Thursday, December 9, 2021
तालिबान 2.0 और समकालीन राजनीति
कहते हैं महाभारत खत्म होने पर जब शकुनि के षणयंत्र का पता चला तब गांधारी ने अपने भाई को ही श्राप दे डाला कि जिसके षणयंत्र से भारत-भूमि में इतना रक्तपात मचा है उस शकुनि के खुद के देश गांधार (तात्कालिक अफगानिस्तान) में कभी शांति नही रहेगी । अब इसे गांधारी का श्राप कहें या राजनैतिक और भौगोलिक परिदृश्य, अफगानिस्तान हमेशा से बारूद का ढेर पर ही बैठा रहा ।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन के शपथ ग्रहण से ही अटकलें लगाई जा रही थी कि अफगानिस्तान से अमेरिका के बोरिया-बिस्तरा बांधने में अब ज्यादा दिन नही बचे । लम्बे समय से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में लोकतंत्र की दुहाई और चरमपंथ की मनमानी की गर्मागर्म बहस के बीच अफगानिस्तान कुछ इस तरह फंसा रह गया कि जब असल मुसीबत दबे पाँव उसकी दहलीज पर दस्तक देने लगी तो अफगानी आवाम को संभलने तक का भी मौका नही मिला । रात की खामोशीं मे अशरफ गनी चुपचाप देश छोड़कर भाग जाते हैं तो वहीं अत्याधुनिक हथियारों से लैस लाखों की तादाद में अफगानी सेना महज पचहत्तर हजार की संख्या वाले तालिबानी लड़ाको के आगे घुटने टेक देती है । अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसियों को तड़कता-भड़कता मसला मिल गया, चरमपंथियों को सत्ता मिल गयी, अमेरिका को वादाफरामोशी के लग रहे आरोपो से निजात मिली, पाकिस्तान को उम्मीद मिली, चाइना और रशिया को कूटनीतिक जीत मिली । हर किसी को अपने-अपने फायदे की जरूरत भर चीजें मिल गयी लेकिन इन सबके बीच अफगानी आवाम को जिस दर्द से गुजरना पड़ा उसके बारे में न्यूज एंकर और यूएन के पदाधिकारी एक्साइटमेंट और गुस्से में कुर्सियों पर उछल कर चिल्लाने से ज्यादा कुछ कर नही पाए । जिस वक्त अफगानिस्तान को यूएन और शांति के हिमायतियों की सबसे ज्यादा जरूरत थी उस वक्त वो सभी बगले झांकते नज़र आए ।
काबुल एयरपोर्ट पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलती रही और दुनिया के शांतिदूत शांति से सोते रहे । तुर्की, तजाकिस्तान, पाकिस्तान, रशिया, चाइना और ईरान अपने अपने फायदे के लिए अफगानी बिसात पर अपनी-अपनी मुहरें चलते रहे । भारत
जैसे शांतिदूत देश भी निंदा बम की बरसात कराकर आखिरकार तालिबान को
मान्यता देने वाली फेहरिस्त में शामिल हो ही गया ।
ये जो नयी जेनरेशन के युवा है इन्हे कुछ वक्त तो ये समझने में गुज़र गया कि आखिर तालिबान के नाम का इतना खौफ क्यों फैला हुआ है ? दुनिया में हर महीने किसी न किसी देश में तख़्तापलट तो होता ही रहता है । हाल ही में अफ्रीकी देश माली में तख्तापलट हुआ । अफ्रीका के ही गिनी में अभी पिछले हफ्ते सैनिक विद्रोह हुआ जिसमें राष्ट्रपति अल्फा कोंडे को गिरफ्तार कर
तख्तापलट की घोषणा की गयी । पिछले साल पड़ोसी मुल्क बर्मा में भी सैनिक तख्तापलट हुआ लेकिन जितनी चर्चा, अफवाहें, सरगर्मियाँ तालिबान को लेकर फैली उतनी किसी और की नही ।
आखिर तालिबान को लेकर ऐसा क्या ही मसला है कि सिर्फ अफगानी आवाम ही नही बल्कि समूची दुनिया इस बात से हैरान-परेशान हो उठी ।
कौन है ये तालिबान, कहाँ से आया है तालिबान ? और क्यों इतना उत्पात मचा रहा हैं जिसकी गूंजे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के कान खड़े किए हुए है ।
दिल्ली के जेएनयू की शोध छात्रा रशिदा अब्बास 70 के दशक में काबुल यूनिवर्सटी में पढ़ने वाली अपनी दादी की तस्वीर दिखाते हुए कहती हैं कि वो वक्त अफगान इतिहास का सुनहरा वक्त था जब अफगानी औरतें अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकती थी । कपड़ो पर कोई बंदिश नहीं थी लेकिन आज का दौर देखकर यही कह सकते हैं कि जब पूरी दुनिया विकास की दिशा में आगे बढ़ रही है तब उस दौर में अफगानिस्तान वक्त के दायरे में पीछे की तरफ बह रहा है । वापस अपने मुल्क जाने के सवाल पर रशिदा भावुक हो जाती हैं और कहती हैं कि अपने मुल्क से किसे मुहब्बत नही होती लेकिन जिन हालातों से अफगानिस्तान जूझ रहा है वहाँ वापस जाने का सवाल ही नही उठता ।
अफगानिस्तान में तालिबान
'सोवियत-अफगान फ्रेंडशिप ट्रिटी' के तहत सोवियत का 1978 में अफगान में
घुसना एक महत्वपूर्ण घटना थी । सोवियत की साम्यवादी विचारधारा इस्लाम की
विचारधारा से कुछ हद तक समानता रखती है । दोनो ही समान अधिकार की बात करते हैं ।
गौरतलब है कि 1979 में यूएसए-सोवियत का शीत युद्ध अपने चरम था । दोनो ही देश अपना विस्तार करने और एक दूसरे को नीचा दिखाने की भरसक कोशिश कर रहे थे । एक तरफ यूएसए नाटो तैयार कर रहा था तो दूसरी तरफ सोवियत वारसा तैयार कर रहा था । 90 के दशक में सोवियत अफगानिस्तान छोड़ने को तैयार हुआ उस वक्त फैली अव्यवस्था और अफरा-तफरी में चरमपंथियों को
अपनी राह प्रशस्त करने का मौका मिला । मुल्ला नामक एक मौलवी ने 50 छात्रों जिन्हें पाश्तो भाषा में तालिबान कहते हैं को लेकर 'तहरीक ए तालिबान' की नींव डाली । सोवियत युद्ध के मुजाहिदों ने तालिबान को सर-आँखो पर बैठाया ।
इस संगठन को सऊदी और पाकिस्तान का समर्थन हासिल था । पाकिस्तान की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर अली भुट्टो के शौहर आसिफ अली जरदारी का बहुत बड़ा हाथ रहा । बहरहाल, सोवियत के जाने के बाद पाकिस्तान में मजबूत हुआ तालिबान अफगानिस्तान पर टोटल कंट्रोल के लिए काम करने लगा । शुरू शुरू में अफगानी कबिलाई को बड़ा मजा आया । उनको लगा कि जैसे मुल्ला उमर के अक्श में मुहम्मद का नूर उतर आया हो । उन लोगो ने मुल्ला को खुल्ला समर्थन दे डाला । लेकिन तालिबान ने पाॅवर आते ही अपना असल-रंग रूप दिखाना शुरू कर दिया । जिस तरह भस्मासुर ने शिव से घातक वरदान प्राप्त कर लेने के बाद उन्हें ही भस्म करने के लिए दौड़ा लिया । तालिबान ने भी अपने ही समर्थको पर अत्याचार शुरू कर दिए । लोगो को लम्बी दाढ़ी रखने के लिए मजबूर किया गया । आधुनिक शिक्षा पद्धति को नष्ट किया गया । यहाँ तक कि
मनोरंजन के साधनों पर भी प्रतिबंध लगाए गये । अब अफगानियों के पास सिवाए पछतावे के कुछ नही बचा था । खौफ का यह धंधा 1996 से 2001 तक चलता रहा । तालिबान का यह नंगा नाच तब तक चलता रहा जबतक उसने ओसामा बिन लादेन को पनाह नही दी, जिसने ट्विन टाॅवर को ध्वस्त करके सीआईए और एफबीआई की रडार में खुद को तालिबान और अलकायदा सहित झोंक नही दिया ।
2001 में ट्विन टाॅवर (वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन) पर हमले से बौखलाया अमेरिका अपनी नाटो सेना लेकर अफगानिस्तान में घुसता चला आया । और यहीं से तालिबान की उल्टी गिनती शुरू हो गयी ।
तालिबान का रक्त रंजित कृत्य
पिछले हफ्ते ही ख़बर आई कि पूर्व उपराष्ट्रपति अमरूल्ला सालेह के भाई का तालिबान ने पंजशीर में बेरहमी से कत्ल कर दिया गया । जिस मुल्क के सियासतगर्द ही महफूज़ न हो उस मुल्क के आवाम की सुरक्षा का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है ।
1996 से 2001 के बीच तालिबान ने शरिया कानून के नाम पर जो कहर बरपाया है उसकी कोशिश यही रहेगी कि इस बार की सत्ता पिछले से इक्कीस ही हो उन्नीस न हो । धार्मिक कट्टरता के मामले में तालिबान ने बाकी सभी को पीछे छोड़ दिया है । दुनिया भर के तमाम मानवाधिकार संगठन भी इस बर्बरता के सामने बेबस नज़र आए ।
तालिबान की कार्य-पद्धति पूरी तरह शरीयत पर आधारित है । पाकिस्तान की खुफिया एंजेसी आईएसआई और सऊदी अरब ने तालिबानी को फंडिंग और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराकर जेहाद के लिए तैयार किया है ।
अफगानिस्तान की युवा बाॅक्सर सीमा रेजाई इस वक्त बहुत डरी हुई हैं । वजह !
उनका गुनाह । और गुनाह भी क्या कि, उन्होने एक राष्ट्र के रूप में अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व लेने का सपना देखा
सीमा रेजाई वर्तमान नेशनल लाइटवेट चैंपियन हैं और अब वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने मुल्क की नुमाइंदगी करना चाहती है लेकिन अगस्त में हुए तख्तापलट के बाद से तालिबान ने ऐसी महिलाओं को खोजना शुरू कर दिया है जो बकौल शरिया कानून के खिलाफ कोई काम कर रही हैं । तालिबान को मालूम हुआ कि सीमा पुरूष कोच से ट्रेनिंग ले रही है इस बात पर उसने फतवा जारी कर दिया ।
अब सीमा अपना मुल्क छोड़कर कतर की शरण में है और अमेरिका से गुहार लगा
रही हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे ।
दरअसल तालिबान के अपने कायदे-कानून हैं जिसे वो शरियत का नाम देकर आम लोगो पर थोप रहा है । उसके इस कानूनों की कुछ झलकिया देखिए-
• हिजाब पहनना महिलाओं के लिए बेहद जरूरी करना और गलती से भी शरीर का कोई अंग दिख जाने पर सरेराह महिला की पिटाई करना
• प्रेम करने और प्रेमी के साथ भाग जाने पर बीच चौराहे पत्थरों से पीट पीट कर मार डालना
• 11 साल से ऊपर बच्चियों की शिक्षा बंद करना
• पुरूष डाॅक्टर द्वारा महिला मरीज की जाँच करने पर प्रतिबंध लगाना
• क्लीन शेव करने पर कोड़े मारना
• महिलाओं को घर में कैद रखना और उन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन समझना
इस तरह हम देख सकते हैं कि तालिबानी कायदे किस तरह मानव विरोधी विचारों को प्रोत्साहित करता है । और हिंसा के नोक पर लोगो को ज़लालत की जिंदगी जीने पर मजबूर कर रहा है ।
अंतरराष्ट्रीय बिरादरी चुप क्यो है ?
हम देखते हैं इस संगीन मसले पर लोग हल्ला तो मचा रहे हैं लेकिन जब इस दिशा में कुछ करने की बात आती है सारे अंतरराष्ट्रीय संगठन मुँह में दही जमाए बैठ जाती है । सच तो ये है कि किसी को भी अफगानी आवाम के दर्दो-गम से कोई लेना देना नही है । हर कोई बस अपने फायदे के लिए पक्ष-विपक्ष का पाला चुन लेते हैं । साढ़े तीन हजार साल पहले भारत में पहली घुसपैठ से लेकर सिंकदर,
सेल्यूकस, डेरियस (दारा), शक, हूण, और कुषाण जैसे गैर मुस्लिम समुदायों ने
अफगान को लूटा उसके बाद इस्लाम के उदय के साथ ही बर्बरता अपने चरम पर
आने लगी । पूर्व मध्यकाल में तुर्क, मंगोल और फारसी शासकों ने भी अफगान को लूटा भी और अपना घर भी बनाया । विभिन्न संस्कृतियों के लोग वहाँ आते भी रहे और जाते भी रही । इससे वहाँ की मूल संस्कृति कभी सहेजी ही न जा सकी । भारत और फारस के बीच का ये भूभाग हमेशा रण क्षेत्र ही बना रहा । प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर ये ज़मीन हमेशा शोषण की पनाहगाह बनी रही ।
आधुनिक युग में लीथियम का आकूत भंडार की खबर होने पर अमेरिका, यूरोप और चाइना की नज़र अफगानिस्तान पर लम्बे समय से गड़ी रही है । यही वजह है कि कोई भी देश ये नही चाहता कि वहाँ शांति बहाल हो । फिलहाल वहाँ विश्व समुदाय तीन फाड़ में बट चुका है
• चाइना, रशिया, पाकिस्तान
• ब्रिटेन, भारत, अमेरिका
• तुर्की सऊदी ईरान
चाइना, रशिया और पाकिस्तान अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर ललचाई नजरो से मुँह खोले तालिबान को समर्थन दे रहे हैं ताकि वक्त आने पर
उसका दोहन किया जा सके ।
ब्रिटेन, भारत और अमेरिका लोकतंत्र और शांति के पक्षधर बन तालिबान का लगातार विरोध कर रहे हैं
तुर्की, सऊदी और ईरान एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने के हसीन सपने देख रहे हैं ।
तालिबानी युग में मानवाधिकार
वर्तमान समय में मानवाधिकारों की जितनी धज्जिया तालिबान ने उड़ाई है उतनी आधुनिक दुनिया में कही भी देखने को नही मिलती । स्वतंत्रता के अधिकारों का
लगातार मखौल उड़ाया जा रहा । मानव के नैतिक जीवन मूल्यों को कोई कद्र नहीं
बची है । मोस्ट वांटेड आतंकी सवैंधानिक पदो पर असलहें लहराते बैठे हुए हैं ।
महिलाओ को घरों में कैद किया जा रहा है । शरिया कानून की अवहेलना पर उन्हें पीटा जा रहा । सड़को पर गोलियाँ चलाई जा रही । पूर्व में बनाए गये सारे संस्थान नष्ट किए जा रहे । आपको याद होगा तालिबान की पिछली सरकार में बामियान में बुद्ध की सबसे बड़ी मूर्ति को तोप और गोलियों से पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था । तालिबानी अपने विचार के अलावा किसी दूसरे विचार को बर्दाश्त नहीं करते । यह लोकतंत्र के लिए कलंक है । तालिबान के वापस आने से अफगानिस्तान फिर से अंधेरे समय में खोता दिख रहा है ।
कुछ दिन पहले ही काबुल यूनिवर्सटी में महिलाओं के ड्रेस कोड की ऑफिशियल घोषणा की गयी साथ ही उन्हें शरिया कायदे से जिंदगी गुजारने की जबरन शपथ भी दिलाई गयी । लड़के और लड़कियों के साथ पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गयी । एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए यह अफगानिस्तान के लिए काले दिनों की शुरूआत है ।
अव्वल होना तो ये था कि इसमें विश्व समुदाय को अफगान की सहायता के लिए यूएन आर्मी को पंजशीर के समर्थन हेतु भेजना चाहिए था । लेकिन अंतरराष्ट्रीय
कूटनीति और चाइना के बढ़ते वर्चस्व को चुनौती देने के लिए कोई भी तैयार नहीं है । जिस वक्त अफगानिस्तान को विश्व बिरादरी की सबसे ज्यादा जरूरत थी उस वक्त लोगो ने उससे मुँह फेर लिया ।
हमने देखा कि जिद, पागलपन, धर्मांधता, लालच के बीच किस तरह के हालातों से अफगानिस्तान जूझ रहा है । सोवियत, अमेरिका, चाइना के सम्राज्यवादी विस्तार ने अफगानिस्तान को अपने पैरो पर खड़े नहीं होने दिया तो वहीं चरमपंथियों के गुट ने इस कमजोरी का फायदा उठाकार हालात को और
विध्वंसक बना डाला है ।
रशिदा और सीमा जैसी हजारों-लाखो महिलाओं का भविष्य अंधेरे में हैं, उन्हें अपने भविष्य के लिए भारत और अमेरिका सहित विश्व समुदाय की सहायता की जरूरत है । बंद कमरों में महिलाएँ डिप्रेशन की तरफ ढकेली जा रहीं हैं । अब भी अगर मानवता के हित के लिए कोई निर्णायक फैसला नही लिया गया तो आने वाले समय में यह चरमपंथियों के लिए एक मिसाल बनेगा और उन्हें अपने विचार आम लोगो पर थोपने का प्रोत्साहन मिलेगा । इसे समय रहते रोक लेना चाहिए अन्यथा बाकी विश्व में लोकतंत्र पर संकट गहराते दिखने शुरू हो जाएंगे ।
संदर्भ:
1-बीबीसी न्यूज
2- द क्विंट
3- विकिपीडिया
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