रात की खामोशियों में जब पूरा शहर सो रहा होता रैम्ब्रांट, मोने-माने, विंची, माइकेएंजलो, टर्नर और पिकासो जी उठते, उनकी कृतिया बोल उठती । मोनालिसा न जाने कितनी बार हम लोगो के साथ सिस्टाइन चैपल (एमएफए वाली खंडहर) के नीचे बैठकर बीड़ी पीती । गुएर्निका अपना दुखड़ा सुनाती ।
भगत सिंह ने किसी किताब मे कहा था कि कवि कलाकार और क्रांतिकारी एक ही पदार्थ से बने होते है साथ ही उन्होने सिगरेट और क्रांतिकारी जीवन पर भी एक सकरात्मक लाइन बोली थी ।
शायद यही वजह है कि कभी मेरे मन में ये ख्याल नही आया कि बीड़ी पीना बुरा है । हाँ ! कुछ लोग इसे खराब स्टेटस की पहचान मानते हैं तो वो ठेंगे से । हमारे काॅलेज के लाखों कमाने वाले कई प्रोफेसर तो बकायदा खैनी रगड़ के खाते थे और इस बात का अक्सर हम लोग मजाक बनाते थे । हम लोगो को तो लगता था कि तंबाकू सेवन तो आर्टिस्टो का जन्म-सिद्ध अधिकार है ।
हाल ही मे जामिया मिलिया इस्लामिया में मेरे लखनऊ के दिनो के एक मित्र मिले । मिलते ही उन्होने पूछा "बीड़ी पियोगे" ?
"नेकी और पूछ-पूछ" ?
फिर हम बीड़ी पीते रहे और घंटों कालेज के दिनों को याद करते रहे।
फिलहाल अब तो बीड़ी का शौक छूट गया है लेकिन फिर भी कभी कश लेता हूँ तो लखनऊ आर्ट काॅलेज और वहाँ के बिछड़े दोस्त याद आ जाते हैं ।


