पन्द्रह अगस्त आ गया है । गली नुक्कड़ और चौराहे छुटभैय्ये नेताओ के पोस्टर होर्डिंगो से भर चुके हैं । पिछले तीन दिनो से न्यूज पेपर और प्राइम टाइम मे देशभक्ति की अविरल गाथाए गाई गयी होंगी । टीवी पर भारत-पाक मुद्दे पर बनी फिल्में प्रसारित की गयी होगी । लोग फेसबुक व्हाट्स एप पर तिरंगे की डीपी लगाए होंगे और एक दूसरे को "हैप्पी इंडीपेंडस डे" की मुबारकबाद दे रहे होंगे । लम्पट, चोर, मर्डरर, दलाल और रेपिस्ट नेता भी राष्ट्रीयता पर लम्बे चौड़े भाषण देंगे और हमे राष्ट्र के प्रति जीने का कायदा बताएंगे लेकिन इस बीच गिने चुने प्रगतिशील लोगो को छोड़ कर कोई भी पिछले सत्तर साल के घटनाक्रम पर कोई विवेचना नही करेगा । शाम ढल जाएगी और लोग देशभक्ति के चोले को उतार कर अलमारी मे तह करके रख देंगे ।
नेहरू का "किस्मत से वादा" भारत के लोगो को घूर रहा है और इससे किसी को कोई फर्क नही पड़ता ।
आज से सत्तर साल पहले उन्होने कहा कि हम अंधेरे से उजाले के युग मे प्रवेश कर रहे हैं । कभी न आने वाले इस उजाले की कीमत हमने डेढ़ करोड़ लोगो को बेघर करके और लाखो लोगो की हत्या करके अदा की । दो मुल्को के काॅन्सैप्ट ने हमारी खुशियो मे आग लगा दी । हमे समझना था कि ये बंटवारा किसी प्राकृतिक आपदा से नही हुई थी । कोई जलजला नही आया था न ही धरती अपने आप फटी थी । चंद सम्पत्तिशाली घरानो के लालच और सत्ता के नशे ने एशिया के सबसे ताकतवर भविष्य पर अपने फायदे की लकीर खींच कर इसे कमजोर कर दिया । जिन्ना और नेहरू का ये सौदा जनता के लिए आखिर घाटे का सौदा साबित हुआ । हमे नही पता था चंद लोगो की महत्वकांक्षा करोड़ो लोगो के जीवन मे तूफान ला देगा । जिन्ना और नेहरू ने अपने हिस्से जरूर बांट लिए लेकिन उन्ही हिस्सो पर मुकम्मल आजादी की खुशी न दे सके, उल्टे जमीन के एक टुकड़े पर अपनी सारी ताकतें खर्च करते चले गये । भारत-पाक युद्धो ने देश को वक्त से पीछे धकेल दिया ।
शुरूआती दौर मे ही भारत के अवसरवादी नेताओ ने भारी गलतिया की, जिसका असर हम आज तक देख रहे हैं । वो समाजवाद की दिशा मे बढ़ने के बजाए पब्लिक सेक्टर के नाम पर देश को कारपोरेट के चरणो मे शनै-शनै समर्पित करते चले गये, आज सत्तर साल बाद हम देखते हैं कि अमीर और अमीर होता चला गया और गरीब, गरीबी रेखा से नीचे ।
कहने को हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं । हम अपनी सरकार खुद चुनते हैं और देश चलाते है लेकिन हकीकत तो ये है कि हर पाँच साल पर हम एक मदारी चुनते हैं जो पूंजीपतियों के इशारो पर हमे जम्बूरा बना कर मनचाहा नाच नचाता है । हमे लगता है हम आजाद देश के बाशिंदे हैं और इसीलिए हर साल पन्द्रह अगस्त को 'सत्ता का हस्तानांतरण' का जश्न मनाते हैं । हमारा लोकतंत्र एक भ्रम है । किसी महान लेखक ने कहा था कि "यदि लोकतंत्र से कुछ बदलाव आ सकता तो वें इसे ही बदल देते"
ये लोकतंत्र जो हमे मुकम्मल आजादी देने का दावा करता है, झूठ है फरेब है । ये लोकतंत्र जनता की व्यवस्था नही बल्कि पूंजीवाद की राजनीतिक व्यवस्था है, जो ये भ्रम फैलाता है कि मुल्क मे सब बराबर हैं । हमे समझाना होगा कि हमारा देश दो वर्गो मे बंटा है शोषक और शोषित । इस देश मे जो भी अपना श्रम कारपोरेट के दुकान पर बेंच रहा है शोषित है फिर वो चाहे दिहाड़ी मजदूर हो या किसी मल्टीनेशनल कंपनी का सूटेड-बूटेड कर्मचारी । और मजदूरो का शोषण करके बड़े-बड़े एम्पायर खड़ा करने वाला शोषक ।
पूंजीवाद की गुलाम ये लोकतंत्र शोषित और शोषक मे भला क्या बराबरी दे सकती है ?
राजनीतिक स्वतंत्रता के नाम पर ये सिस्टम मजदूरो को वोट देने भर की आजादी देता है जबकि पूंजीपतियो को शासन करने की आजादी ।
पैसे के बल पर पूंजीपति न्याय, कानून और शासन को अपने मातहत कर लेता है । जो चाहे खरीद सकता है जो चाहे बेच सकता है जबकि शोषित के पास खरीदने के लिए सिर्फ रोटी और बेचने के लिए अपना जिस्म भर ही होता है । फिर ये कैसी बराबरी ???
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था भी कारपोरेट हितैषी है । लगातार शिक्षा बजट मे कटौती, विश्वविद्यालयो मे विमर्श पर हमला वैचारिक रूप से आने वाली पीढी को पंगु कर रही है ताकि कारपोरेट की मनमानी पर कोई सवाल न उठा सके साथ ही उन्हे चीप लेबर मिलता रहे, जो उनके उत्पादन को बिना सवाल किए बढ़ाते रहे । ताकि गरीब हमेशा गरीब रहे और अमीर और जादा अमीर बन जाए । भविष्य मे उन्हे लेबर की कमी न रहे इसलिए बेरोजगारो की फौज तैयार की जा रही है और धीरे धीरे ट्रेड यूनियनों को भी खत्म किया जा रहा है ।
बढ़ती बेरोजगारी मे लोग अपने जिंदगी के बदले अपनी स्वतंत्रता कारपोरेट के हाथों गिरवी रख देंगे । जब राजनीति हमारा भविष्य तय करने लगे तो हमे राजनीति का भविष्य तय कर देना चाहिए ।
गरीब और अमीर की खाई भयावह तरीके से बढ़ रही है । एक तरफ गरीबी के मामले मे भारत विश्व मे 126 वें स्थान पर है जबकि दूसरी तरफ भारत के पूंजीपति दुनिया के धनी लोगो की लिस्ट मे अपना नाम बनाए हुए हैं । एक अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार भारत के 52 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधन पर भारत के एक प्रतिशत लोगो का कब्जा है । जल जंगल जमीन की अंधाधुंध लूट मे इन पर आश्रित लोगो को विस्थापित किया जा रहा है आवाज उठाने पर उन्हे कुचला जा रहा है । नक्सलवाद का फैलाव इन्ही पूंजीवाद और सरकारी मनमानी का नतीजा है ।
भगत सिंह ने हमे पहले ही आगाह किया था कि कांग्रेस के रास्ते गोरे अंग्रेज तो चले जाएंगे लेकिन उनकी जगह भूरे अंग्रेज आ जाएंगे । इन भूरे अंग्रेजो और उनके भ्रष्ट सिस्टम को हटाकर वैज्ञानिक समाजवाद लाना सही मायनो मे आजादी होगी ।
पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश के शब्दो मे " जिस दिन भगत सिंह को फाँसी हुई उसके कमरे मे लेनिन की किताब मिली जिसमे एक पन्ना मुड़ा हुआ था । हिन्दुस्तान की जवानी को उसके मोड़े हुए पन्ने से आगे जाना है"
सच्ची आजादी की इस लड़ाई मे युवाओ को नेतृत्व अपने हाथ मे लेना होगा और गरीब किसान, मेहनतकश मजदूरो के बीच जाकर उन्हे वर्ग-चेतना की शिक्षा देनी होगी उन्हे समझाना होगा कि उनके असली दुश्मन कौन हैं । राजनीति के बहकावे मे आकर सामप्रादायिक झगड़ो से दूर रहना होगा और धर्म, जाति, रंग, और क्षेत्र के भेद को मिटाकर एकजुट होकर अपनी शक्ति लुटेरी सरकार और पूंजीवाद के खिलाफ लड़ने मे लगाना होगा । तभी ये देश अपनी मुकम्मल आजादी हासिल कर सकेगी और देश का हर आदमी खुशहाल हो सकेगा और हम हर दिन आजादी का जश्न मना सकेंगे ।
इंकलाब जिंदाबाद ।
-सम्राट विद्रोही


बेहतरीन
ReplyDeleteबेहतरीन के आगे बहुत भी लगाओ यार
Delete😉😉😂
Deleteबहुत बढ़िया💐💐💐💐
ReplyDeleteबहुत बढ़िया सम्राट !
ReplyDeleteतुम दस कदम आगे निकले।
-अतहर
शानदार पर शिर्फ़ शब्द काफ़ी नहीं हैं ....������
ReplyDeleteबेहतर लेख है भैया ।
ReplyDeleteबढिया लिखा है
ReplyDeleteगजब
ReplyDeleteHats off for your article...really hear touching
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