Thursday, July 22, 2021

संस्कृति के विनाश में भाषा की भूमिका

प्रसिद्ध अश्वेत अमेरिकी उपन्यासकार टोनी माॅरिसन भाषा के संदर्भ में एक कहानी कहतीं हैं । कहानी का सार ये है कि एक समय किसी अमेरिकी शहर के बाहर एक बूढ़ी महिला रहती थी । वो महिला आँखों से लाचार और किसी गुलाम की बेटी थी । महिला अपने घर में अकेली रहती थी । महिला बहुत ज्ञानी थी और लोगो को उसकी विद्वता पर कोई संदेह नही था । एक दिन कुछ युवा उस बूढ़ी महिला का मखौल उड़ाने के लिए उसके घर आते हैं । उनमें से एक लड़के ने उस महिला से पूछा कि उसके हाथ में एक चिड़िया है, वो चिड़िया जिंदा है या मरी हुई है ?
चूँकि वो महिला देख नही सकती थी, इसलिए चुप रही । इसपर लड़के हँस पड़े । आखिरकार उस महिला ने जवाब दिया 'मैं ये तो नही जानती कि जो चिड़िया आपके हाथ में है वो जीवित है या मृत किंतु मैं इतना जरूर जानती हूँ कि उसका जीना-मरना जरूर आपके हाथ में है । महिला के जवाब का अर्थ यह था कि अगर चिड़िया मरी हुई है तो या तो वो पहले से मरी थी या फिर उन लड़कों ने उसे मारा था । और अगर चिड़िया जीवित है, तो वो उसे मार सकते हैं । टोनी माॅरिसन उस चिड़िया को भाषा के रूप में देखतीं हैं और वृद्ध महिला को लेखिका के रूप में । उस महिला की चिंता यह थी कि जिस भाषा के बारे में वो सोच रही है उसका अस्तित्व कुछ ऐसे लोगो के हाथ में है जो उसे इस्तेमाल या मजे करने की वस्तु बना देना चाहते हैं । उन युवाओं को चिड़िया रूपी भाषा की कोई चिंता नही थी । ऐसे हास्य और मनोविनोद के तहत भाषा की हत्या हो सकती है । आज के दौर में भाषा की जिम्मेदारी उन लोगो के हाथ में है जो भाषा के सही प्रयोग को लेकर एकदम नाॅनसीरियस हैं । किसी भी भाषा के नष्ट होने के लिए उस भाषा को बोलने वाला ही जिम्मेदार होता है । सिन्धु घाटी लिपि और ब्राह्मी लिपि के विलुप्त होने के लिए भी वही लोग जिम्मेदार थे जो उस भाषा और लिपि का इस्तेमाल करते थे । अमेरिकी महाद्वीप में उपनिवेशवादी ताकतों के घुसने के बाद अमेरिका के मूल निवासियों का बुरी तरह सफाया किया गया । आज आप इंका, माया और एज़टेक सभ्यताओं की इमारतों को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दे दें लेकिन खुला सच ये भी है प्राचीन अमेरिका के मूल निवासियों की संस्कृति की हत्या का इल्ज़ाम भी उनपर ही है जो आज उन्हे संरक्षित करने की बात कह रहे हैं । यूरोपीय घुसपैठियों ने संवाद के लिहाज से बस इतना ही प्रयास किया कि मूलनिवासियों की भाषा में उन्हें गुलाम बनाए जाने और हुक्म बजाए जाने भर तक ही प्रोत्साहन दिया गया । अंग्रेजी, पुर्तगाली, फ्रेंच और स्पेनिश जैसी यूरोपीय भाषाओं ने उनकी संस्कृति और उनकी भाषा को इस कदर नष्ट किया कि आज सम्पूर्ण अमेरिकी महाद्वीपों पर (उत्तर और दक्षिणी) पर अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली और स्पेनिश भाषाओं का ही बोलबाला है । चाहे वो ब्राजील हो, इक्वाडोर हो, अर्जेंटीना हो, बोलीविया हो हर जगह प्राचीन अमेरिकी भाषाओं की जगह यूरोपीय भाषाओं ने ले लिया है । यूएसए (यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका) का तो पूछना ही नही । जिस देश, महाद्वीप का नामकरण ही यूरोपीय खोजकर्ता 'अमेरिगो वेस्पूची'  के नाम पर हुआ हो उस धरती की खुद की संस्कृति का कितना ख्याल रखा गया होगा, आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं । आज इतिहास के विद्यार्थियों के अलावा ज्यादातर युवाओं को मालूम ही नही कि वर्तमान अमेरिका में ब्रिटिश मूल के लोग ही बहुसंख्यक हैं और मूल अमेरिकी अल्पसंख्यक ।
यही वजह है कि फिल्म की दुनिया के सबसे बड़े अवार्ड एकेडमी अवार्ड में ब्रिटेन की इंग्लिश फिल्में यूएसए की कैटेगरी में ही नामांकन करती है । स्लमडाॅग मिलेनियर, लाइफ ऑफ पाई, गाँधी (1892) कुछ ऐसी ही ब्रिटिश फिल्में थी जिन्हें यूएसए की कैटेगरी में अवाॅर्ड मिला था । खैर, अमेरिकी महाद्वीप का जो हाल रहा है, ठीक यही हाल ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का रहा है । आस्ट्रेलियाई द्वीप पपुआ न्यूगिनी और आस्ट्रेलिया के लोगों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर आपको ये बात स्पष्ट हो जाएगी ।
इसी तरह ब्रिटिश भारत में ऐसे तमाम ट्राइब्स समुदाय को साफ़ कर दिया गया जो अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए । पिंडारी, ठग कुछ ऐसी ही जातियाँ थी । अपनी जन्म-भूमि और कर्मभूमि को दमनकारी, शोषक आक्रमणकारियों से बचाते-बचाते दुनिया भर के तमाम मूलनिवासी अपनी संस्कृति को खो दिए और खुद भी नष्ट हो गये । बचे हुए इन मूल निवासियों को अपनी संस्कृति और भाषा बचाने के लिए बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ी उन मूलनिवासियों ने जब अपनी भाषा को बचानें के लिए आवाज उठाने की कोशिश की तब उन्हे गोलियाँ खानी पड़ी । उनकी अपनी जुबान में जीवन को निर्देशित करने और प्रेम अभिव्यक्ति के कितनें शब्द, कितने प्रसंग, कितनी जानकारियाँ जिंदा रह सकती थी । लेकिन दुर्भाग्य से दमन, शोषण और लूट की हवस ने एक पूरी जीती जागती संस्कृति को नष्ट करके समूची दुनिया का जो नुकसान किया है उसे कभी भरा नही जा सकता । हम स्पष्ट रूप से देख सके हैं कि किस तरह ब्रिटेन, फ्रांस और स्पेन ने अपनी-अपनी भाषाओं को प्रोत्साहन देने के नाम पर दुनिया भर के विभिन्न भाषाओं का रक्तपात किया है । उसके उलट हिन्दी और चीनी भाषा ने किसी भाषा या बोली को नुकसान पहुचाएँ बिना दुनिया के शीर्ष भाषाओं में अपनी जगह सुनिश्चित की हुई है । भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में
पिछले 60 साल में भारत की क़रीब 20 फीसदी भाषाएं विलुप्त हो गई हैं । 60 साल पहले यानी 1961 की जनगणना के बाद 1652 मातृभाषाओं का पता चला था । उसके बाद ऐसी कोई लिस्ट ही नहीं बनी । उस वक़्त माना गया था कि 1652 नामों में से क़रीब 1100 मातृभाषाएं ही अस्तित्व में थीं क्योंकि कई बार लोग ग़लत सूचनाएं दे देते थे । वडोदरा के भाषा शोध और प्रकाशन केंद्र के सर्वे के मुताबिक यह बात सामने आई है । 1971 में केवल 108 भाषाओं की लिस्ट ही सामने आई थी क्योंकि सरकारी नीतियों के हिसाब से किसी भाषा को लिस्ट में शामिल करने के लिए उसे बोलने वालों की तादाद कम से कम 10 हज़ार होनी चाहिए । इसे भारत सरकार ने कटऑफ़ प्वाइंट स्वीकार किया था । 'पीपुल लिंगुइस्टिक सर्वे' के मुख्य संयोजक गणेश डेवी कहते हैं कि जब उन्होनें सर्वे किया तब उन्हें 1100 में से सिर्फ़ 780 भाषाएं ही देखने को मिलीं । वो मानते थे कि शायद उनसे 50-100 भाषाएं रह गईं हों क्योंकि भारत एक बड़ा देश है और यहां 28 राज्य हैं । उनके पास इतनी ताक़त नहीं थी कि वो पूरे देश को कवर कर सकें । उनके पास सिर्फ़ तीन हज़ार लोग ही थे और उन्होनें चार साल तक काम किया । उन्होनें स्वीकारा कि इस काम के लिए बहुत से लोग चाहिए थे । वो कहते हैं कि हम यह मान भी लें कि हमें 850 भाषाएं मिल गईं हैं तब भी 1100 में से 250 भाषाओं के विलुप्त होने का अनुमान है । भाषाओं का इतिहास लगभग 70 हज़ार साल पुराना है जबकि भाषाएं लिखने का इतिहास सिर्फ़ चार हज़ार साल पुराना ही है । इसलिए ऐसी भाषाओं के लिए यह संस्कृति का बहुत बड़ा नुकसान है । ख़ासकर जो भाषाएं लिखी ही नहीं गईं और जब वो नष्ट होती हैं, तो यह बहुत बड़ा नुकसान होता है । यह सांस्कृतिक नुकसान तो है ही, साथ ही आर्थिक नुकसान भी है । भाषा आर्थिक पूंजी होती है क्योंकि आज की सभी तकनीक भाषा पर आधारित तकनीक हैं । हर संस्कृति का अपना खुद का विज्ञान होता है, विश्व-विज्ञान दुनिया के अलग अलग संस्कृतियों से जरूरत का ज्ञान हासिल करता है, फिजिक्स, केमेस्ट्री, बायोलाॅजी, गणित, खगोलशास्त्र, दर्शनशास्त्र और साहित्य जैसे ज्ञान के अलग-अलग क्षेत्र अलग-अलग संस्कृतियों में भिन्न रहे हैं । सुमेरियन, बेबीलोनियन, मिस्र, मोसोपोटामिया, चीनी जैसी सभ्यताओं से दुनिया ने कितना कुछ सीखा है ऐसे में किसी संस्कृति की भाषाओं का लुप्त होना एक आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक नुकसान होता है । भारत में जो भाषाएँ लुप्त हुई उसकी खास वजह लोगो का अपने मूल स्थान से पलायन करना है । सिंधु घाटी के लोगो का आर्यों के हमलें या फिर पर्यावरणीय बदलाव की वजह से प्रायद्वीप के आंतरिक हिस्सों में पलायन हुआ और आर्यों की भाषा संस्कृत का प्रसार भी स्थानीय भाषा के लिए नुकसानदायक साबित हुआ । वर्तमान समय में जंगलों को साफ़ करके आदिवासियों को शहरों की तरफ विस्थापित करना भी एक बड़ी वजह है उनके मूल भाषा के विलुप्त होने में । ऐसे ही तटीय इलाक़ों के लोग 'सी फ़ार्मिंग' की तकनीक में बदलाव आने से शहरों की तरफ़ चले गए. उनकी भाषाएं भी विलुप्त हुईं । दूसरे जो डीनोटिफ़ाइड कैटेगरी है, यानि कि बंजारा समुदाय के लोग, जिन्हें 'अनसिविलाइज्ड' माना जाता था । वे अब शहरों में जाकर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहे हैं । आपने भी सड़कों पर अज़ीब से कपड़े पहने, भीख़ मांगते, या फुटपाथ पर फेरी लगाकर कुछ सामान बेचतें लोगो को जरूर देखा होगा जिसकी हिन्दी भी थोड़ी अटपटी मालूम पड़ती है जैसे हिन्दी में किसी और भाषा का टोन मिलाकर बोल रहे हों, कभी सोचिएगा ये कौन लोग हैं, कहाँ से आएँ हैं ? इस सवाल का जवाब खोजनें में आपको भाषा और संस्कृति संबंधी बहुत से तथ्य जानने को मिलेंगे । ऐसे कुल 190 से ज्यादा समुदाय हैं, जिनकी भाषाएं बड़े पैमाने पर लुप्त हो गईं हैं । हर भाषा का अपना एक 'इकोलाॅजी होता है । और जब कोई एक भाषा लुप्त होती है, तो उसे बोलने वाले पूरे समूह का ज्ञान नष्ट हो जाता है । जो एक बहुत बड़ा नुकसान होता है, क्योंकि भाषा ही वो माध्यम है जिससे लोग अपनी परंपरा और संस्कृति को जिंदा रखते हैं । अंडमान निकोबार द्वीप समूह का एक छोटा सा आईलैंड 'सैंटियागो' अब तक बाकी दुनिया से अछूता रहा है । भारत सरकार ने उनसे संपर्क पर प्रतिबंध लगा रखा है । भविष्य में यदि कभी उनसे संपर्क होता है, उनकी भाषा और संस्कृति को समझने का मौका मिलता है तो संभव है भारत की प्राचीन सभ्यता को भी समझने के रास्ते खुल सकें क्योंकि हाल ही में हुए सिंधु घाटी की महिला नर-कंकाल के डीएनए रिसर्च से ये पुष्टि हुई है, कि भारत के प्राचीन अनार्य लोगो का डीएनए दक्षिण भारत और अंडमान निकोबार के निवासियों की डीएनए संरचना एक दूसरे से काफी करीब है ।
इस बात की प्रबल संभावना है, कि यदि उन्होंने अपने परंपरागत संस्कृतियों को बचा सकने में कामयाबी हासिल की है, तो भारत के इतिहास में दफ़्न हो चुके उस गौरव को प्रकाश में लाया जा सकता है जो हमारे लिए आज भी अनसुलझी पहेली बनी हुई है । हमनें ये भी देखा कि किस तरह दमनकारी भाषाएँ किसी स्थानीय भाषाओं की हत्या करती हैं, जरूरी नही ये हत्यारी भाषाएँ हर बार आक्रमणकारी के रूप में ही आए । कभी कभी भाषाएँ धर्म का लिबास पहन कर, तो कभी राष्ट्रवाद का मुखौटा लगाकर भी आतीं हैं, तो कभी फासीवाद और नस्लवाद के रूप में । वक्त रहते हमें भाषाओं को लेकर सह-अस्तित्व का नज़रिया अपना लेना चाहिए अन्यथा अनगढ़ या बची हुई पुरानी भाषा का लुप्त हो जाना तय है, जो भारत की विविधता के लिए अच्छा नही है । और मैंने पहले भी कहा है कि जब कोई भाषा विलुप्त होती है तो सिर्फ भाषा विलुप्त नही होती बल्कि पूरी संस्कृति विलुप्त होती है ।

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