलन कुर्दी के डेड बाॅडी की तस्वीरें पूरी दुनिया में वायरल हुई । समंदर किनारे रेत में औंधे मुँह लाल टी-शर्ट में ढका वो मरा हुआ बच्चा शरणार्थी समस्या का प्रतिनिधित्व करता हुआ दिखाई दिया । एक सवाल था जो पूरी दुनिया के सोचने-समझने वाले इंसानों को झकझोर रहा था कि एलन कुर्दी की मौत का जिम्मेदार कौन है ?
ऐसे ही सीरिया की एक शरणार्थी बुजुर्ग महिला इम आदिल कहतीं हैं कि 'एक बूढ़ी दादी के लिए इससे बुरा क्या होगा कि जहाँ मुझे अपने नाती-पोतों के बीच होना चाहिए था, मेरा घर ध्वस्त हो चुका है, परिवार बिखर चुका है । मेरे पास अब कुछ नही बचा सिवाय लुट जाने का ग़म और दर्द से भरे दिल के' ये बात इम ने यूनएनएचसीआर के कार्यकर्ताओं से कही थी ।
पिछले साल 30 दिसंबर 2020 यमन की नयी सऊदी समर्थित सरकार के मंत्रियों पर अदन में, जो कि यमन की नयी राजधानी बनी है में एक मिसाइल अटैक हुआ जिसकी लाइव रिपोर्टिंग करते हुए न्यूज़ रिपोर्टर अदीब-अल-जेनानी की मौत हो गयी । वहीं इस घटना में यमन के लोक निर्माण विभाग की उपमंत्री यास्मिन-अल-अवाधी की भी दर्दनाक मौत हो गयी । इस घटना के के लिए यमन के हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार माना गया जो ईरान समर्थित हैं । यमन इस वक्त सऊदी और ईरान के व्यक्तिगत दुश्मनी का कोप स्थल बन गया है । ऊपर दिए गये घटनाओं का गहनता से पड़ताल करने पर हम पाते हैं कि राजनीतिक संघर्ष और सत्ता लोलुपता से उपजे गृहयुद्ध ही उपरोक्त घटनाओं के जिम्मेदार हैं । सत्ता पाने की चाहत में जब दो पक्ष लड़तें हैं तो नुकसान हमेशा बेगुनाहों का ही होता है । फिर चाहे वो ईरान-सऊदी का प्राॅक्सी वाॅर हो या सीरिया का आंतरिक कलह । विपरीत विचारधारा की परस्पर लड़ाई ने सीरिया और यमन को युद्ध-क्षेत्र बना दिया है । वर्तमान में इस तरह के कलह ने लाखों लोगो को बेघर कर दिया है । यमन की बात करें तो अब तक यमन में एक लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं जबकि लाखों को अपना घर और देश छोड़कर भागना पड़ा है । अकेले सीरिया में तुर्की की सीमा से सटे इदलिब शहर जिसकी जनसंख्या जंग से पहले 15 लाख थी आज रिफ्यूजी कैंप होने की वजह से 30 लाख से ऊपर जा पहुँची है । पहले लोग आराम से सीमा पार कर तुर्की चले जाते थे लेकिन अब तुर्की ने अपनी सीमाओं की चौकसी बढ़ा दी है । तुर्की में अब तक 30 लाख शरणार्थी पनाह ले चुके हैं । UNHCR के आंकड़े देंखे तो सीरिया से मुल्क के बाहर पनाह लेने वालो की संख्या करीब 65 लाख से ऊपर है जबकि आंतरिक विस्थापन की संख्या 60 लाख से ऊपर मानी जा रही है । वर्तमान में 80 प्रतिशत सीरियन रिफ्यूजी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीना को मजबूर हैं । जिस यमन को कभी अरेबियन प्रायद्वीप का सबसे खुशहाल देश माना जाता था आज हालात ये है कि हर 8 में से एक यमनी विस्थापन का सामाना कर रहा है । इस जंग में सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं और बच्चों के भविष्य पर पड़ा है । सीरिया और यमन में विस्थापन समस्या आज मानवता के सबसे बड़े संकट के रूप में देखा जा रहा है । पूर्व-मध्य एशिया के अलावा अफ्रीका के दक्षिण सूडान, अफगानिस्तान, म्यांमार में भी विस्थापन के यही हालात हैं । इस पलायन की वजह से घरेलू और कामकाजी महिलाओं, और बच्चों के भविष्य पर तलवार लटकती नज़र आ रही है । कोरोना काल में उनकी मुश्किलें और भयावह रूप ले चुकी है । भारतीय परिप्रेक्ष्य की बात करें तो, भारत प्राचीन काल से भारत पश्चिम के लिए पनाहगाह रहा है । फिर चाहे वो आर्य रहे हों, यवन के लोग रहे हो, शक, हूण, कुषाण, पारसी और मध्यकाल में तुर्क, अरबी रहे हों । आज भी भारत शरणार्थियों को पनाह देने के मामले में अव्वल स्थान पर है । आजादी और बंटवारे के बाद उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भारत में अपने ही मुल्क में लोग 'रिफ्यूज़ी' हो गये । आजाद भारत ही नही बल्कि समस्त विश्व में बीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी बनकर उभरा ये बंटवारा । जिससे तकरीबन डेढ़ करोड़ लोग प्रभावित हुए ।
धर्म के आधार पर हुए बंटवारे में लाखों लोगो को अपना घर, खेत, गाँव-मुहल्ला छोड़कर जो हाथ आया समेट कर अंधेरे में रौशन भविष्य का सपना आँखों में निचोड़े भेड़ बकरियों की तरह काफिलों में ढूंस दिया गया । बंटवारे से भड़की सामप्रदायिक हिंसा में लगभग 10 लाख लोगो को जान से हाथ धोना पड़ा । ऐसी अमानवीय परिदृश्य शायद ही भारत ने कभी देंखे हो । 1971 में बांग्लादेश के जन्म के साथ भारत ने एक बार फिर शरणार्थी समस्या का सामना किया । 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों का धर्म के नाम पर अपने घर से खदेड़ दिया जाना और उन्हें रिफ्यूजी कैंप में रहने के लिए मजबूर करना भी मानवीय संवेदनाओं की मौत का एक उदहारण है । हाल ही में म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश और भारत के लिए चुनौती बन कर उभरे हैं । अपना मुल्क छोड़कर किसी दूसरे देश में पनाह लेना एक अलग किस्म की समस्याएँ लेके आना होता है । किसी भी शरणार्थी के लिए नये मुल्क की नागरिकता हासिल करना बहुत पेचीदा और मुश्किल भरी प्रक्रिया होती है । बिना नागरिकता के उन्हें उस देश की कोई भी सुविधा मसलन स्वास्थय, शिक्षा या खाद्यान नही मिल सकता । किसी देश के लिए बाहर से आए शरणार्थियों को नागरिकता देना उनकी अस्मिता, अखण्डता और सुरक्षा पर सवालिया निशान भी लगाता है । ऐसे में अक्सर शरणार्थी हाशिए पर डाल दिए जाते हैं । और उनका हाल-खबर पूछने कोई नही आता । इसीलिए यहाँ मानवाधिकार संगठनों की जरूरत प्रासंगिक हो जाती है । स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर ऐसे ही संठगन शरणार्थी समस्याओं के हल के लिए उपाय खोजनें का प्रयास करते हैं । संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसंबर1950 में शरणार्थी समस्या के विस्तार को देखते हुए UNHCR यानी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त की स्थापना की । यूएनएचसीआर दुनिया भर के विस्थापितों से संबंधित आंकड़े जुटाता है । मसलन, किसी देश के कितने लोग देश के बाहर विस्थापित हुए हैं, और कितने आंतरिक विस्थापित हुए । महिलाओं-पुरूषों, बच्चो और बुजुर्गो की संख्या । इन्हीं आँकड़ो के आधार पर शरणार्थियों को सुविधाएँ मुहैया कराई जाती है । साथ ही ऐसे संगठन किसी देश के आंतरिक व बाहरी 'काॅन्फ्लिक्ट्स' का अध्ययन करता है जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने रखा सके और उस समस्या को हल करने का प्रयास किया जा सके । और विस्थापन समस्या का निस्तारण हो सके, ताकि किसी को अपना घर छोड़कर दर-बदर की ठोकरें न खानी पड़े । यूएनएचसीआर, एमेनेस्टी इंटरनेशनल, यूनीसेफ़ जैसे वैश्विक संगठन इस दिशा में सराहनीय पहल कर रहे हैं ।
हमनें देखा कि कि समकालीन विश्व में किस तरह शरणार्थी समस्या मानवीय संवेदनों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है । वैश्विक जनसंख्या का 1 प्रतिशत जनसंख्या सिर्फ सीरिया में विस्थापन का सामना कर रहा है । अगर इन समस्याओं का गहनता से अध्ययन करें तो पाएंगे कि एक सम्प्रदाय विशेष की सत्ता लोलुपता ने पूरी दुनिया में पहले भी तबाही मचाई है और आज भी कमोबेश पूरी दुनिया में तबाही मचा ही रही है । धर्मांधता को खत्म करने की दिशा में सार्थक कदम उठानें ही होंगे । मध्य-पूर्व एशिया में आइएसआइएस, अफ़गानिस्तान में तालिबान और म्यांमार में रोहिंग्या अपनी हठधर्मिता और धर्मांधता की वजह से पूरी दुनिया में मानवता के लिए खतरा बन कर उभरे हैं । यमन आज भुखमरी के कगार पर खड़ा है तो सवाल होना चाहिए कि क्यों खड़ा है ? अफगानिस्तान, सीरिया, सूडान आज बर्बादी के राह पर खड़ा है तो सवाल होना चाहिए कि क्यो खड़ा है ? चंद लोग जब जब पूरे हूजूम पर हूकूमत करने, उनकी खून-पसीनें की कमाई पर ऐश उड़ाने का ख्वाब पाल लेते हैं और उसे साकार करने की चाहत में आवाम की जिंदगी नर्क बना देंते हैं तो मजबूरन उन्हें मुल्क छोड़ना पड़ता है । ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवता के हिमायती मुल्कों का ये परम दायित्व है कि लोकतंत्र और आंतरिक मसले की दुहाई देकर अत्याचार करने वालों पर नकेल कसें । लेकिन बजाय उनकी सहायता करने के तुर्की, ईरान, रूस और अमेरिका जैसे देश व्यक्तिगत हितों को ध्यान में रखते हुए इस प्रचंड दावानल को घी देने काम कर रहे । जबकि अत्याचार से जूझ रहे एलन कुर्दी, इम आदिल, यास्मिन-अल-अवाधी और अदीब-अल-जेनानी जैसे लोगो का परिवार ये जंग खत्म होने के लिए वर्षों से दुआ कर रहा है । उनकी सदाएँ अल्लाह के कानों तक पहुँचे न पहुँचे, लेकिन इंसानों की कानों तक पहुँच कर भी अगर उन्हें फर्क नही पड़ता, उनके लिए चिंता का सबब नही बनता तो यकीनन इस दुनिया को न अल्लाह की जरूरत है न ही इंसानों की ।

Saturday, February 13, 2021

वेलेंटाइन डे: प्रेम, नारी और विद्रोह

 फरवरी की गुलाबी सर्दियाँ अपने आप में ही रोमाटिंक एहसास देती है, जब बसंती हवा सर्द मौसम में नहाकर खिले फूलों की महक को लपटे फिज़ाओं को मदमस्त करने लगती है, अंगड़ाईयाँ लेकर तन-बदन में एक गुदगुदी हिलोरें मारने लगती है ।


खिली खिली धूप में जब दो युवा धड़कनें हाथ थामें एक साथ धड़कने को मचलते हैं तो उनको ये बताने की जरूरत नही होती कि वेलेंटाइन वीक चल रहा है । भारतीय प्रायदीप में ये मौसम हमेशा से प्रेम का रहा है । इसी बसंत में संगीत की देवी 'सरस्वती' की आराधना होती है, तो इसी बसंत में शिव और पार्वती के अगाध प्रेम का मिलाप होता है, इसी बसंत में कृष्ण का गोपियों के साथ रासलीला होता है । ऐसे में इस नैसर्गिक प्रेम को कोई कैसे नफ़रत की निगाह से देख सकता है ?

क्या सिर्फ इसलिए कि संत वेलेंटाइन गैर भारतीय हैं ?

नही ! ये मसला सिर्फ देशी-विदेशी का नही है, इसमें और भी कुछ पेंच है ।

इंटरनेट की पहुँच ने आज गाँव-गाँव वेलेंटाइन डे की प्रासंगिकता को पहुँचाया है, अन्यथा गाँवो में वेलेंटाइन डे की कोई अहमियत नही थी । आज पूंजीवाद के इस दौर में प्रेम को भी बाज़ार की वस्तु बना दिया गया है, यही वजह है कि आज निश्छल प्रेम म्यूजियम की वस्तु बन गयी है । आज कुछ भी शुद्धतम रूप में नही बचा है, हर चीज़ विकृत है, हर चीज़ भ्रष्ट है, और प्रेम भी इससे अछूता नही रहा है ।

अब प्रेम के पर्व को ही देखें तो पाएंगे दो कट्टर प्रतिद्वंदी हाथियों की बीच प्रेम घास की तरह कुचला जा रहा । एक तरफ वो पूंजीवादी लोग हैं, जो प्रेम को हर सूरत में पूंजीवादी बनाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं । मसलन, प्रेम में आपको फूल, चाॅकलेट, टैडी, सरप्राइज जैसे उपहार देने की अनिवार्यता रखी जाती है । आजकल तो प्रेम में गिफ्ट्स देने की इतनी वैरायटी आ गयी हैं कि खुद प्रेम भी अपने अस्तित्व पर शरमा रहा होगा । बाज़ार ये घोषित रूप से कहता है कि नमक-रोटी खाने वाले प्रेम के अधिकारी नही । दूसरी तरफ़ संस्कृति के स्वघोषित रक्षक प्रेम पर बात करने, इज़हार करने और प्रेम में जीने वालों के लिए तलवारें खींच लिया करते हैं । वेलेंटाइन डे पर जबरन मातृ-पितृ दिवस के रूप में मनाने के लिए तरह-तरह के प्रोपगेंडा चलाए जाते हैं । प्रेमी जोड़ो को सार्वजनिक स्थानों पर खुलेआम पीटते हैं, और उनके साथ बदतमीजी करते हैं । हैरत की बात है कि हाल के सालों में सरकारें भी ऐसे अराजक तत्वों को बैकडोर से समर्थन देती आ रही हैं ।

अब सवाल ये है कि प्रेम के वो समर्थक जो न बाज़ारवाद की तरफ जाना चाहते हैं न कथित संस्कृति की तरफ वो कहाँ जाएँ ?

प्रेम बेहद निजी और नैसर्गिक अभिव्यक्ति है, जिसपर किसी का कोई जोर नही । चाहे रोकने वाला कितना ही ताकतवर क्यो न हो, प्रेम को बांधकर नही रख सकता ।

असल में हम प्रेम को जितना कमजोर समझतें हैं वैसा कुछ है नही ।  प्रेम बंधनों को तोड़ना और दिलो को जोड़ना सिखाती है ।

प्रेम अन्याय, शोषण, असमानता के विरूद्ध हमेशा खड़ा रहा है, प्रेम कभी जाति, धर्म, नस्ल जैसी विभेदकारी तथ्यों को देखकर नही होता । अगर प्रेम इन तथ्यों को महत्व देता है तो वो प्रेम नही महज एक समझौता है । जब आप प्रेम में होते हैं तो आप एक रिबेल की भूमिका में होते है जहाँ आप अपने पार्टनर के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार होते हैं ।


भारतीय प्रायद्वीप ऐसे तमाम प्रेम-कहानियों से भरे हैं जिसमें नायक अपनी प्रेयसी के लिए प्रेम में डूबकर एक मिसाल दे जाता है ।

हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, मिर्जा-साहिबा, ढोला-मारू जैसी लोककथाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी पहले हुआ करती थीं । कालिदास से लेकर शूद्रक और आधुनिक साहित्यकारों की फेहरिस्त में प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, मजाज, फैज सरीखे रचनाकारों ने प्रेम पर कितना कुछ लिखा है । तो क्या प्रेम सिर्फ साहित्य सृजन भर के लिए है ? ये उन स्वघोषित संस्कृति के ठेकेदारों से पूछना चाहिए कि प्रेम की इस पावन धरती पर क्या प्रेम करना सचमुच गुनाह है ? अगर ऐसा है तो वो कौन सी किताब है जिसमें ये लिखा है कि प्रेम करना गुनाह है । आप यकीन मानिए उनके पास इसका कोई जवाब नही होगा ।

अजब विडंबना है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में जिस भारत की पहचान प्रेम की इमारत 'ताजमहल' और बाॅलीबुडिया लव-स्टोरी से रही है, और उसी भारत में प्रेम की ये दुर्गति ? ये हिप्पोक्रेसी नही तो और क्या है ?


दरअसल सच्चाई ये है कि प्रेम का मसला सिर्फ दो प्रेम करने वाले भर से संबंधित नही होता । अगर ऐसा होता तो ऑनर किलिंग के नाम पर हर साल लाखों लड़कियों को अपनी जान से हाथ क्यो धोना पड़ता है ? प्रेम का मसला जुड़ा है नारी-मुक्ति से । प्रेम के नाम पर पितृसत्तात्मक समाज का महिलाओं पर से अंकुश छूटने लगता है । मैं अंकुश शब्द का इस्तेमाल कर रहा क्योंकि मुझे यही मुफीद लगता है । पितृसत्ता ने हमेशा से महिलाओं को गुलाम बनाए रखने और उन्हें चहारदीवारी में कैद कर रखने की भरसक कोशिश की है । उनकी इच्छाओं को हमेशा नियंत्रित कर रखने की कोशिश की है । घर की लड़की का अपनी पसंद से प्रेम करना, अपनी पसंद से शादी करना पितृसत्ता के लिए हमेशा से नाक का सवाल रहा है । लड़की ने किसी लड़के को प्रेम कर लिया तो नाक कट गयी, लड़की घर से भाग गयी तो नाक कट गयी, लड़की ने अपने हक में फैसले ले लिए तो नाक कट गयी । मुझे नही समझ आता भारतीय समाज की नाक इतनी नाजुक क्यों होती है जो लड़की के स्वालंबी होने भर से कट जाती है ।

लड़की घर से भागती हैं तो इसका मतलब होता है कि वो पितृसत्ता को चुनौती दे रही है, और अपनी किस्मत का फैसला खुद कर रही है । अगर हम महिलाओं को उनकी मुकम्मल हक का हिस्सा उन्हे दें सकें, पितृसत्ता से मुक्त कर सकें, उन्हे बराबरी का मौका दे सकें तो इस दुनिया की प्रगति और बेहतर ढंग से हो सकती है । 

आलोक धन्वा की एक कविता है 'भागी हुईं लड़किया' उसका एक अंश मैं लिख रहा हूँ 


"अगर एक लड़की भागती है

तो यह हमेशा जरूरी नहीं है

कि कोई लड़का भी भागा होगा 


कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं

जिनके साथ वह जा सकती है

कुछ भी कर सकती है

महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है" 


आज के दौर में तमाम प्रगतिशील कवि, साहित्यकार, फिल्मकार और कला के हर क्षेत्र के प्रगतिशील बुद्धिजीवी महिला उत्थान के लिए कदम उठा रहें हैं । सही मायनों में प्रेम करने की आजादी हासिल करना ही प्रेम, सच्चाई, और नवचेतना का मार्ग प्रशस्त करना होगा ।

हमें ऐसे समाज का निर्माण करना हैं जो प्रेम से परिपूर्ण हो, जहाँ नफ़रत इतनी ताकतवर न हो कि वो सरे-राह प्रेम का गला घोंट सके । श्रम-विभाजन पर आधारित लैंगिक भेदभाव को खत्म कर स्त्री-पुरूष के विभेद को सिर्फ बायोलाॅजिक डिफरेंस तक सीमित कर देना है । हमें सच्चे प्रेम के लिए लड़ते रहना होगा, रूढ़िवादियों से, नफ़रत के सौदागरो से, और पूंजीवादी मूल्यों से । सही अर्थों में तभी बराबरी आएगी और प्रेम का गुलशन आबाद होगा । ये आसान तो नही है लेकिन हमें उम्मीद और लड़ाई दोनो बनाए रखनी हैं

साहिर लुधियानवी के शब्दों में 'वो सुबह कभी तो आएगी' ।