Monday, August 30, 2021

नवोदयनामा: दहर के दयार में

हम मनुष्य कोशिकाओं से नही बल्कि स्मृतियों से बने हैं -शिवेन्द्र । सर्द मौसम, दिसंबर का महीना । कुहासे में नहाकर निकलती हवाओं का हुस्न अपने चरम पर ठहरा हुआ था । जिसकी छुअन माथे और नाक को छूकर पूरे बदन में सिरहन पैदा कर रही थी । सुबह तड़के ही मैं घर से निकल आया था । आज कई साल बाद अपने स्कूल जाना था । स्कूल में पुरातन छात्र सम्मेलन का आयोजन किया गया था । मैं बहुत उत्साहित था कि बरसो बाद स्कूल के उन सड़कों, गैलरी, हाॅस्टल और क्लास बिल्डिंग के दीदार का मौका मिलेगा, जिनके जर्रों में दबी मेरी शरारतों की यादें फिर से ताज़ी होने वाली थी । जिन्हें वक्त ने अपने लिहाफ से ढक रखा था । हकीम साब एक महीने पहले ही इनवीटेशन भेज चुके थे और लगातार उनके रिमाइंडर आ रहे थे । हकीम साब उर्फ राशिद भाई । हमारे स्कूल के सबसे पुराने चावल मतलब स्कूल के पहले बैच के विद्यार्थी और पुरातन संगठन के पितामह । ये उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि स्कूल से पास आउट हुए सभी विद्यार्थी एक दूसरे से मिल पाए और एलुमिनाई मीट जैसी गेट टुगेदर का आयोजन हो सका ।  उनको जड़ी बूटियों, गार्डनिंग और नेचर में एडवेंचर का बड़ा शौक है । खासे दिलचस्प इंसान है हमारे हकीम साब । एक बार वो घूमते-टहलते नाॅर्थ ईस्ट पहुँच गये, वहाँ से उन्हे बाँस की औषधिक ग्यान की प्राप्ति हुई और हर किसी को वो बाँस के फायदे गिनाने लगे । हाँलाकि नाॅर्थ ईस्ट जो कि बाँस की खेती के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है वहाँ हर क्षेत्र में बाँस का इस्तेमाल किया जाता है । घर बनाने से लेकर नाॅर्थ ईस्ट कुज़ीन तक । लेकिन उत्तर भारत में बाँस के सीमित उपयोग ही माने गये हैं । हाँ ! कहीं कहीं मुहावरे के रूप में अश्लीलता का पर्याय ही माना गया है । अब जब हकीम साब सबको बाँस के फायदे गिना रहे थे तो कुछ शरारती तत्वो नें उनका उपनाम ही 'हकीम साब' रख दिया । हम लोगो के लिए राशिद भाई के नाम से राशिद और भाई का लोप हो गया और उसकी जगह 'हकीम' और 'साब' का नया अवतार सामने आ गया । उनके जैसे दिलचस्प शख्सियत के लिए अलग से लिखा जाना मुफ़ीद रहेगा फिलहाल हम यहाँ किसी और मुद्दे की बात कर रहे हैं । बहरहाल हकीम साब, परवेज भाई और डाॅक्टर आशिम अबरार के साथ मैं आज 8 साल बाद उस धरती पर खड़ा था जिसने मुझे खुद की पहचान दी, नाम दी और जिंदगी का मकसद दिया । ये वही जगह थी जिसने मुझे वक्त के साथ दौड़ना सिखाया, लड़ना सिखाया और हलक तक भरकर इल्म को पीना सिखाया । आज भी वहीं सड़कें, वही गलियाँ, वही मैदान और वही आसमान अपनी जगह पर रूका हुआ था जिसे छोड़कर मैं जिंदगी की रेस में आगे बढ़ गया था । वापस उस जगह आकर जैसे मेरा बचपन लौट आया था । सफ़ेद यूनिफाॅर्म में मुर्गियों के बच्चो की तरह झुंडो में चलते अल्हड़ उदंड लड़के आँखो के सामने नाचने लगे । कीचड़ में सने कैनवस के जूतों से सामने वाले के चमकदार सफ़ेद जूतों को मैला करके अट्ठाहस करते चंट मुरहे लड़को के बीच मेरा बचपना फिर से जीवित होने लगा । शर्मीली, पूड़ी, गडरा, पिद्दी और चिरई जैसे मेरे सहपाठियों की छद्म धुंधली आकृति अब साफ होने लगी । ऊँची काली पानी की टंकी जिसे देखकर स्कूल के शुरूआती दिनों में धुकधुकी बंध जाती थी आज इस धरती से प्रेम के किस्सों की गवाही देती नज़र आने लगी । सारी औपचारिकता, भाषण, और खाने के बाद हम असल काम पर आए यानी वर्तमान विद्यार्थियों से टू वे वार्तालाप । पुरातन और वर्तमान विद्यार्थियों के बीच वाॅलीबाॅल का मैच चल रहा था  । किसी भी मैच को देखने का मज़ा मैदान में बैठकर ही आता है । चारो तरफ़ अपने अपने टीम को उत्साहित करते दर्शक, शोर शराबा और हर एक प्वाइंट पर जोश का उबाल । न जाने कितने दिनों बाद उस गर्मी को मैंने अपने सीने में महसूस किया । स्कूल के दिनो में हर महीने इंटर हाउस कंपटीशन होते रहते थे । अरावली, नीलगिरी, शिवालिक और उदयगिरी पर्वत श्रेणियों नाम पर बनाए गये हाउस एड़ी चोटी का जोर लगाकर हर फील्ड में अव्वल बने रहने की भरसक कोशिशें करते रहते थे । इसके अलावा कलस्टर, रिजनल और नेशनल लेवल के गेम्स का अलग ही चार्म रहता था । एक बड़े से मैदान में अलग-अलग कलस्टर, और राज्यों के प्रतिभागी जोर अजमाइश करते थे । वो हमारे लिए किसी ओलंपिक से कम न होते थे । हर एक प्वाइंट पर दर्शकों का उबलता जोश और मैच हारने के बाद गले लगाकर सात्वंना देना स्पोर्ट्स के सबसे खूबसूरत लम्हे हुआ करते थे । उन दिनों मैं जूडो खेला करता था । जूडो खेलने और एक्सट्रा एक्टिविटी के बहाने मैंने स्कूल की तरफ से खूब भ्रमण किया । अलग-अलग स्कूलो में रहकर वहाँ के बच्चो से मिलकर मैंने बहुत सी चीजें सीखी । स्कूल में देश के सूदूर क्षेत्रों से बच्चे माइग्रेशन करके आते थे । मसलन मेरे स्कूल में त्रिपुरा से, तो वहीं बाराबंकी में पंजाब, फैज़ाबाद में कश्मीर और लखनऊ में केरल से बच्चे पढ़ने आते थे । गेम्स और एक्स्ट्रा एक्टिविटी के नाम पर मेरा दूसरे विद्यालयों में आना-जाना लगा रहता था । इससे मुझे भारत की विविधता के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला । स्काउट कैंप के दौरान ट्रैकिंग, कुकिंग, सरवाइवल स्किल और थोड़े बहुत जासूसी के गुर सीखने को मिले । स्काउटिंग करते हुए हर रात हमें एक सीक्रेट कोड दिया जाता था और संदिग्ध व्यक्ति से बात करते हुए हम उससे कोड पूछते थे । सही कोड बताने पर ही हम उसे अपना साथी मानते थे । एक बार की बात है रात को हमारा कोड टाॅर्च था और एक गैर स्काउट लड़का हमारा कैंप में घुस आया कोड पूछने पर उसने सही जवाब दिया तभी मालूम चला कि कोड रीवील हो गया है । आनन-फानन में तुरंत कोड बदला गया और सुबह होते ही उस लड़के को स्काउट से निकाल दिया गया जिसने अपने गैर स्काउट दोस्त को कोड बता दिया था । उस वक्त मुझे बुरा लगा था कि एक कोड बता देने भर से उसे निकाला तो नही जाना जाना चाहिए था लेकिन कम उम्र में अनुशासन सिखाने के लिए दंड जरूरी होता है ये बात मुझे बाद में समझ आ ही गयी । फिलहाल वाॅलीबाॅल का मैच खत्म हो गया था । बेहद रोमांचक मैच में पुरातन छात्र को विजयी घोषित किया गया । पुरातन छात्रों की जीत पर वर्तमान छात्रों को खुशी मनाते देख दिल को बड़ा सूकून आया । आज जिस दौर में हम जी रहे हैं उसमें खेल और विचारधारा की प्रतिद्वंदिता में एक अजब ही कड़वाहट देखने को मिलती है । खेल और राजनीति में असहिष्णुता इस कदर हावी हो जाती है कि भारत-पाक मैच में हारने वाली टीम के समर्थक हिंसा पर उतर आते हैं तो वहीं राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई में गले कटने लगते हैं । इसी दौर में प्रतिद्वंदी की जीत में खुशी मनाने की परंपरा मेरे स्कूल ने अभी तक जिंदा रखी है इसे देखकर देश के भविष्य के लिए एक उम्मीद की किरण जगती तो है । मैच के बाद मैं बाॅस्केटबाॅल कोर्ट से हाॅस्टल की तरफ जा रहा था तभी एक लड़का मेरी तरफ दौड़ता हुआ आया उसके हाथ में एक डायरी और एक पेन था । मेरी तरफ आते उसने अपनी डायरी और पेन मेरी तरफ बढ़ा दिया । मैंने आँखों से पूछा 'क्या' ? तो उसने कहा भैया कुछ लिख दीजिए । उफ ! ये डायरी मैं फिर से अतीत में डूबता-उतरारा महसूस करने लगा । हाईस्कूल के बोर्ड एक्जाम आने वाले थे और पूरे हाॅस्टल में डायरी घुमाने की परपंरा चल रही थी । रंगीन, खूबसूरत, बड़ी-बड़ी डायरियाँ एक हाथ से दूसरे हाथों में जा रही थी । कहीं कही लिखे हुए पन्नों में स्टेपलर से पंच किया होता था । खासतौर से लड़कियों की डायरी में । क्या पता उसमे कोई काॅन्फिडीशियल या राॅ की इन्फाॅर्मेशन होती थी या डायरी के बीच में कोई प्रेमपत्र । कौन जाने क्या लिखा होता था । मैंने भी उस दौरान न जाने कितने लोगो की डायरी भरी । ज्यादातर सीनियर्स का ही लिखा । सच कहूँ तो लिखना मैंने कम उम्र में ही सीख लिया था लेकिन शब्द भंडार मेरा डायरी लेखन से समृद्ध हुआ । मेरी भी डायरी गर्ल्स और ब्यायज हाॅस्टल की चक्कर लगा के जब मेरे पास आई तो लगा इस पाँच साल की जेल यात्रा का असली लेखा जोखा मेरे हाथ में है । मार्कशीट तो सिर्फ ये बताते हैं कि आपने तय सिलेबस में कितना पढ़ा और लिखा है । और जो वक्त हमने उस कैंपस में रहकर गुजारा, जो 'कर्म और 'कांड' किए उसका रिपोर्ट कहाँ है ? दोस्तो से बेहतर क्रिटिक और कौन हो सकता है, जिसने आपको करीब से देखा हो, महसूस किया हो । नवीं कक्षा में रिक्त सीटो पर नये एडमिशन हुए थे । अच्छे लड़के आए थे घर से दूर रहने आए नये दोस्तो को कायदे सिखाने की जिम्मेदारी हमीं लोगो पर थी । हम लोग कोशिश में थे कि उन लोगो को किसी तरह की तकलीफ न हो । इसेंशियल दिलाने से लेकर क्लास रूम और हास्टल में एडजस्ट कराने तक हम सभी उन सबकी हेल्प कर रहे थे । तभी मालूम चला कि रात को कोई सीनियर उनमे से एक लड़के की रैगिंग कर गया है । गहन पड़ताल करने पर पता चला कि मेरे बैच का ही लड़का सीनियर बनकर नये लड़को की रैगिंग कर रहा था । ये सुनकर हम सब हँस हँस कर लोट पोट हुए जा रहे थे । जब नये लड़के को मालूम हुआ कि रैगिंग करने वाला कोई सीनियर नही बल्कि उसका ही बैचमेट था तो गालियों का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसकी तल्खी लंबे समय तक बनी रही । गाहे-बगाहे कोई न कोई उस लड़के से पूछ ही लेता 'क्यो भाई सुना है कोई रैगिंग ले रहा था तुम्हारा' बस इतना वाक्य काफी होता और वो लड़का बस छूट ही जाता । कलकल, अविरल, निर्झर अत्तरी-धत्तरी करके गालियाँ उसके मुखारबिंदु से प्रवाहित होने लगती । इस कर्म में लोगो को विशेष आनंद आने लगा । तब तक के लिए जब तक मनोरंजन का कोई दूसरा मुद्दा नही मिल गया । बाद में वो लड़का मेरा बहुत अच्छा दोस्त बना । उसका नाम विस्तृत था । जैसा उसका नाम वैसा ही उसका व्यक्तित्व । स्कूल के दिनों के बाद मैं उससे कभी नही मिला, लेकिन स्कूल के दिनों में मैंने उससे तेज तर्रार लड़का कभी नही देखा । गोरी चमड़ी, बिना होंठ कि मुँह जिसके पीछे गाँव के खड़न्जे से उबड़ खाबड़ दाँत, दो हड्डी का बच्चा जिसका कंधे से कमर तक का आकार एक पटरे जैसा था । कंधे से लटकते तंदूरी सींक से हाथ, पतली पतली दो टांगे, कुपोषण के बेहतरीन ब्रांड एंबेसडर हो सकते थे । इन सब के बीच उसका प्रेजेंस ऑफ माइंड और क्रिएटिविट गज़ब की थी हाँलाकि साहित्य और कला से उसकी दुश्मनी थी लेकिन साइंस का वो ब्रिलियंट स्टूडेंट था । विज्ञान और साहित्य के बीच जो समानता है उसी का नाम क्रिएटिविटी है । हम दोनो के बीच यही समानता था और यही वजह थी जिससे मेरी उसकी छनती थी । फरवरी का महीना चल रहा था और उस दिन मौसम बहुत खुशगवार था । चारो तरफ बदली और रेशमी हवाएँ रूह को सूकून दे रही थी । तिस पर स्कूल के ज्यादातर टीचर एंट्रेंस एक्जाम कराने अलग अलग जगहों पर गये हुए थे । इक्का दुक्का ही टीचर कैंपस में रह गये थे । मौके की नज़ाकत को देखते हुए मैंने विस्तृत से कहा कि चलो मनकापुर घूम आएँ, मौका लगा तो पिच्चर भी देख लेंगे । मामला जँच गया और सुबह ग्यारह बजे तक हम लोग बाउंड्री लांघ गये । मनकापुर पहुँचकर हमने कुछ सामान खरीदे । वक्त पर्याप्त था तो हम लोग टाॅकिज की तरफ चल निकले । रात की विधिवत बारिश का पनारा अभी तक बह रहा था । उन्हीं कीचड़ो, नालियों और चहबच्चो से होते हुए टाॅकिज पहुँचे । उस दिन कुछ कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था इसलिए टाॅकिज बंद थी । हम उदास मन से वापस लौट रहे थे कि तभी आसमान जोर से कड़का और झमाझम बारिश शुरू हो गयी । जो जहाँ था वहीं फंस गया । उन्मुक्तता के सेलेब्रेशेन में हम छाता लाना तो भूल ही गये थे । हड़बड़ी में एक सब्जी की दुकान में दोनो घुस गये । उस मूसलाधार बारिश में हम दो घंटे फंसे रहे । जब बारिश कम हुई तो समय देखा । चार बज गये थे । चार बजने का मतलब कि टीचर्स के वापस कैंपस आने का समय हो गया । अब क्या किया जाए, ये कमबख़्त बारिश थमने का नाम ही नही ले रही । फायनली हमने तय किया कि अब रूकेंगे नही, कैसे भी करके वापस स्कूल पहुँचना ही है । सब्जी वाले से पाॅलीथीन लेकर दोनो ने उसे सर पर चढ़ा लिया । चौराहे पर पहुँचा तो एक धक्का और लगा । एक भी गाड़ी चौराहे पर नही थी जो हमारे स्कूल तक जाती है । अब क्या किया जाए ? विस्तृत हैरत से बोला 'दो ही रास्ते हैं' मैंने बहुत संजीदगी से सोचते हुए जवाब दिया वो क्या ? या तो लिफ्ट मांगकर चलो या फिर पैदल लिफ्ट के लिए कोई गाड़ी तो गुज़रनी चाहिए तो पैदल चलो 'सिरिया गये हो का ? 8 किलोमीटर पैदल ? हमसे न हो पाएगा तुहिन जाओ' फ्रस्टेशन में भाषा हिन्दी से अवधी पर आ गयी । तो मरो फिर इहैं । यहाँ से किसी तरह पहुँच भी गये और स्कूल में मालूम चल गया तो पेले बहुत जाओगे तो अब ? चलो धीरे धीरे । कोई मिल गया रास्ते में तो लिफ्ट ले लेंगे वरना शाम की काउंटिग से पहले पैदल तो पहुँच ही जाएंगे । मामला यही फायनल हुआ । पाँच बच चुके थे, ठंड के दिन और बारिश के मौसम ने शाम को रात की तरफ ढकेल दिया था । हम दोनो पैदल-पैदल मार्केट पीछे छोड़ चुके थे कि तभी सड़क से दूर कोई मोटरसाइकिल आती दिखाई थी । दोनो ने एक दूसरे की आँखो में देखा जो काँच की गोलियों सी चमक रही थी । मोटरसाइकिल पास आई तो मैंने हाथ दिखाकर रूकने को कहा और जोर से चिल्ला कर कहा "देवरिया चलबौ हो का" ? मोटरसाइकिल सवार जिसने नीले रंग का रैनकोट पहना था, मोटरसाइकिल साइड में रोक दी और हेलमेट उतारा । मोटरसाइकिल सवार का चेहरा देख कर हम दोनो के चेहरे का रंग उड़ गया । अरे ! मर गये । ये तो केमेस्ट्री सर थे यहाँ क्या कर रहे हो ? सर कुछ सामान लेने आए थे क्या सामान ? साइंस प्रोजेक्ट का सामान है सर अच्छा ! परमिशन लेके आए हो ? हाँ सर नीलिमा मैम से परमिशन लिए थे अच्छा चलो बैठो । दोनो ने एक दूसरे की तरफ कुटिल मुस्कान से देखा और मैंने उसे आँख मार दी । स्कूल पहुँचकर सीधे हाॅस्टल की तरफ दौड़े, आज का दिन तो बहुत एडवेंचर भरा था । भइया आप लोगो ने तो बहुत फन किए होंगे न अपने टाइम पर । कुछ बताइए न । ये सुनकर मेरी तंद्रा टूटी और मैं मुस्कुरा उठा । उस लड़के की डायरी में शुभकामनाएँ लिखी, जैसा हम स्कूल के दिनो में दूसरो की डायरी में लिखते थे । ग्राउंड से निकल कर मैं एक लड़के का साथ जूनियर हाॅउस की तरफ जा निकला जिसे परित्यक्त कर दिया गया था । उसे देखकर मन उदास सा हो गया । हाय ! यही वो जगह थी जहाँ कदम थमते थे, तेरी गलियों से गुज़रे तो ख़्याल आया । किसी जमाने में ये जगह हम लोगो से गुलज़ार रहती थी । हर हाउस के सामने चूना और गेरूए से पुती अधधंसी ईटो से मेढ़ बनाकर करीने से किया गया पौधरोपड़ की जगह आज चारो तरफ बड़े-बड़े घास फूंस, जंगल ने ले लिया था । जगह-जगह से उजड़ती दीवारें, खिड़कियों से झांकती अंधेरे के साए । मैं नीलगिरी की सीढ़ियों से दुमंजिले पर जा पहुँचा । सिंटेक्स को रखने के लिए बनाया गया लोहे के मोटे चद्दर के चबूतरे पर बैठकर, पानी की ऊँची काली टंकी, मेस, स्टाॅफ कालोनी की तरफ देखने लगा कि शायद इस जगह से गुजरा कोई लम्हा वापस मेरे हाथों मे आ जाए । लेकिन ऐसा नही हुआ, मैं वहाँ से उठकर छत के कोने पर आ खड़ा हुआ जहाँ से ग्राउंड, क्लास बिल्डिंग और गर्ल्स हाॅस्टल साफ दिखाई देते थे । वहाँ खड़े होकर ऐसा महसूस हुआ जैसे गौधूलि का समय है, गेम टाइम अभी-अभी खत्म हुआ हो और ग्राउंड से बच्चे अपने अपने आशियानें की तरफ लौट रहे हो । तभी आसमान से चिड़ियों का एक बहुत बड़ा झुंड मेरे सर के ऊपर से पश्चिम में गुज़र गया । ये देखकर मुझे याद आया कि मुझे भी अब जाना है । मैं आज यहाँ एक दिन का मेहमान बनकर आया हूँ । हकीम साब का फोन आया कि कहाँ हो ? अकेले में जितनी यादें हो सकती थी मैंने दोनो हाथों से बटोर ली लेकिन ऐसी कोई जेब ही नही बनी जिनमें जीवन की छोटी बड़ी सभी यादों को एक साथ भरा जा सके । मेरे स्कूल के किस्सों के लिए कम से कम एक किताब जितनी बड़ी जेब तो होनी ही चाहिए । उस सुखद दिन का अंत उदासी भरी शाम से होता दिखाई पड़ा । हम गाड़ी में बैठे, कुछ सीनियर बच्चे हमे विदाई देने आए और एक दूसरे से जल्द दुबारा मिलने का वादा करके हम वापस अपने आशियाने की तरफ जा उड़े । गाड़ी सड़को पर सरपट दौड़ी जा रही थी तभी परवेज भाई ने रेडियो ऑन किया और किशोर दा की मखमली आवाज कानों में घुलने लगी 'यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे, सपनों की शहनाई बीते दिनों को पुकारे'। हम सभी अपने अपने बचपन के दिनों की गलियों में भागते हुए कहीं खो से गये ।

No comments:

Post a Comment