Saturday, June 19, 2021
दर्द के चिलमन से झांकती उम्मीदें: शरणार्थी समस्या
आज के दौर में दुनिया एक भयावह स्थिति से गुजर रही है । अमरीका से लेकर अफ्रीका और एशिया जैसे विशाल महाद्वीप पर एकतरफा शोषण की जो चरम स्थिति बनी हुई हैं उसमें आम जन का एक बहुत बड़ा तबका विस्थापन की स्थिति से गुजर रहा है ।
धर्म के प्रति धर्म, नस्ल के प्रति नस्ल, विचारधारा के प्रति विचारधारा, संस्कृति के प्रति संस्कृति की जो असिष्णुता विगत शताब्दी से प्रसारित हुई है उसमें न जाने कितने लोगो को बद से बदतर हालातों में जीने को मजबूर होना पड़ रहा है ।
फिर वो चाहे सीरिया का मसला हो, यमन का मसला हो, तिब्बत का मसला हो, दक्षिणी सूडान का मसला हो, भारत-पाक का मसला हो अफगानिस्तान, सोमालिया या रोहिंग्या मुहलमानों का मसला हो, हर मसले में इंसान की पहचान कहीं से भी इंसान की रह ही नही गयी है । इंसान ही इंसान को विकट से विकट परिस्थियों में धकेल देने पर आमादा है बिना ये सोचे कि जिनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है उनकी रगों में भी वही खून बह रहा है जो हमारी रगों में है ।
धर्म, नस्ल, सम्प्रदाय, विचारधार और नैतिक मूल्य इंसानी लहू के कहीं ज्यादा बेशकीमती बना दिया गया है ।
खास तौर से खाए पिए अघाए वाले तबके में सिवाय दौलत के इंसानी मूल्यों की कोई कद्र नही बची है । उनके लिए दौलत दे सकने वाली कोई भी चीज ही इस दुनिया में अपना अस्तित्व बनाए रखने के सबसे अहम है । इंसानों की इसी हवस ने उसके मुँह में इंसानी खून लगा दिया है ।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद द्विधुर्वीय दुनिया ने अपने व्यक्तिगत 'इगो' को संतुष्ट करने, और संसाधनों की लूट के लिए तीसरी दुनिया में भंयकर तबाही मचाई । साथ ही शक्ति संतुलन के नाम पर उन्हें आपस में ही उलझाए रखा । उस आंतरिक 'काॅन्फ्लिक्ट' ने कालातंर में वीभत्स रूप अख़्तियार कर लिया ।
विश्वयुद्ध के बाद ईरान-इराक, भारत-पाक, कोरिया, वियतनाम में हम इसे बखूबी देख-समझ सकते हैं, कि किस तरह भाई-भाई ही आपस में दुश्मन बन गये और जमकर खून की होली खेली गयी । पूर्व मध्य एशिया और अफ्रीका में इसी नफ़रती माहौल में लोग पलायन करने को मज़बूर हैं ।
2015 में सीरिया के गृहयुद्ध और आईएसआइएस के साथ संघर्ष में अपना सब कुछ गँवा चुके एक कुर्द परिवार के दो वर्षीय बच्चे एलन कुर्दी की समंदर में डूब कर मृत्यु हो गयी थी । उसका परिवार उसके बेहतर भविष्य की तलाश में ग्रीस जा रहा था । एलन कुर्दी के डेड बाॅडी की तस्वीरें पूरी दुनिया में वायरल हुई । समंदर किनारे रेत में औंधे मुँह लाल टी-शर्ट में ढका वो मरा हुआ बच्चा शरणार्थी समस्या का प्रतिनिधित्व करता हुआ दिखाई दिया । एक सवाल था जो पूरी दुनिया के सोचने-समझने वाले इंसानों को झकझोर रहा था कि एलन कुर्दी की मौत का जिम्मेदार कौन है ?
ऐसे ही सीरिया की एक शरणार्थी बुजुर्ग महिला इम आदिल कहतीं हैं कि 'एक बूढ़ी दादी के लिए इससे बुरा क्या होगा कि जहाँ मुझे अपने नाती-पोतों के बीच होना चाहिए था, मेरा घर ध्वस्त हो चुका है, परिवार बिखर चुका है । मेरे पास अब कुछ नही बचा सिवाय लुट जाने का ग़म और दर्द से भरे दिल के'
ये बात इम ने यूनएनएचसीआर के कार्यकर्ताओं से कही थी ।
पिछले साल 30 दिसंबर 2020 यमन की नयी सऊदी समर्थित सरकार के मंत्रियों पर अदन में, जो कि यमन की नयी राजधानी बनी है में एक मिसाइल अटैक हुआ जिसकी लाइव रिपोर्टिंग करते हुए न्यूज़ रिपोर्टर अदीब-अल-जेनानी की मौत हो गयी । वहीं इस घटना में यमन के लोक निर्माण विभाग की उपमंत्री यास्मिन-अल-अवाधी की भी दर्दनाक मौत हो गयी । इस घटना के के लिए यमन के हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार माना गया जो ईरान समर्थित हैं । यमन इस वक्त सऊदी और ईरान के व्यक्तिगत दुश्मनी का कोप स्थल बन गया है ।
ऊपर दिए गये घटनाओं का गहनता से पड़ताल करने पर हम पाते हैं कि राजनीतिक संघर्ष और सत्ता लोलुपता से उपजे गृहयुद्ध ही उपरोक्त घटनाओं के जिम्मेदार हैं ।
सत्ता पाने की चाहत में जब दो पक्ष लड़तें हैं तो नुकसान हमेशा बेगुनाहों का ही होता है ।
फिर चाहे वो ईरान-सऊदी का प्राॅक्सी वाॅर हो या सीरिया का आंतरिक कलह । विपरीत विचारधारा की परस्पर लड़ाई ने सीरिया और यमन को युद्ध-क्षेत्र बना दिया है ।
वर्तमान में इस तरह के कलह ने लाखों लोगो को बेघर कर दिया है । यमन की बात करें तो अब तक यमन में एक लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं जबकि लाखों को अपना घर और देश छोड़कर भागना पड़ा है ।
अकेले सीरिया में तुर्की की सीमा से सटे इदलिब शहर जिसकी जनसंख्या जंग से पहले 15 लाख थी आज रिफ्यूजी कैंप होने की वजह से 30 लाख से ऊपर जा पहुँची है । पहले लोग आराम से सीमा पार कर तुर्की चले जाते थे लेकिन अब तुर्की ने अपनी सीमाओं की चौकसी बढ़ा दी है । तुर्की में अब तक 30 लाख शरणार्थी पनाह ले चुके हैं ।
UNHCR के आंकड़े देंखे तो सीरिया से मुल्क के बाहर पनाह लेने वालो की संख्या करीब 65 लाख से ऊपर है जबकि आंतरिक विस्थापन की संख्या 60 लाख से ऊपर मानी जा रही है ।
वर्तमान में 80 प्रतिशत सीरियन रिफ्यूजी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीना को मजबूर हैं ।
जिस यमन को कभी अरेबियन प्रायद्वीप का सबसे खुशहाल देश माना जाता था आज हालात ये है कि हर 8 में से एक यमनी विस्थापन का सामाना कर रहा है ।
इस जंग में सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं और बच्चों के भविष्य पर पड़ा है ।
सीरिया और यमन में विस्थापन समस्या आज मानवता के सबसे बड़े संकट के रूप में देखा जा रहा है ।
पूर्व-मध्य एशिया के अलावा अफ्रीका के दक्षिण सूडान, अफगानिस्तान, म्यांमार में भी विस्थापन के यही हालात हैं ।
इस पलायन की वजह से घरेलू और कामकाजी महिलाओं, और बच्चों के भविष्य पर तलवार लटकती नज़र आ रही है ।
कोरोना काल में उनकी मुश्किलें और भयावह रूप ले चुकी है ।
भारतीय परिप्रेक्ष्य की बात करें तो, भारत प्राचीन काल से भारत पश्चिम के लिए पनाहगाह रहा है । फिर चाहे वो आर्य रहे हों, यवन के लोग रहे हो, शक, हूण, कुषाण, पारसी और मध्यकाल में तुर्क, अरबी रहे हों । आज भी भारत शरणार्थियों को पनाह देने के मामले में अव्वल स्थान पर है ।
आजादी और बंटवारे के बाद उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भारत में अपने ही मुल्क में लोग 'रिफ्यूज़ी' हो गये । आजाद भारत ही नही बल्कि समस्त विश्व में बीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी बनकर उभरा ये बंटवारा ।
जिससे तकरीबन डेढ़ करोड़ लोग प्रभावित हुए ।
धर्म के आधार पर हुए बंटवारे में लाखों लोगो को अपना घर, खेत, गाँव-मुहल्ला छोड़कर जो हाथ आया समेट कर अंधेरे में रौशन भविष्य का सपना आँखों में निचोड़े भेड़ बकरियों की तरह काफिलों में ढूंस दिया गया । बंटवारे से भड़की सामप्रदायिक हिंसा में लगभग 10 लाख लोगो को जान से हाथ धोना पड़ा । ऐसी अमानवीय परिदृश्य शायद ही भारत ने कभी देंखे हो ।
1971 में बांग्लादेश के जन्म के साथ भारत ने एक बार फिर शरणार्थी समस्या का सामना किया ।
90 के दशक में कश्मीरी पंडितों का धर्म के नाम पर अपने घर से खदेड़ दिया जाना और उन्हें रिफ्यूजी कैंप में रहने के लिए मजबूर करना भी मानवीय संवेदनाओं की मौत का एक उदहारण है ।
हाल ही में म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश और भारत के लिए चुनौती बन कर उभरे हैं ।
अपना मुल्क छोड़कर किसी दूसरे देश में पनाह लेना एक अलग किस्म की समस्याएँ लेके आना होता है । किसी भी शरणार्थी के लिए नये मुल्क की नागरिकता हासिल करना बहुत पेचीदा और मुश्किल भरी प्रक्रिया होती है । बिना नागरिकता के उन्हें उस देश की कोई भी सुविधा मसलन स्वास्थय, शिक्षा या खाद्यान नही मिल सकता ।
किसी देश के लिए बाहर से आए शरणार्थियों को नागरिकता देना उनकी अस्मिता, अखण्डता और सुरक्षा पर सवालिया निशान भी लगाता है । ऐसे में अक्सर शरणार्थी हाशिए पर डाल दिए जाते हैं । और उनका हाल-खबर पूछने कोई नही आता । इसीलिए यहाँ मानवाधिकार संगठनों की जरूरत प्रासंगिक हो जाती है ।
स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर ऐसे ही संठगन शरणार्थी समस्याओं के हल के लिए उपाय खोजनें का प्रयास करते हैं ।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसंबर1950 में शरणार्थी समस्या के विस्तार को देखते हुए UNHCR यानी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त की स्थापना की ।
यूएनएचसीआर दुनिया भर के विस्थापितों से संबंधित आंकड़े जुटाता है ।
मसलन, किसी देश के कितने लोग देश के बाहर विस्थापित हुए हैं, और कितने आंतरिक विस्थापित हुए । महिलाओं-पुरूषों, बच्चो और बुजुर्गो की संख्या ।
इन्हीं आँकड़ो के आधार पर शरणार्थियों को सुविधाएँ मुहैया कराई जाती है । साथ ही ऐसे संगठन किसी देश के आंतरिक व बाहरी 'काॅन्फ्लिक्ट्स' का अध्ययन करता है जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने रखा सके और उस समस्या को हल करने का प्रयास किया जा सके । और विस्थापन समस्या का निस्तारण हो सके, ताकि किसी को अपना घर छोड़कर दर-बदर की ठोकरें न खानी पड़े ।
यूएनएचसीआर, एमेनेस्टी इंटरनेशनल, यूनीसेफ़ जैसे वैश्विक संगठन इस दिशा में सराहनीय पहल कर रहे हैं ।
हमनें देखा कि कि समकालीन विश्व में किस तरह शरणार्थी समस्या मानवीय संवेदनों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है ।
वैश्विक जनसंख्या का 1 प्रतिशत जनसंख्या सिर्फ सीरिया में विस्थापन का सामना कर रहा है । अगर इन समस्याओं का गहनता से अध्ययन करें तो पाएंगे कि एक सम्प्रदाय विशेष की सत्ता लोलुपता ने पूरी दुनिया में पहले भी तबाही मचाई है और आज भी कमोबेश पूरी दुनिया में तबाही मचा ही रही है । धर्मांधता को खत्म करने की दिशा में सार्थक कदम उठानें ही होंगे । मध्य-पूर्व एशिया में आइएसआइएस, अफ़गानिस्तान में तालिबान और म्यांमार में रोहिंग्या अपनी हठधर्मिता और धर्मांधता की वजह से पूरी दुनिया में मानवता के लिए खतरा बन कर उभरे हैं ।
यमन आज भुखमरी के कगार पर खड़ा है तो सवाल होना चाहिए कि क्यों खड़ा है ?
अफगानिस्तान, सीरिया, सूडान आज बर्बादी के राह पर खड़ा है तो सवाल होना चाहिए कि क्यो खड़ा है ?
चंद लोग जब जब पूरे हूजूम पर हूकूमत करने, उनकी खून-पसीनें की कमाई पर ऐश उड़ाने का ख्वाब पाल लेते हैं और उसे साकार करने की चाहत में आवाम की जिंदगी नर्क बना देंते हैं तो मजबूरन उन्हें मुल्क छोड़ना पड़ता है । ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवता के हिमायती मुल्कों का ये परम दायित्व है कि लोकतंत्र और आंतरिक मसले की दुहाई देकर अत्याचार करने वालों पर नकेल कसें । लेकिन बजाय उनकी सहायता करने के तुर्की, ईरान, रूस और अमेरिका जैसे देश व्यक्तिगत हितों को ध्यान में रखते हुए इस प्रचंड दावानल को घी देने काम कर रहे ।
जबकि अत्याचार से जूझ रहे एलन कुर्दी, इम आदिल, यास्मिन-अल-अवाधी और अदीब-अल-जेनानी जैसे लोगो का परिवार ये जंग खत्म होने के लिए वर्षों से दुआ कर रहा है ।
उनकी सदाएँ अल्लाह के कानों तक पहुँचे न पहुँचे, लेकिन इंसानों की कानों तक पहुँच कर भी अगर उन्हें फर्क नही पड़ता, उनके लिए चिंता का सबब नही बनता तो यकीनन इस दुनिया को न अल्लाह की जरूरत है न ही इंसानों की ।
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