Tuesday, May 9, 2017

बीड़ी पे चर्चा

एलयू के छात्रावास प्रवास के दौरान अक्सर महीनें खत्म होने से पहले कड़की आ जाती थी । खाली जेब, बढ़ती मंहगाई, देर रात बीसी और धुँआ फूंकने की चर्राई हुई शौक को बचाने की जुस्तजू । ये वो परिस्थितयाँ थीं जिसने बीड़ी से दोस्ती कराई। इसी बहाने हम चार-पाँच लोग इकट्ठा होते थे और फिर पूरी रात बहसबाजी होती थी ।
रात की खामोशियों में जब पूरा शहर सो रहा होता रैम्ब्रांट, मोने-माने, विंची, माइकेएंजलो, टर्नर और पिकासो जी उठते, उनकी कृतिया बोल उठती । मोनालिसा न जाने कितनी बार हम लोगो के साथ सिस्टाइन चैपल (एमएफए वाली खंडहर) के नीचे बैठकर बीड़ी पीती । गुएर्निका अपना दुखड़ा सुनाती ।

लखनऊ के एक कोने मे बैठकर हम यूरोप की आर्ट गैलरी घूमते तो कभी लंदन का लैंडस्कैप बनाते । जब कभी हम फ्रसटेट होते तो लगता कि हम ही वान गाॅग है और अपनी बीड़ी उसका ब्रश । तकलीफ इस बात की थी कि हम कभी उसके चवन्नी बराबर भी न पहुँच सके तसल्ली इस बात की थी कि फ्रस्टेशन मे उसकी तरह कभी कान नही काटे ।
यूरोप से निकल कर जब हम इंडिया पर बहस करते तो लीजेण्ड रवि वर्मा, अमृता शेरगिल, यामिनी राय और हुसैन साहब देशी मोर्चे पे साथ होते ।
हुसैन साहब की स्ट्रगल वाली कहानियाँ जिसमें कमर्शियल आर्ट उनकी गर्लफ्रेंड होती तो ट्रेडिशनल आर्ट उनकी बीवी । एक उनके लिए जीविका का जुगाड़ करती तो दूसरी सूँकून की । ऐसी कहानियो से रातें पट जाती थीं । हास्टल से निकल कर जब हम मुक्ताकाशी थिएटर से घूम कर एमएफए के खंडहरो की तरफ जाते तो अजंता-एलोरा की विरानियाँ सन्नाटे मे घुल जाती । दोनो तरफ ऊँचे लम्बे अशोक के पेड़ के बीच से उजड़ी सड़क किसी पहाड़ी पर होने का एहसास कराती । कास्टिंग के लिए रखे पत्थरो पे बेतरतीब लेटे-बैठे न जाने कितनी बीड़ियाँ हमारे गुफ्तगू में साथ देतीं । राजनीति के रेलम पेलाई से लेके वाॅश, म्यूरल, फैब्रिक, मेटल-कास्टिंग, कंपोजीशन, क्ले-माॅडलिंग, फोटोग्राफी, लाइटिंग और न जाने कितनो विषयों पर थीसिस रचे जाते । छोटे-छोटे टाॅपिक पे लंबी-लंबी बहसे होती । नये नये आइडियाज़ खोजे जाते । एक बार तो हमारे एक मित्र ने "फाल ऑफ मैन" से प्रेरित होके "फाल ऑफ एमएफए" रच डाला ।

भगत सिंह ने किसी किताब मे कहा था कि कवि कलाकार और क्रांतिकारी एक ही पदार्थ से बने होते है साथ ही उन्होने सिगरेट और क्रांतिकारी जीवन पर भी एक सकरात्मक लाइन बोली थी ।
शायद यही वजह है कि कभी मेरे मन में ये ख्याल नही आया कि बीड़ी पीना बुरा है । हाँ ! कुछ लोग इसे खराब स्टेटस की पहचान मानते हैं तो वो ठेंगे से । हमारे काॅलेज के लाखों कमाने वाले कई प्रोफेसर तो बकायदा खैनी रगड़ के खाते थे और इस बात का अक्सर हम लोग मजाक बनाते थे । हम लोगो को तो लगता था कि तंबाकू सेवन तो आर्टिस्टो का जन्म-सिद्ध अधिकार है ।

हाल ही मे जामिया मिलिया इस्लामिया में मेरे लखनऊ के दिनो के एक मित्र मिले । मिलते ही उन्होने पूछा "बीड़ी पियोगे" ?
"नेकी और पूछ-पूछ" ?
फिर हम बीड़ी पीते रहे और घंटों कालेज के दिनों को याद करते रहे।
फिलहाल अब तो बीड़ी का शौक छूट गया है लेकिन फिर भी कभी कश लेता हूँ तो लखनऊ आर्ट काॅलेज और वहाँ के बिछड़े दोस्त याद आ जाते हैं ।

-सम्राट विद्रोही


Wednesday, May 3, 2017

यायावर की डायरी -1

यहाँ शायद ही कोई ऐसा होगा जो घूमने-फिरने का शौकीन न हो । ट्रैवलिंग एक तरह का आर्ट है जिसकी एबीसीडी फैमिली ट्रिप से शुरू होती है । फैमिली के साथ तीर्थ-स्थान पर भ्रमण ट्रैवलिंग की एलकेजी है । एक उत्तर भारतीय के लिए अयोध्या, काशी, मथुरा-वृंदावन और वैष्णो-देवी आइडल फैमिली ट्रिप होते है । फिर स्कूल-कालेज टूर मे जयपुर, लखनऊ, खजुराहो, पटना और कलकत्ता जैसे ट्रिप मे हमे कुछ जानने सीखने का हुनर मिलता है । दोस्तो के साथ गोवा, जैसलमेर मुम्बई पाण्डुचेरी जैसी भिन्न सांस्कृतिक डेस्टिनेशन पे मौज मस्ती हमारे घूमने के भूख को जगाती है । ये ऐसी जगहे है जहाँ से घूम कर आपकी ट्रैवलिंग की क्षमता, प्लेजर को बढ़ाती है इसी रास्ते से होके आप बैकपैकर्स बनते हैं । आज की व्यस्त लाइफस्टाइल मे घूमना फिरना थोड़ा खर्चीला और टाइम टेकिंग हो जाता है इस बात को समझते हुए ट्रैवलिंग का एक बाजार खड़ा हो गया है । अब तमाम ट्रैवलिंग एजेंसिया खुल गयी है जो आपके बजट मे पैकेज उपलब्ध करवाती है लेकिन इसकी लिमिटेशन एक बड़ी खामी है । मेरे मुताबिक एक अच्छे ट्रैवलर को इन पैकजो से बचना चाहिए । आमतौर पर लोग ट्रैवलिंग को खर्चीला शौक मानते हैं बेशक ये है लेकिन इतना भी नही जितना हम सोचते हैं । यायावरी मैनेजमेंट और शौक के बीच की कला है जिसमे पारंगत होने मे थोड़ा वक्त लगता है तो अगर आप एक ट्रैवलर बनना चाहते है तो मैं आपको बताऊँगा किस तरह आप कम से कम खर्चे मे ट्रैवलिंग का पूरा आनंद ले सकते हैं ।

1- ट्रैवलिंग मे हर तरह की तकलीफो से जूझने को मेंटली प्रिप्रेयर्ड रहिए मसलन, भीड़-भाड़ और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते वक्त नखरे न कीजिए ।

2- अगर आप कई जगहो की ट्रिप पे निकले हैं लम्बी दूरी के लिए रात का सफर कीजिए, इससे आप होटल के खर्चे से बचेंगे ।

3- बड़े रेस्टोरेंट के बजाए लोकल फूड का स्वाद लीजिए ये आपका बजट भी मैंटेन रखेगा और आप लोकल कल्चर को अच्छे से समझ पाएंगे ।

4- होटल लेते वक्त जम कर मोलभाव कीजिए ।

5- सामान कम से कम रखिए  ।