Thursday, June 24, 2021

विद्रोह के फूल: अदम और विद्रोही

कभी-कभी किसी को याद करना अतीत के उन गलियों में दौड़ जाना होता है जहाँ वक्त ठहरा हुआ होता है, किसी टेप-रिकाॅर्डर की तरह बार-बार उसी अंतरे को सुनना जो दिल के करीब आती महसूस होती है । यादें संगीत की तरह ही होती हैं और संस्मरण टेप-रिकाॅर्डर की तरह । इसीलिए मैं मानता हूँ अच्छी यादों का लिखा जाना जरूरी है । न वक्त एक सा रहता है, न लोग एक से रहते हैं । हर चीज़ परिवर्तनकारी है सिर्फ याद ऐसी चीज़ है जो अपरिवर्तनशील है । जब तक टाइम मशीन की खोज़ नही होती फिलहाल तब तक के लिए तो हम ऐसा ही मानेंगे । इसलिए यादों को सहेजे जानी की सख्त़ जरूरत है । कोई घटना, कोई तारीख़, कोई वस्तु या किसी व्यक्ति से जुड़ी लाइफ की टर्निंग प्वाइंट की हमारे पास ऐसी बहुत सी यादें होती है जिसे हम ताउम्र नही भुलाना चाहते । कहते हैं कि आदमी मर जाता है विचार नही मरता लेकिन मैं मानता हूँ कि विचार को सहेजा न जाए तो विचार मरते भी हैं । यही वजह है कि मैं विचार-लेखन को तवज्जो देता हूँ बजाय विचार सुनाने के । लिखने की इसी कड़ी में आज मैं बात करने वाला हूँ ऐसे व्यक्तित्व के बारे में जिन्होंने वैचारिकता और साहित्य के प्रति मेरे रूझान को प्रोत्साहित किया । और वो व्यक्तित्व हैं जनकवि अदम गोण्डवी  और रमाशंकर यादव 'विद्रोही' । बात स्कूल के दिनों की है जब मैं बचपन के दिन छोड़कर किशोरावस्था में कदम रख रहा था । शरीर में हार्मोनल बदलाव हो रहे थे, और बदन में एक अजीब सी बिजली कौंधनी शुरू हुई थी । एक अलग सी ताजगी, नया-नया जोश और बहुत कुछ सीख लेने की हवस रगों में दौड़ रही थी । वे दिन मेरे बोर्डिंग के दिन थे । आसमान का उन्मुक्त पंक्षी, जैसे सभी सीमाओं को दरकिनार कर बस उड़ता जाता है और आसमान की असीम क्षितिज पर गोते लगाता रहता है, उन दिनों मुझे भी ऐसा ही महसूस हो रहा था । लेकिन ऐसा भी नही कि ये हमेशा से था । उस स्कूल में मेरा लेट एडमिशन हुआ था इसलिए मुझमें इक इनसिक्योरिटी वाली भावना पनप रही थी कि मेरे क्लास के बाकी बच्चे दो महीने आगे चल रहे हैं मुझसे । बाल-मन बहुत सेंसटिव होते भी हैं । धीरे-धीरे दिन गुजरे, मैं एडजस्ट करने की कोशिश कर रहा था । नये दोस्त, घर से बाहर का माहौल, बड़ा सा प्ले-ग्राउंड, मेस का खाना और काली, ऊँची पानी की टंकी ये सब कुछ मेरे लिए नया नया अनुभव था । एक तरफ घर से बाहर आकर दुनिया देखने की खुशी तो दूसरी तरफ घर को याद करने का ग़म । दो विरोधी विचार आपस में परस्पर द्वंद कर रहे थे । इस तरह का अंतर्द्वंद भी मैंने पहली बार महसूस किया । मैं आजतक इस निष्कर्ष पर नही पहुँच सका कि उस अंतर्द्वद में कौन सा पक्ष ज्यादा मजबूत था । मैं 'खुश' ज्यादा था या 'दुखी' ज्यादा था । एक्साइटमेंट और यादें इस तरह आपस में उलझी थी कि उन्हें सुलझाने से बेहतर छोड़ देना ही मुझे मुफीद लगा । मैं वापस तीन साल आगे आता हूँ । जहाँ मुझमें वो चुपचाप सा रहने वाला बच्चा कहीं खो गया था । अब मैं सवाल पूछता था पढ़ता था, कल्चरर प्रोग्राम में भाषण देता था । इंटर-स्कूल लेवल पर कलस्टर और रीजनल जूडो भी खेल चुका था । कुल मिलाकर मुझमें बहुत से बदलाव आ गये थे लेकिन ये बदलाव प्राकृतिक और वातावरणीय बदलाव का असर था । असली बदलाव या यूँ कहें की मनोवृत्ति का विकास होना अभी बाकी था । अगस्त खत्म हो चुका था और सितंबर लग चुका था । प्रचंड गरमी और लौटते मानसून की बारिश की धार अब ढलान पर थी । मधु-मालती और शिउली की महक पूरे वातावरण में फैल रही थी । मौसम अब गुलाबी हो रहा था । हिन्दी भाषा को प्रोत्साहन देने के लिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है । हिन्दी के लिए महज एक दिन मुकर्रर करना विद्वानों को रास नही आया इसलिए हिन्दी के लिए सितंबर के पहले दो हफ्ते 'हिन्दी पखवाड़ा' नाम से मनाया जाने गया ताकि हिन्दी पर विधिवत् मंथन हो और पखवाड़े का आखिरी दिन यानी 14 नवंबर को हिन्दी दिवस रखा गया । हमारे स्कूल में भी हिन्दी को प्रोत्साहन देने के लिए हिन्दी पखवाड़ा का आयोजन किया गया था । बहुत कुछ मेरे लिए नया था । भारत की विविधता को भी समझने का मौका मुझे अपने स्कूल के दिनों में ही मिला । स्कूल में त्रिपुरा के बच्चे माइग्रेशन से एक साल के लिए पढ़ने आते थे, उनकी भाषा जो शुद्धतम बांग्ला भी नही थी उससे मुझे भाषाई विविधता के बारे में काफी कुछ सीखने को मिला । खैर, मैं हिन्दी दिवस पर था और मेरे स्कूल में हिन्दी पखवाड़े का आयोजन चल रहा था । पद्मश्री 'बेकल उत्साही' का दौरा हो चुका था । और उनसे हिन्दी के बारे में काफी कुछ सीखने को मिला । अगले दिन जनकवि 'अदम गोण्डवी' का दौरा था । अदम जी को मैं बचपन से जानता था, मैं उनकी गोद में खेला था । वो अक्सर घर आते, चाय पीते और पिताजी से घंटो बातें करते थे । मुझे जरा भी अंदाजा नही था कि ये खिचड़ी हो चुके बालों वाला आदमी क्या तोप आदमी हैं । अरे भाई ! कविता ही तो करते हैं ! तो ? कविता भी कोई कर ले, इसमें क्या है ? हम भी तो कविता करते हैं । फिर इस सफ़ेद कुरते वाले बुजुर्ग की कविताओं में ऐसा क्या है ?
मैंने अदम को बहुत सुना था । उनकी बातें, उनकी कविताएँ । जिनमें ज्यादातर मेरी समझ से परे थी । उनकी कविताएँ जातिवाद, समाजवाद और सामंतवाद जैसे भारी भरकम हथितारों से लैस होती थी । एक किशोरवय बच्चे से क्या ही उम्मीद की जाए कि वो इन शब्दों का मतलब भी समझेगा । अदम का व्याख्यान खत्म हुआ तो मैंने सीनियरों के मुँह से अदम की तारीफ सुनी । फिर शाम हुई और अदम को रात हमारे स्कूल में ही रुकना था । रीमीडियल क्लास खत्म हुई थी और हम हाॅस्टल पहुँचे थे । गेम टाइम शुरू होने को था । गेम टाइम हमारा पर्सनल टाइम होता था । गेम टाइम मुझे बहुत पसंद था । इसलिए नही कि मैं स्पोर्ट पर्सन था बल्कि इसलिए कि उस वक्त मैं ग्राउंड में बैठकर नेचर को भी देखता था, लोगो को खेलते हुए, हँसते हुए देखता था । ये वक्त दिमाग के घोड़ों का बेलगाम दौड़ाने का होता था । उस दिन मैं रीमीडियल क्लास से लौटने के बाद कपड़े बदल रहा था इतने में एक जूनियर मेरे कमरे में दाखिल हुआ और बोलने लगा कि भैया प्रिंसिपल सर ने बुलाया है आपको । अभी । उस वक्त प्रिंसिपल के घर से बुलावा आने का मतलब गाज़ गिरना होता था । पिछले तीन-चार दिनों की सारी हरकतें आँखों के सामने आकर घुटनों तक लहंगा चढ़ाए 'छैया-छैया' नाचने लगी । कहीं ऐसा तो नही कि किसी जूनियर ने शिकायत कर दी हो, या फिर बाउंड्री फांदते वक्त किसी स्टाफ ने देख लिया हो । मेस स्टाफ हो सकता है क्या ? 'नही यार मैंने तो डबलिंग भी नही मारी' ये गाँव वाले तो नही पहचान लिए किस बात के लिए ? उसके बाग में घुसकर अमरूद तोड़े थे । अरे तो उसको नाम थोड़े मालूम था । किसी ने बता दिया हो तो ? किसी ने सिगरेट फूंकते देखा था क्या ? उधर जंगल में जाता ही कौन है ? इस तरह के तमाम सवाल मन में उठ रहे थे और जवाब भी मन खुद ही दे रहा था । ये समझ आया कि गलत तो कुछ नही हुआ है लेकिन फिर भी दिल एक अनजाने डर के साए में सिहरता जा रहा था । भारी मन और दबे पाँव मैं 'प्राचार्य आवास' पहुँचा । हल्के गुलाबी रंग से पुते प्राचार्य आवास का वास्तु स्कूल के बाकी इमारतों से अलग था । स्कूल के गेट नं एक में घुसते ही गेस्ट हाउस के ठीक सामने एक-मंजिला इमारत जिसके बगल में मल्टी-पर्पस स्कूल की मिनी बस परमानेंट खड़ी रहती थी । आवास के ठीक सामने अहाते में बड़ा सा बगीचा था जहाँ तरह-तरह के फूल लगे होते थे । और उस बगीचे की नर्म, हरी घास पर एक टेबल और दो तीन कुर्सियाँ हमेशा पड़ी रहती थी । मैं अपने साथ दो विश्वसनीय दोस्तों को भी साथ लाया था जो मुश्किल हालातों में मेरी तरफ से दलीलें रख सकें । हाॅस्टल के दिनों में ये ट्रिक बहुत पापुलर हुआ करती थी । बहरहाल जब मैं प्राचार्य आवास पहुँचा तो बाहर बगीचे में प्रिंसिपल और अदम जी बैठे हुए थे । हाल ही में पुराने प्रिंसिपल का ट्रांसफर हुआ था और उनकी जगह नये प्रिंसिपल आए थे । वो नये प्रिसिंपल चेहरे पे हमेशा बारह बजाए रहते थे । न हँसना, न बच्चो से ज्यादा बात करना । उनमें अज़ब ही मनहूसियत छाई रहती थी जबकि इसके उलट पुराने प्रिंसीपल बच्चो से संवाद करते थे, मजाक करते थे और एक पाॅजिटिव एनर्जी लेके चलते थे । उस वक्त तक हम मानते थे कि साइंस पढ़ने वाला इंसान ऐसे ही बोरिंग सा हो जाता है । और नये प्रिंसीपल ने इस मिथक पर 'सच' का ठप्पा लगा दिया था । एक साहित्यकार और एक वैज्ञानिक साथ बैठकर क्या बात करते होंगे ये हमारे हाॅस्टल में देर रात वाली विमर्श का टाॅपिक बना । मुझे देखकर अदम जी के चेहरे पर मुस्कुराहाट की एक लम्बी सी लकीर खिंच गयी । मैंने उनके पैर छुए तो उन्होंने कहा कि 'बेटा मैं बार-बार सोच रहा था कि सेन साहब का बेटा इसी स्कूल में पढ़ता है लेकिन ऑफिशियल नाम नही याद आ रहा था'। फिर वो प्रिंसिपल की तरफ मुड़े और उनसे कहने लगे कि प्राचार्य जी ! ये लड़का बहुत होशियार और होनहार है इसपर खास ध्यान दीजिएगा । मैंने मन में सोचा ऐसा आदमी ध्यान न ही दे तो बेहतर है क्योंकि पिछले ही दिनों प्रिंसिपल ने मुझे हाॅस्टल में 'इल्लीगल' हीटर जलाते पकड़ा था । ये तो अच्छा हुआ कि प्राचार्य महोदय ने मेरी होशियारी के किस्से अदम जी को नही बताए । गोधूलि का वक्त हो चला था और मुझे प्राचार्य आवास में खड़ा देखकर ग्राउंड में खेलते मेरे कुछ दोस्त भी इधर ही दौड़े चले आए । इस दौरान अदम जी ने बहुत पते की बात कही । एक सवाल पर उन्होनें कहा कि आप जितना पढ़ते हो उतना ही ज्यादा लिखने की इंस्पीरेशन भी आपको मिलती है । जब आप किसी पहलू को बहुत गहराई से जानने की कोशिश करते हैं तो इस सफ़र में चाहे-अनचाहे आपका राब़ता उन चीज़ों से भी हो ही जाता है जिनसे आप अब तक अनजान थे ।
उस दौरान बहुत सी बातें हुई फिर शाम की रीमेडियल क्लास के लिए जाना था इसलिए प्रिंसीपल ने हम लोगो को जाने को कहा । हाॅस्टल पहुँचते-पहुँचते ये बात लोगों में फैल गयी कि अदम गोण्डवी मेरे परिचित हैं । इस बात का बाल-मन पर एक अलग ही इम्पैक्ट पड़ता है, जैसे किसी सेलेब्रिटी का परिचित होने पर आस-पास के लोगो में इज्जत बढ़ जाती है,  उस दिन मुझे वैसा ही महसूस हुआ । लेकिन इस घटना ने मुझे हिन्दी साहित्य की तरफ अग्रसर करने के लिए बहुत प्रोत्साहित किया । ये उसी प्रोत्साहन का नतीजा था कि उस साल मैंने गीता, मारियो पूजो कृत गाॅडफादर, मालगुड़ी डेज़, गोदान, गब़न, मानसरोवर, गीतांजलि,विष-कन्या  जैसी बहुत सी किताबें पढ़ डाली । सच कहूँ तो वो ऐसा वक्त था जहाँ मैंने अपनी हैसियत से ज्यादा किताबें पढ़ ली थी जिनमें से बहुतों के अर्थ ही नही समझ आते थे । उस वक्त 'सरस-सलिल' जैसी वयस्क पत्रिकाएँ भी छुप-छुप कर पढ़ी । आज सोचता हूँ कि उन दिनों सचमुच मैं वक्त से आगे था । कुल मिलाकर मैं ये कह सकता हूँ कि अदम के प्रोत्साहन का ही नतीजा था कि मैंने अपनी सिलेबस से बाहर के साहित्य का रसास्वदन किया । ये भी सच है कि सार्थक कविताएँ लिखने का शौक भी मुझे अदम की कविताएँ सुनकर चढ़ा । वो मुलाकात शायद अदम से मेरी आखिरी मुलाकत थी । उसके बाद मैं उनसे कभी नही मिला । साल 2011 में जब उनके देहावसान की खबर सुनी तो मुझे धक्का सा लगा । ये कसक दिल में उठने लगी कि उनसे अभी बहुत कुछ सीखना था । उनके गुजरने के कुछ साल बाद मैं उनके घर गया । मुझे ताज्जुब हुआ जो इंसान जीते जी ईश्वरीय सत्ता को नकार चुका था आज उसकी तस्वीर देवी-देवताओं के साथ लगा दी गयी थी । मैंने और गहराई से जब उन्हें समझने की कोशिश की तो मालूम चला कि जिस सामंतवाद का जिक्र उन्होनें अपनी कविता 'चमारो की गली'  में किया था अंततः उसी सांमती सोच के लोगो ने उनका चरित्र हनन किया । नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि वो उस दौरान तात्कालीन विधायक का ड्राइवर हुआ करता था और एक दिन अदम उस विधायक के घर पर स्पेशल गेस्ट थे । दो पैग लगाने के बाद उस विधायक ने अदम जी से कुछ नगमें छेड़ देने की इल्तज़ा की । शराब अदम की कमजोरी थी इसी का हवाला देकर उनके पाटीदारों ने जम कर उनका चरित्र हनन किया । बहरहाल विधायक के आग्रह पर अदम कुछ देर शांत रहें और टेबल पर रखी काजू की प्लेट से काजू उठाते हुए कहा । काजू भुने प्लेट में व्हिस्की भरी गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में, पक्के समाजवादी हैं तस्कर हो या डकैत कितना असर है खादी के उजले लिबास में । बाद में ये अदम की प्रतिनिधि कविता बनी । जिसने उन्हें समूचे हिन्दी भाषी बेल्ट में मशहूर किया । दमन के दौर में वो जनवादी कवि जब उंगलियाँ उठाकर जनता के साथ खड़े होने का ऐलान करता तो जनता भी उनके साथ खड़ी होती दिखती थी । अदम का आज न होना भले ही अखरता हो लेकिन उनकी कविताएँ जब भी सुनाई जाती है अदम जी उठते हैं । ग्रेजुएशन के दिनों में अदम की किताब 'धरती की सतह पर' और 'समय से मुठभेड़'  पढ़ी । बल्ली सिंह चीमा अपनी कविता में पूछते हैं- 'तय करो किस ओर हो तुम आदमी हो या आदमखोर हो तुम' आदमी का पक्ष मैंने अदम की कविताएँ पढ़कर ही चुना था । यूँ तो साहित्य से मेरा जुड़ाव बहुत पहले हो चुका था लेकिन कविताओं और लेखों में विद्रोह का स्वर दिल्ली में एक दिलचस्प शख्सियत से मुलाकात के बाद आया । साथ ही 'विद्रोही' तख़ल्लुस भी उसी दौरान अपनाया । बात 2013 की है, किशोरावस्था से जवानी की दहलीज़ पर जिंदगी आ खड़ी थी । लखनऊ से विद्यार्थियों का एक समूह किसी कन्वेंशन के सिलसिले में जेएनयू आया था । मैं भी उसी समूह का हिस्सा था । कन्वेंशन सेंटर के बाहर मैं खड़ा चाय पी रहा था तभी एक मैले-कुचैले, सिलवटों में लहराते कुर्ते में एक बुजुर्ग बाहर घूमते दिखाई दिए । चूँकि जेएनयू में ये मेरा पहला विजिट था । चारो तरफ़ युवा चेहरे ही दिखाई दे रहा थे । उन युवाओं के बीच एक बुजुर्ग को इस तरह दिखना मेरे मन में कौतूहल पैदा कर रहा था कि जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के छात्र-युवा कंवेन्शन में ये बूढ़ा आदमी कौन है ? जो न प्रोफेसर है, न वक्ता है न ही कोई वर्कर । तभी मेरे साथियों ने मुझे अंदर चलने को कहा । मैं अंदर जाकर बैठा था कि पीछे से वो बुजुर्ग भी अंदर आते दिखाई दिए । उनके अंदर आते ही हाल में सरगर्मिया बढ़ सी गयी । इसे देखकर मेरे मन में कौतूहल और ज्यादा बढ़ गया । मैंने अपने पास बैठे लड़के के पूछा 'कौन हैं ये महाशय' तो उनसे दो टूक जवाब दिया कि 'भाई !मैं भी पहली बार ही आया हूँ' । आखिरकार मेरी जिज्ञासा तब शांत हुई जब उस बुजुर्ग को मंच पर ससम्मान आमंत्रित किया गया । और वो बुजुर्ग थे रमाशंकर यादव 'विद्रोही' विद्रोही जी ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया जिनमें, 'आसमान में धान', 'मोहनजोदड़ो के मुहाने पर' और 'अपना हक छोड़ दो'  कविताएँ प्रमुख रही । महफिल में एक गज़ब सी गर्माहट दौड़ उठी । लेकिन उन कविताओं ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया । उस दिन शाम को मैं 'गंगा-ढाबा' पर विद्रोही जी से मिला, उनसे फाॅर्मल बातें की । उसके बाद जब कभी भी जेएनयू जाना होता विद्रोही जी से मुलाकात जरूर होती थी ।
एक बार जेएनयूएसयू बिल्डिंग में मैंने उनसे पूछा था कि सिस्टम के लिए इतना आक्रोश आप कहाँ से लाते हैं ? तो उन्होंने कहा था कि जब आप सच को सच की निगाह से देखते हैं, और सच के लिए सच बोलने का माद्दा रखने लगते हैं तो आप विद्रोही हो ही जाते हैं । आप भी तो विद्रोही हैं, ये आप कैसे कह सकते हैं विद्रोही जी ? तुम विद्रोही न होते तो तुम मुझसे इस विषय पर बात नही कर रहे होते, तुम हो विद्रोही । उस दिन उन्होंने एक शब्द इस्तेमाल किया था 'फैमिलियर' हाँ यही शब्द था । उन्होनें कहा था कि तुम लोगो से बातें करना अच्छा लगता हैं । युवाओं से बात करने से उम्र खुद पर हावी नही होती । साल 2015 का दिसंबर महीना था, कड़ाके की सर्दी । और दिल्ली की सर्दी तो वैसे भी मशहूर है । दिल्ली में देश भर के छात्र यूजीसी के फेलोशिप हटा लेने के मुद्दे को लेकर कड़कड़ाती ठंड में सड़कों पर थे । कुछ मित्रों का फोन आया कि दिल्ली चलना है । 8 तारीख की सुबह मैं दिल्ली पहुँचा । आंदोलन में पहुँचते ही मालूम चला कि विद्रोही जी की तबीयत ज्यादा खराब है कुछ लोग उन्हें हास्पिटल लेकर गये हैं । शाम तक खब़र मिली कि विद्रोही जी नही रहे । आंदोलन का चेहरा उतर गया । आधे लोग आंदोलन में और आधे विद्रोही जी के साथ । अगले दिन उनकी शव यात्रा जेएनयू से निकलने वाली थी और अंतिम दर्शन के लिए उनके शव को जेएनयूएसयू की बिल्डिंग के बाहर रखा गया था । अगली सुबह जब मैं जेएनयूएसयू बिल्डिंग पहुँचा तो वहाँ बहुत भीड़ थी और विद्रोही जी की याद में नारे लगाए जा रहे थे । पैरलल सिनेमा के अग्रणी विश्लेषक और 'प्रतिरोध का सिनेमा' के फाउंडर संजय जोशी उन भावुक लम्हों को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे । लोग पुष्प॔जलि अर्पित कर रहे थे । मैं वही थोड़ी दूर पर जमीन पर बैठ गया । तभी इलाहाबाद यूनिवर्सटी का वरिष्ठ छात्रनेता अंतस मेरे पास आया और बोला कि जाओ पुष्पांजलि अर्पित कर दो, मन हल्का हो जाएगा और यकीन होगा कि विद्रोही जी नही हैं । मैंने उससे कहा कि 'नही ! मैं ये नही यकीन कर सकता कि वो हमारे बीच नही हैं, वो अब भी जिंदा है, वो तब तक जिंदा रहेंगे जब तक आसमान में धान नही बोया जाता (उनकी कविता आसमान में धान से) । अंतस भी मेरे कंधे पर हाथ रखकर वहीं बैठ गया । हम दोनो की आँखें नम थी । आंदोलन में जीने वाला इंसान आखिर आंदोलन में ही मरा । महबूबा के बाहों में मरने से बेहतर मौत और हो ही क्या सकती है ?
विद्रोही जी जब भी मिलते गर्मजोशी से मिलते थे । मैं आज भी विद्रोही जी के हाथों के दाब को महसूस कर सकता हूँ । मैंने 'विद्रोही' तख़ल्लुस को उनसे मिलने के बाद, उनसे प्रभावित होकर रखा था और मेरी कोशिश रहेगी कि विद्रोही जी विचारो को भी आगे लेके जा सकूँ । इस तरह मेरी किशोरावस्था और जवानी के शुरूआती दिनों में दो विद्रोही कवियो का प्रभाव रहा । अदम ने मुझे आम आदमी के करीब होने का एहसास दिलाया तो वहीं विद्रोही ने नारीवाद पर पुरूषों की भूमिका और असमानता, शोषण और दमन के खिलाफ़ प्रखर आवाज़ बुलंद करने का । आमतौर पर लोग विद्रोह का अर्थ विध्वंस समझते हैं लेकिन मैंने कम समय में ये सीख लिया कि विद्रोह का मतलब सिर्फ विध्वंस ही नही बल्कि निर्माण भी होता है । विद्रोह में भी वैसी ही खूबसूरती और नज़ाकत होती है, जैसे किसी खूबसूरत फूल में । ये दोनो विद्रोही देश के ऐसे फूल हैं जो सदियों तक इस मुल्क के गुलशन को गुलजार करते रहेंगे, फिजाओं को महकाते रहेंगे । जब भी अधिकारों के हनन की बात होगी इन दोनो कवियों को याद करना प्रासंगिक होगा । मेरे लिए अदम और विद्रोही मेरे ज़ेहन में हमेशा जिंदा रहेंगे ।

3 comments:

  1. "आसमान में धान" कहीं पढ़ा था, तब इन्हें जाना था.. और बहुत बेहतरीन लिखा है तुमने

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  2. Bahut hi behtareen bhaiyaa... Adam ji k aane k time par shayad mai 6 me thaa.. mujhe sahi se pata nahi tha unke baare me .. baad me pata chala ki itni badi shakshiyaat h ye

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  3. बहुत शानदार लेख है

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